शनिवार, 13 मई 2017

माँ तुझे प्रणाम




माँ तुझे प्रणाम
शत शत नमन कोटि प्रणाम
माँ तुझे प्रणाम ।

जब मैं  तेरी कोख में आई
तूने स्पर्श से बताया था
ममता का कोई मोल नहीं
तूने ही सिखलाया था ।
माँ तुझे प्रणाम ।

थाम के मेरी उंगली तूने
इस दुनिया से मिलवाया था
सूरज चाँद और धरती तारे
सबके गीत सुनाया था 
माँ तुझे प्रणाम ।

कदम लडखडाये जो मेरे
तूने भी कदम बढाया था
सही गलत की राह भी
तो तूने ही सिखलाया था ।
माँ तुझे प्रणाम ।

ज्यों ज्यों ही बढ़े चले हम
ऊंच नीच की आई समझ
हम सबसे पहले हैं इंसान
तूने हो समझाया था ।
माँ तुझे प्रणाम ।

कभी किसी भी पल में यदि
कोई मुसीबत हम पे आई
अडिग बन चट्टान सी तूने
हर मुश्किल से लड़ना सिखलाया।
माँ तुझे प्रणाम ।

अर्पण है माँ तुझको हरदम
श्रद्धा के शब्द अबोल ये माँ
ममता त्याग धैर्य समर्पण
माँ तुझसे ही सब पाया है।
माँ तुझे प्रणाम ।

सारी दुनिया तुझमें  समाई
सच में तेरा मोल नहीं
तू सबसे अनमोल है माँ  
माँ तुझे प्रणाम ।
००००
पूनम श्रीवास्तव





गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

टी-पाट

टी-पाट
कहानी-पूनम श्रीवास्तव
                       
     
 छनाक की तेज आवाज हुयी और उज्ज्वला कुछ लिखते लिखते चौंक पड़ी।फिर बोली क्या हुआ?क्या टूटा ?अन्दर से डरी सहमी सी आवाज आई,“जी मेम साब वो-वो कहते-कहते वो चुप हो गयी।उज्ज्वला ने कहा—“रुक आती हूं।और वो कलम डायरी बन्द करके उठ पड़ी।रसोई की तरफ़ जाते-जाते वह बड़बड़ाती भी रही—“ओ हो तू तो रोज ही कुछ न कुछ तोड़ती फ़ोड़ती रहती है। आज क्या हो गया?”
   रसोई में पहुंचने पर सिंक पर नजर जाते ही जैसे उसकी जान अटक गयी।उसका नया टी-पाट सिंक में कई टुकड़ों में बिखरा पड़ा था।कमली एक कोने में डरी हुयी खड़ी थी।
           “अरे ये क्या कमली तूने मेरा नया टी-पाट तोड़ डाला?”उज्ज्वला चीखती हुयी बोली।तुझको कितनी बार समझाया है कि संभल कर काम किया कर।लेकिन तू पता नहीं किस दुनिया में खोयी रहती है।
       “जी मेम साहब,गलती हो गयी।पता नहीं कैसे हाथ से फ़िसल कर टूट गया।कमली बड़े मायूस अंदाज में बोली।
          “तू नहीं जानती कमली आज तूने क्या तोड़ डाला।टी-पाट नहीं तूने आज मुझसे मेरा बहुत कुछ छीन लिया।यह केवल टी-पाट ही नहीं मेरी मां की दी हुयी अन्तिम निशानी थी।बिस्तर पर पड़ी मां ने कहा था कि, “जब तुझे मेरी याद आये तो तू उसमें चाय बना कर पीना मुझे लगेगा कि तू अपनी मां के हाथ की बनी हुयी चाय पी रही है।
  उज्ज्वला उसी रौ में बोलती जा रही थी।तू नहीं जानती कमली,“मैंने इसे इतने वर्षों से संभाल कर रखा था।जब मां की बहुत याद आती थी तो उसी में चाय पीती थी। और मुझे ऐसा महसूस होता था कि मां मुझे अपने हाथों से चाय पिला रही हैं।
          कमली बोली, “माफ़ कर दीजिये मेम साहब सच में बहुत बड़ी गलती हो गयी।मैं तो इसकी भरपायी भी किसी तरह नहीं कर सकती।मैं जा रही हूं मेम साहब मुझे माफ़ कर दीजिये।
       उज्ज्वला कुछ नहीं बोली।टूटे हुये कांच के टुकड़ों को बस देखती रही।उसकी आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे।कमली यह दृश्य देख न पाई और सिसकते हुये निकल गयी।मां की यादों में डूबी हुयी उज्ज्वला ने ध्यान नहीं दिया।उसकी तंद्रा तो तब टूटी जब उसके पति प्रकाश ने उसे आवाज लगायी।
     वह  और आवाजें लगाते इसके पहले ही उज्ज्वला रसोईघर से अपने आंसू पोंछते हुये
झट से कमरे में आ गयी।
      “अरे क्या हुआ?ये क्या हुलिया बना रखा है?बैठो-बैठो बताओ क्या बात है।प्रकाश उसे सहारा देकर पास पड़ी कुर्सी पर बैठाता हुआ बोला।
             उज्ज्वला को मौन देख कर उसी ने बात को आगे बढ़ाया—“अच्छा-अच्छा याद आया,सुबह किसी बात को लेकर बहस हुयी थी न। शायद इसी से दुखी हो। अरे यार मियां-बीबी के बीच ये तो बहस होती ही रहती है।बहस न हो तो समस्या का हल कैसे निकलेगा।मैं तो भूल ही गया था और तुम अभी तक उसी बात को लेकर बैठी हो।
         उज्ज्वला ने धीरे से अपनी गर्दन ना में हिलायी।प्रकाश बोले—“अच्छा तो कोई दर्द भरा गीत लिख रही हो जिससे तुम्हारे खुद के आंसू छलक आए।हां यही बात होगीपक्का।
   “नहीं भाईऐसा कुछ भी नहीं है।उज्ज्वला और भी रुआंसी होकर बोली।
तो फ़िर बात क्या है?क्या हो गया?”और अचानक से जैसे उन्हें कुछ याद आया और वो मुस्कुराते हुये बोल पड़े,“अरे सबसे बड़ी बात तो मैं भूल ही गया।लगता है आज मां की बहुत याद आ रही है। हाँ  अब तो यही बात लग रही है मुझे।बिल्कुल पक्की बात।
   मां का नाम सुनते ही उज्ज्वला फ़िर रोने लगी।
   “अरे-रे फ़िर शुरू हो गयी।अच्छा चलो एक काम जो सबसे पहले करना चाहिये वो करता हूं।प्रकाश ने उज्ज्वला के आंसू पोंछते हुये कहा।
  “क्या?”उज्ज्वला बोली।
