मंगलवार, 30 मार्च 2010

भोर की सुगबुगाहट


भोर की सुगबुगाहट

होती है शुरू

हल्के से उजाले के साथ

चिड़ियों की चूं चूं

कुछ अलसायी कुछ अधखुली आंखें

बाथरूम में तेज पानी की धार

हर हर की आवाज।

कहीं पर सूर्य देव को अर्ध्य

हरी ओम का जाप

घण्टे की आवाज

नमाज की अजान।

कहीं किचन में खटपट खटपट

कहीं तेजी से चलते हाथ

बच्चों को स्कूल भेजने की तैयारी

बिस्तर पर आराम फ़र्माते साहब

गरम चाय की चुस्की

अखबार की हेडलाइन।

अधूरी नींद में

बिना मुंह धोये

गोदी में बच्चे उठाये

तेज तेज कदमों से काम पर

पहुंचने की कोशिश करती

कुछ स्मार्ट कुछ भदभद

औरतें

पीठ पर बोरे लादे

सड़क नापने की

कोशिश करते बच्चे।

सभी की भोर

अलग अलग भोर

हां यही तो है

भोर की सुगबुगाहट।

0000

पूनम

58 टिप्‍पणियां:

  1. "आपने भोर को एक रिदम दे दी............."

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  2. अच्छी लगी ये भोर कि सुगबुगाहट....बढ़िया प्रस्तुति

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  3. वाह जी, बहुत उम्दा प्रस्तुति रही

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  4. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  5. कविता पर कुछ कमेन्ट लिखूं इससे पूर्व एक शेर याद आरहा है ""यह कभी नहीं हुआ कि मैं खुद कभी सो कर उठूं /घर के हंगामे ही हर रोज़ जगाते हैं मुझे "" आपने प्रभात ,उष:काल ,ब्रह्म मुहूर्त का जो चित्र खींचा है वह सचित्र वर्णन है .चिड़ियों की , पानी की , आवाज , आराधना के स्वर का बर्णन साथ ही जल्दी जल्दी काम का निवटाना और बिस्तर पर आराम करते और चाय का इंतज़ार करते कुछ जागे से कुछ सोये से साहब और बाद में काम पर जाती औरतों का वर्णन कुल मिला कर बहुत सुन्दर रचना है |शीर्षक भी अच्छा लगा भोर की सुगबुगाहट (यदि यह रचना मेरी होती तो मैं शीर्षक देता "अपना अपना भोर ")

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  6. बहुत सुन्दर,
    अच्छी लगी ये भोर कि सुगबुगाहट....
    बढ़िया प्रस्तुति

    kunwar ji,

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  7. वाह बड़े ही सुन्दरता से आपने भोर की सुगबुगाहट को प्रस्तुत किया है! हर एक शब्द हमारे जीवन से जुड़ा हुआ है ! बहुत बढ़िया लगा!

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  8. सभी की भोर
    अलग अलग भोर
    हां यही तो है
    भोर की सुगबुगाहट।
    Bhor ka sundar chitramak prastutikaran.......
    Shubhkamnayne.

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  9. Kichen, bathroom, chai, akhbaar, bacche, shor, school, bhaari bag! Aur aapne kavita likh di!
    Manna padega... Pata hai kyun? Isliye,ek to sajeev chitran karne mein safal rahee hai rachna aur dooja, ye ki subah ki khoobsoorti ko nahin balki usse judi rozmarrah ki kaarguzaariyon ko aapne kavita ki shaql dee!
    Vadhiya! Changa!

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  10. औरतें

    पीठ पर बोरे लादे

    सड़क नापने की

    कोशिश करते बच्चे।


    सभी की भोर

    अलग अलग भोर

    हां यही तो है

    भोर की सुगबुगाहट।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

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  11. इनमें से कुछ बातों को छोड़कर लगभग सभी हमें भी दिखाई देती हैं.

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  12. पूनम जी ,भोर की इस सुगबुगाहट को पढ अच्छा लगा ।

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  13. बहुत सुन्दर अच्छी लगी ये भोर कि सुगबुगाहट....बढ़िया प्रस्तुति

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  14. poonam ..aapki bhasha v kavita ki lay baha le jati hai ...bhor ka chitran lajwab hai ......
    सभी की भोर अलग अलग भोर ..wah

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  15. Kitni vivdh tarange leke bhor kee shuruaat hoti hai..saare nazare aankhon ke aage se ghoom gaye!

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  16. ...अदभुत,बहुत सुन्दर,बेहद प्रसंशनीय रचना... बहुत बहुत बधाई!!!

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  17. bahut hi rochak aur romanchak drishya uttmpan kiya hai aapne... sunder rachna... pehli baar jharokha par aaya aur man mohit ho gaya !

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  18. भावनाएं काव्य के माध्यम से
    किस तरह प्रकट होती हैं यह
    कहने कि बात नहीं है. आजकल
    खड़ी बोली में ही ज्यादातर काव्य का
    प्रचलन है. मगर काबिले तारीफ है
    शब्दों का चयन और पंक्तिबद्धता
    बहुत सुन्दर "भोर" का वर्णन
    बधाई!

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  19. हल्के से उजाले,चिड़ियों की चूं चूं,बाथरूम में तेज पानी की धार,सूर्य देव को अर्ध्य ,घण्टे..अजान...किचन में खटपट..तेजी से चलते हाथ ...अखबार की हेडलाइन...अधूरी नींद ... बिना मुंह धोये गोदी में बच्चे उठाये तेज तेज कदमों से काम पर पहुंचने की कोशिश करती औरतें...पीठ पर बोरे लादे सड़क नापने की कोशिश करते बच्चे।
    सभी की भोर अलग अलग भोर ...

    बहुत सुन्दर!!
    जिन्दगी के विविध चित्रों का बेहद विश्वसनीय कोलाज...
    आपके हाथ में कलम न होती तो तूलिका होती....
    बधाई

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  20. itnee jeevant prastuti.......samne aa gayee subah ki bela......dikh gaya........har pal albela...:)

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  21. बिलकुल सही कहा आपने..सबसे आराम पतिदेवो को ही हॆ..आराम से चाय की चुस्की लेते हुये...अखबार की हेडलाइन पढते हुये..

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  22. कितनी जीवंत भोर है । बहुत सुंदर ।

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  23. sbki bhor me aapki bhor kuchh is trha chspa hui ki vo bhor apni bhor lgne lgi ye kvita ykinn aapki sadgi ko samne lati hai bhut bhut bdhai

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  24. बहुत अच्छी कविता पढ़ने से छूटी जा रही थी..

    सभी की भोर
    अलग अलग भोर
    हां यही तो है
    भोर की सुगबुगाहट

    -वाह!

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  25. कहते हैं शाम-ए- अवध ,और सुबहे बनारस .वो एक सपने का सच है .
    आपकी ' सुबह ' इन्सान और इंसानियत का .

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  26. एक आम आदमी की सुबह का सजीव चित्रण , एक सराहनीय प्रयास है

    बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें .

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  27. नई पुरानी हलचल से चल कर यहाँ आया
    सुन्दर 'भोर की सुगबुगाहट'में मन को
    मग्न पाया.

    झरोखा मेरे ब्लॉग पर भी आये
    इसी का इंतजार है ,पूनम जी.

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  28. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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