सोमवार, 22 जून 2009

लघुकथा-- मजबूरी


रोज सबेरे इधर उधर काम करती हुई बरबस ही निगाह किचेन की खिड़की से बाहर चली जाती है ।रोज की तरह मैं देखती हूं उस औरत को जो अपने कंधे पर बोरे जैसा बड़ा सा थैला लटकाये अपने दो छोटे छोटे बच्चों के साथ अपने काम में जुटी होती है ।पूरी तन्मयता के साथ ।कूड़ा बीनते हुये ,सफ़ाई करते हुये जैसे उसे किसी के होने या न होने का कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।
चाहे वो जून की चिलचिलाती धूप हो या फ़िर जनवरी की कड़ाके की सर्दी ।साथ में उसके बच्चे कभी कूड़ा बीनते---कभी खेलने में मगन हो जाते ।सूरज की धधकती आग या तपती हुई
धरती की तपन उनके नंगे पांवों या चीथड़ों में लिपटे शरीर पर कोई असर नहीं डालती ।शायद मां का आंचल ही उनको इन सबसे लड़ने का संबल देता है ।
देखते देखते उसकी दो साल की लड़की का हाथ मेरे दरवाजों की कुन्डी तक पहुंचने लगा है। और उसकी महीन सी आवाज ----‘आण्टी------कूला दे दो’ जब मेरे कानों में पहुंचती है तो मेरा हाथ उसे कूड़ा देने के बजाय ,घर में खाने की चीजों पर जल्दी –जल्दी दौड़ने लगता है।एक हाथ से मैं उसे कूड़ा देती हूं,दूसरे से उसे खाने का थैला पकड़ाती हूं । ऐसा करके मैं उसके ऊपर अहसान नहीं करती हूं । बल्कि थैले को देखकर उस बच्चे की आंखों में जो चमक उभरती है---वह मेरे मन को इतनी असीम शान्ति देती है जो मैं बयां नहीं कर सकती ।
जब मैं उसकी मां से पूछती हूं कि इस आग उगलती धूप को ये कोमल बच्चे कैसे सहन करते हैं ? उसका एक ही जवाब होता है –“दीदी ---इन बच्चों के पेट में जो आग जल रही है उसकी लपटों और जलन से सूरज की गर्मी और तपिश तो बहुत कम है”। और मेरी निगाहें एक हाथ में बच्चों का हाथ थामे-----कन्धे पर कूड़े का थैला लिये उस औरत का दूर तक पीछा करती रहती हैं ----जब तक कि वह निगाहों से ओझल नहीं हो जाती ।और कानों में गूंजते रहते हैं उसके शब्द-----पेट की आग की जलन से तो सूरज की गर्मी की तपिश बहुत कम है।
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पूनम

16 टिप्‍पणियां:

  1. अब तो यह नजारे आम है !!

    वैसे आपने समस्या को नए दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की .....अच्छा लगा!!

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  2. 'पेट की आग की जलन से तो सूरज की गर्मी की तपिश बहुत कम है।'
    -मर्मस्पर्शी
    -यह लेख सोचने पर मजबूर करता है क्या सच में भारत का विकास हो रहा है?
    -आज ही खबरों में सुना भूख से मध्यप्रदेश में बच्चों की मौत हो रही हैं.

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  3. सच लिखा है पूनम जी........... पेट की आक के सामने किसी भी आग की जलन कुछ भी नहीं........... दिलचस्प अंदाज़ है

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  4. "पेट की आग की जलन से तो सूरज की गर्मी की तपिश बहुत कम है।"

    सधा हुआ लेखन, सुन्दर प्रस्तुति।
    बधाई।

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  5. आपकी संवेदनशीलता को सलाम!!!!!!!!!!

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  6. aapa ko naman... congrats...
    ek taraf khana pheka zata hai aur doosri taraf bhookh se tadapta insaan hai..

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  7. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! पेंटिंग मेरी बनाई हुई है!
    आपका ये पोस्ट बहुत बढ़िया लगा! कितने तरह के लोग हमें देखने को मिलता है! एक बच्चे को एक वक्त पेट भर खाना खाने को नसीब नहीं होता और दूसरी ओर बच्चे को इतने तरह के खाने दिए जाते हैं की आधे से ज़्यादा फेक देते है ! हमारे देश की हालत देखकर बहुत बुरा लगता है और अफ़सोस भी होता है की गरीबी कब हटेगी!

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  8. मार्मिक यथार्थ के करीब ले जाती सुन्दर लघुकथा आभार्

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  9. bahut sunade......
    ye har shaher mean aam bat hai....
    lekinn aapne shabdon se jis tarah chitra banaya vah kabile taareef hai...aapko aage bhi padta rahoonga...
    aapka mere blog par bhi swagat hai...

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  10. स्लम डाग मिलिनेयर देख कर बहुत बुरा लगा था पर देखा जाये तो सच की तस्वीर ही थी वो। आपके इस पोस्ट में सच्चाई की वही तस्वीर फिर उभरी है।

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  11. मार्मिक कथा. सचमुच बहुत कुछ होना बाकी है.

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  12. bahut sahi kaha,pet ki aag suraj ki tapish se badi hai,marmik post.dil bhar aaya.

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