अरे भाई तुम भी बड़ी अजीब हो।अरे जब मां बहुत याद आती है तो सबसे पहले तुम क्या करती हो?बोलो?”
पर उज्ज्वला ने कोई जवाब नहीं दिया।
अरे भूल गयीतुम्हारी मां के दिये हुये टी-पाट में गरमागरम चाय।जिसमें चाय पीते ही तुम्हें बहुत सकून मिलता है।चलो मैं ही आज उसमें चाय बना कर लाता हूं।प्रकाश भरसक माहौल को सामान्य बनाने की कोशिश करता हुआ बोला।
उज्ज्वला से कुछ बोला न गया।वह प्रकाश के कन्धों से लग कर सिसक पड़ी।
देखो मैं दो मिनट में चाय लेकर आता हूं।प्रकाश ने उसे फ़िर समझाया।
उज्ज्वला बड़े ही दुखी मन से धीरे से बोली,-“अब मां के दिये टी-पाट में मैं कभी चाय नहीं पी पाऊंगी।
क्यों?ऐसा क्यों भला?”- प्रकाश आश्चर्य चकित  होकर बोला।  
“आजा माँ की अंतिम निशानी नहीं रही।वो कमली के हाथों छिटककर टूट गयी।”कहते कहते उज्ज्वला फिर सिसकने लगी।
“ओह तो ये बात है” –प्रकाश भी थोडा दुखी मन से बोला।
  पूरे कमरे में थोड़ी देर तक एक अजीब सी चुप्पी बनी रही।ऐसा लग रहा था आवाज दोनों के गले में फंस कर कहीं अटक सी गयी हो।फिर प्रकाश ने खुद ही पहल की बोलने की और
उज्ज्वला को समझाने लगा।
“देखो उज्ज्वला ---ये सच है कि माँ की दी हुई निशानी बहुत ही अमूल्य होती है—उसका कोई मोल नहीं –और न ही अब दोबारा वो मिल सकती है । मैं जानता हूँ की किसी अमूल्य चीज के खोने का मतलब क्या होता है?और वो भी माँ की दी हुयी –ये भी जानता हूँ की तुम्हें इस बात का बहुत दुःख है---इस बात का दुःख मुझे भी कम नहीं।पर इसकी  कोई भरपाई भी तो नहीं हो सकती ।तुम जरा ये भी तो सोचो की इस दुनिया में जब किसी का भी अस्तित्व नहीं रह पाता। इस दुनिया में कुछ भी अजर अमर नहीं है – हम सभी को एक न एक दिन जाना है तो फिर ये तो इन्सान के द्वारा बनायीं गयी चीज थी --- वो भी तो नश्वर ही थी।”
   उज्ज्वल कुछ न बोल कर बस उसका चेहरा देखे जा रही थी।
“उज्ज्वला तुम इस बात को दिल से न लगा लो की माँ  की दी हुयी निशानी नहीं रही।माँ तो तुम्हारी यादों में –तुम्हारी सांसों में बसी ही हैं ।जब भी तुम ऑंखें बंद करके उन्हें याद करोगी –वो हर वक्त तुम्हें अपने पास दिखाई देंगी।तो जब माँ  हर वक्त तुम्हारे साथ हैं तो टी-पाट के न रहने की बात से मन को दुखी मत करो।अब चलो हम कल ही बाजार जा कर माँ के ही नाम से नया टी-पाट ले कर आयेंगे और उसी में चाय भी पीयेंगे।चलो डार्लिंग अब जरा धीरे से मुस्कुरा दो।” और उज्ज्वला भी धीरे से मुस्कुरा दी ।
          अगले दिन अचनक सबेरे-सबेरे दरवाजे की घंटी बजी।उज्ज्वला ने घडी देखा तो आठ बजा रहे  थे ।वो हडबडा कर उठी –ओह आज बड़ी देर तक सोई –कहते हुए वो दरवाजे की तरफा बढ़ी।जैसे ही उसने दरवाजा खोला सामने कमली हाथो में कोई बड़ा सा पैकेट लिए खड़ी थी ।
“अरे कमली तुम,आओ अन्दर आओ।”मैंने तो सोचा था की मेरे इतना डांटने पर तुम काम तो छोड़ ही दोगी।”
कमली बोली,“अरे में साहब ऐसा क्या कह दिया आपने?”और आगे बढ़ कर वो पैकेट उज्ज्ज्वला को पकड़ा दिया ।
“ये क्या ?”उज्ज्वला ने पूछा।
      “मेम  साहब जी—हम लोग भी जी जान से मेहनत करते हैं।दो पैसे कमाने के लिए ही तो।जिससे घर का गुजारा हो सके ।हमारे भी बच्चे पढ़ लिख कर आप लोगों की तरह इन्सान बन जाएँ।लेकिन मेम साहब हम लोग किसी के थोड़े किये को बहुत मानते हैं ।पर आप लोगों ने तो बहुत कुछ किया मेरे लिए।आपका इतना सामान टूटा मुझसे पर आपने कभी कुछ नहीं कहा।कल मालकिन का दिया हुआ टी-पाट मुझसे टूट गया।वो आपकी माँ की याद थी।---आपने फिर भी मुझे ज्यादा नहीं डाटा ।मेम साहब हम भी इंसान हैं।और इंसान की पहचान भी बखत करा ही देता है।”कहते –कहते कमली रोने लगी।
