मंगलवार, 21 जुलाई 2015

चार दोस्त अनोखे


   
कानन वन में भालू और बिल्ली की दोस्ती मशहूर  थी।दोनों हमेशा साथ रहते।भालू थोड़ा गंभीर था पर बिल्ली थी नटखट और चुलबुली। साथ ही खेलते और साथ ही स्कूल भी जाते। कभी किसी जानवर ने उन्हें लड़ते हुए नहीं देखा था।
     एक दिन भालू और बिल्ली स्कूल के सामने  वाले मैदान मेँ फुटबाल खेल रहे थे।कहीं से रास्ता भूलकर एक नन्हा चूहा आ गया।चूहे को देखते ही बिल्ली उस पर झपटी और उसे पंजों से पकड़ लिया।चूहा बेचारा चीँ-चीँ चीखने लगा।भालू ने तुरंत बिल्ली को टोका,“म्याऊं रानी छोड़ो-----चूहे को छोड़ दो।”
   “छोड़ क्यूं  दूं?आज मैं इसका नाश्ता करुंगी”—म्याऊं चहक कर बोली।
“अरे म्याऊं रानी---नाश्ते के लिये और भी शिकार मिल जायेंगे-----छोड़ो भी उसे।”भालू ने उसे समझाने की कोशिश की।
“चीं---चीँ-----मैं तो आप लोगों के पास दोस्ती करने आया था।”चूहा चीँ-चीं करके बोला।
“अच्छा चल तुझे छोड़–दूंगी---लेकिन ये तो बता तेरा नाम क्या है?”म्याऊं रानी ने चूहे से पूछा।
  “मेरा नाम-----तो कुछ है ही नहीं।”चूहा रुआंसा होकर बोला।
“चलो आज से तुम्हारा नाम गोलू हुआ।तुम एकदम गोल मटोल हो न।अब आज से तुम भी हमारे दोस्त बन गये।”भालू बोला।म्याऊं रानी ने गोलू को छोड़ दिया।फ़िर तीनों मिल कर फ़ुटबाल खेलने लगे।
      एक दिन भालू,म्याऊं और गोलू के स्कूल में छुट्टी थी।तीनों नदी के किनारे घूम रहे थे।म्याऊं बोली,“भालू भाई मैं तो इस जंगल में रहते-रहते ऊब गयी हूं।क्यों न हम लोग घूमने के लिए कहीं बाहर चलें?”
“पर चलोगी कहां?ये भी सोचा है म्याऊं?”भालू ने पूछा।
  “हां ये तो सोचने वाली बात है।क्यों न हम लोग किसी पहाड़ पर चलें?”म्याऊं सोचते हुये बोली।
“पर कौन से पहाड़ पर ये भी तो बताओ?” भालू ने पूछा।
“हम लोग हिमालय पहाड़ पर चलें तो कैसा रहे?”म्याऊं बोली।
“तुम्हें मालूम भी है हिमालय यहां से बहुत दूर है।वहां भला हम कैसे जा सकते हैं?”भालू ने प्रश्न किया।
“सुनो क्यों न हम चल कर दादी मां से पूछें?वो शायद कोई रास्ता बताएं।”गोलू चूहे ने सुझाया।बस फ़िर क्या था तीनों चल पड़े दादी मां से मिलने।
दादी मां ने उनकी बात बहुत ध्यान से सुनी।फिर बोली,----“तुम लोगोँ को चीकू खरगोश की सहायता लेनी चाहिये।”
“चीकू खरगोश----वो हमारी क्या सहायता कर सकता है।”म्याऊं बोली।
“तुम लोगों को शायद नहीं मालूम चीकू बहुत अच्छा चित्रकार भी है।”दादी बोलीं ।
“ये तो हमें पता है दादी मां।”पर उसके चित्रों से हमें क्या मतलब?”भालू ने पूछा।
   “अरे भाई,चीकू को वनदेवी का वरदान मिला है।उसके पास एक ऐसी पेंसिल है जिससे वह सुबह वन देवी को याद करके जो भी चित्र बनायेगा वो चीज सचमुच सामने आ जायेगी।” दादी समझाते हुए बोलीं।
“अरे वाह तब तो  हम  चीकू से कहकर उड़ने वाला हेलीकाप्टर बनवा लें।उसी से हम हिमालय के पहाड़ पर चलेंगे।”म्याऊं चहकती हुई बोली।
“लेकिन तुम लोग चीकू को भी साथ ले जाना।तभी वो तुम्हारी सहायता करेगा।”दादी मां ने तीनों को समझाया ।
  