“अरे-अरे कमली बहुत हो गया –बहुत रो चुकी अब चुप हो जाओ ।”
        आंसू पोंछते हुए कमली बोली-“मेम साहब यहाँ से घर जाने पर मेरा भी मन नहीं लगा।बार-बार आपका रोता हुआ चेहरा और टी-पाट आँखों के आगे नाचता रहा।फिर मैं उठ गयी मन में सोचते हुए कि ये अच्छा नहीं हुआ।मैंने कुछ पैसे इकट्ठे किये थे।उन्हें लेकर बाजार गयी और फिर जो अच्छा लगा पैकेट में बंधवा लिया।कहते हुए वह थोडा रुकी।
  तब तक उज्ज्वला बोल पड़ी—“अरे हाँ ये तुमने मुझे काहे का पैकेट दिया है और किस लिए दिया ?जबकि न तो आज मेरा या उनका जन्मदिन है।न ही कोई और कारण । तू बता तो इसमें है क्या?”
        “अच्छा रुक –मैं ही खोलती हूँ।”यह कहते हुए कुर्सी पर बैठ कर वो धीरे-धीरे पैकेट खोलने लगी।फिर अचानक ही ख़ुशी से बोली—“अरे नया टी-पाट ?” कहते हुए उसकी आँखों से आंसू  निकल रहे थे।
  “जी मेम साहब –मेरे पास जो थोडा बहुत पैसा था उसी से जो बन पड़ा खरीद लाई।वैसे तो आपका बहुत सा सामान मुझसे टूटा पर माँ का दिया हुआ टी-पाट टूटना मुझे अन्दर से दुखी कर  गया।मेम साहब ---बहुत ज्यादा महंगा तो नहीं है –पर देखने में यही सबसे अच्छा लगा था सो—”
“बस कमली बस तू मुझे और शर्मिंदा मत कर ” –उज्ज्वला उसे रोकते हुए बोली।
“जानती है आज ही हम दोनों टी-पाट खरीदने के लिए बाहर जाने वाले थे।पर बहुत अच्छा किया जो तू इसे ले आई।थैंक्यू कमली।“
“अच्छा मेम साहब आपको यह अच्छा लगा मेरे दिल को सुकून मिल गया है । और कोई भूल चूक  हो गयी हो तो माफ़ करियेगा।चलती हूँ मेम साहब ।”यह कह कर कमली  वापस जाने के लिए पलटी तभी उज्ज्वला ने आगे बढ़ कर उसका हाथ  थाम  लिया।
“अरे कमली तू जा कहाँ रही है?”
“मेम साहब कोई दूसरा कम देख लूंगी।“
“अच्छा-- ”मुस्कुराते हुए उज्ज्वला बोली –“तो तुम्हारी ये मालकिन इतनी बुरी हो गयी है कि तुम अब यहाँ काम तक नहीं करना चाहती ?”
“अरे नहीं मेमसाहब आप तो बहुत अच्छी हो और साहब जी भी ---बस मैं तो ऐसे ही-- ”कह कर वो चुप हो गयी।
“तू कहीं नहीं जाने वाली कमली।तेरे साथ मैं अपना सुख-दुःख भी बाँट लेती थी।कुछ कह कर अपना मन हल्का कर लेती थी । फिर भी तू जाने की बातें कर रही है।क्या मुझसे नाराज है?”
      तभी अन्दर से आवाज आई—“अरे ये कौन कहाँ जा  रहा  है?कौन नाराज है जरा मैं भी सुनूँ ?”हँसते हुए प्रकाश ने कमरे में कदम रखा।
     “देखिये न ये कमली जाने—“
“अरे मैं समझ गया –समझ गया ---और कमली कोई कहीं नहीं जा रहा है।चलो भाई फ़टाफ़ट गरम चाय नए टी-पाट में पीयेंगे।तू अन्दर जा करा अपना काम कर गरमागरम चाय—।” 
“साहब आपने मुझे माफ़ कर दिया ----सचमुच आप लोग बहुत अच्छे हैं।भगवान सारी खुशियाँ  आप दोनों को दें।कह कर वो चाय बनाने के लिए जाने लगी ।तभी प्रकाश ने आवाज दी—“कमली—।”   
“जी साहब –कमली अन्दर जाते जाते फिर पलट गयी –उसका चेहरा फिर पीला  पड़ गया।
प्रकाश हँसे—“अरे भाई मैं तुम्हें डाट नहीं रहा हूँ मैं तो ये कह रहा की ---वो अब नाटकीयता के मूड में आ गए थे ।हाँ तो मैं ये कह रहा था की---”
“अरे भाई क्या कर  रहे हैं आप ? वो बेचारी सहमी खड़ी है।आप क्या कहना चाहते हैं उससे?”
     “ओहो –तुम भी परेशान हो गयीं –मैं तो दोनों का मूड ठीक करने की कोशिश कर रहा था ।“प्रकाश ठहाका लगा कर बोला।
  “चलिए अब ठीक।अच्छा तो कमली आज से तुम्हारी तनख्वाह में सौ रुपये की बढ़ोतरी की जा रही है।देखो कुछ कहना मत।हम लोगों को भी तुम जैसे अच्छे लोगों की जरुरत होती है।इंसानियत का यही तकाजा है।”
    “चलो लेक्चरबाजी ख़तम  अब हो जाये गरमागरम चाय नए नए टी-पाट में।”क्यों मैडम प्रकाश ने कहा।तो उज्ज्वला भी खिलखिला पड़ी और कमली हँसते हुए अन्दर की ओर भागी।
                      ०००