अगले दिन सुबह ही भालू,गोलू चूहा,म्याऊं बिल्ली पहुंच गये चीकू के पास।चीकू उस समय वन देवी की पूजा कर रहा था।तीनोँ उसके पास हाथ जोड़ कर बैठ गये।पूजा खतम होने पर उसने उन्हें भी प्रसाद खिलाया।फिर उनसे वहां आने का कारण पूछा।
  भालू ने चीकू को पूरी बात साफ़- साफ़ बता दी।उनकी बात सुनकर चीकू कुछ देर तो सोचता रहा फ़िर बोला, “हूं---काफ़ी दिनोँ से मैं भी हिमालय पहाड़ पर जाने की सोच रहा था। चलो तुम लोगोँ के साथ तो घूमने में मजा आ जायेगा।”
बस चीकू खरगोश  जुट गया हेलीकाप्टर बनाने में।कुछ ही देर में उन लोगों का हेलीकाप्टर बन गया।चारों हेलीकाप्टर पर बैठे और उड़ चले हिमालय पहाड़ की ओर।
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पूनम श्रीवास्तव 

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

ज़िन्दगी

तुम धीरे-धीरे आना
तुम चुपके –चुपके
तुम छइयां छइयां आना
ना धूप लगे डर जाना ।

तुम बन के चंचल हिरनी
वन वन में कुलांचे भरना
मत अंखिया तुम बंद करना
शिकारी बन कर रहना ।

कुछ पांव तले गड़ जाये
ना फ़िकर कोई तुम करना
तुम आगे- आगे चलना
ना पीछे मुड़ते रहना।

तुम अपना पँख फैलाना
बन आजाद परिन्दा
चूमोगी नील गगन को
इक दिन तुम ये तय करना।

खुश रहना तुम हर पल
ना गम के साये में रहना
फूलों के संग संग कांटे
होते फूलों का गहना।
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पूनम श्रीवास्तव

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

हम टीका नहीं लगाते

                  
फ़िलहाल कुछ महीने बीते हो गये इस घटना को।पर मेरे मानस पटल पर वो घटना आज भी अंकित है।जब जब वो वाकया याद आता है दिल में एक बेचैनी सी उठती है।
                            जैसा कि नव रात्रि के दिनों में घर घर में देवी का पूजन भजन कीर्तन की धूम मची रहती है।सारा दिन सारी रात देवी के जागरण से पूरा शहर गुंजायमान रहता है।एक अलग ही खुशी होती है।शाय्यद ये देवी मां के प्रताप के कारण ही होता है।
  नवरात्रि के अन्तिम दिनों में छोटी कन्याओं को देवी व लड़कों को लंगूर के रूप में मानकर उनको भोजन कराया जाता है।इन दिनों इन बच्चों का उत्साह भी देखते बनता है।हां तो इसी नवरात्रि के नवमी वाले दिन मैंने भी बच्चों को भोजन कराया और कुछ उपहार में भी दिया।
      अचानक मेरी निगाह अपनी कालोनी में काम करने वाले सफ़ाई कर्मचारी की लड़की पर पड़ी।वो दूर से ही बड़े ध्यान से ये सब देख रही थी।
        मैंने तुरन्त इशारे से उसे पास बुलाया तो वो खुशी खुशी आ गयी।जैसे ही मैंने उसे टीका लगाने के लिए अपना हाथ उसके माथे की ओर बढ़ाया वो छः साल की छोटी सी बच्ची बोली—“आण्टी,हम टीका नहीं लगाते।”
       मेरे हाथ जहां के तहां रुक गये।मैंने उससे पूछा—“क्यों बेटा,ये तो भगवान का टीका है?”
     तब उस बच्ची ने जो जवाब दिया उसे सुन मैं हतप्रभ रह गयी।वो बोली—“आण्टी हम मुसलमान हैं।हम लोग टीका नहीं लगाते।”
      मेरे हाथ से प्रसाद की प्लेट लेकर वो चली गयी और में किंकर्तव्यविमूढ़ होकर उसे जाता देखती रही।
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पूनम श्रीवास्तव