पूनम श्रीवास्तव 

गुरुवार, 30 जून 2016

बरसो बदरवा

घनन घनन अब बरसो बदरवा
धरती का हियरा तड़पत है
खेतिहर की अंखियां हरदम
अंसुअन से अब भीगत हैं।

राह निहारे पंख पसारे
पाखी एकटक देखत हैं
अब बरसोगे तब बरसोगे
मन में आस लगावत हैं।

बिन पानी सब सूना सूना
जीव सभी अब भटकत हैं
दिखे पानी की एक बूंद
सब पूरी जान लगावत हैं।

बड़ी बेर भई बादल राजा
सावन सब कहां निहारत हैं
नैनन में अंसुअन भर भर के
सब अपनहि देह भिगोवत हैं।
0000
पूनम श्रीवास्तव


गुरुवार, 23 जून 2016

बेचारा

वो अनाथ हो गया था जब उसकी उम्र आठ साल की थी।सर पर से मां-बाप दोनों का साया उठ गया।बिखर गया था उसका बचपन और वो रह गया था अकेला इस पूरी दुनिया की भीड़ में।
   वो था बहुत ही गरीब परिवार का।किसी ने भी आगे बढ़ कर उसका हाथ नहीं थामा।किसी ने उसके आंसू नहीं पोंछे।पर जब लोग उस मासूम को देखते तो सबके मुंह से बस एक आह सी निकलती—“अब क्या करेगा ये बेचारा?क्या किस्मत लेकर पैदा हुआ बेचारा? कैसे ज़िन्दगी पार करेगा?हाय! अनाथ हो गया बेचारा।” उसका नाम ही बेचारा पड़ गया था।बस हर वक्त जब वह अपनी झोपड़ी से बाहर निकलता उसके कानों में वही आवाज़ें गूँजती।सुनने को मिलती जिसे सुनते-सुनते उसका मन परेशान हो उठता
      उस पर ईश्वर ने एक कृपा की थी।वो दृढ़ निश्चयी था। मज़बूत इरादों वाला।मां–बाप को गुज़रे छ: महीने हो गये थे।धीरे धीरे वह भी अपने को समझाने लगा था।जब वो सोता तो उसे सपने में मां का कहा वाक्य कानों मे सुनायी देता-“बेटा जिसका दुनिया मे कोई नही होता उसका भगवान साथ देता है।”बस यही पंक्तियां उसके मस्तिष्क मे घर कर गयी थीं।वह ईश्वर के सामने बैठ रोज़ हाथ जोड़ता और कहता-“हे भगवान मुझे इतनी शक्ति दे दो कि मैं कुछ कर सकूं और अपने साथ साथ औरों का भला कर सकूं।ईश्वर ने उसकी बात सुन ली।अब लड़के ने मन मे निश्चय किया उसे कुछ करना है कुछ बनना है।
  कच्ची उम्र,भारी काम तो वह कर नहीं सकता था।पढा लिखा भी नहीं था। सो उसने हल्के काम करने शुरु किये। साहब लोगों की गाडियां साफ़ करता,जूते पालिश करता,साग सब्जी ला देता था।बदले में उसे भरपेट खाना व पगार मिल जाती थी।जितनी भी थी वह उससे सन्तुष्ट था।दस बरस बीत गये थे।अब वह जवान हो चला था। अब उसका काम पहले जैसा नहीं था बल्कि और बडे बडे काम करने लगा था व
        वह लकडियां काटता उनके गठ्ठर बनाता और उन्हें शहर बेचने ले जाता।माल ट्रकों पर लदवाता और उन्हें सही जगह  भेजता था।वह काम के प्रति पूर्ण रूप से निष्ठावान था। उसके काम से कभी किसी को कोई शिकायत नहीं रहती थी। सभी लोग उसके काम से खुश रहते थे।
एक दिन कि बात है जब वह लकड़ियों के गठ्ठर बना रहा था तो उसकी नज़र दूर पे के पास बैठे एक लके पर पड़ी।जो बमुश्किल 7-8 साल का था।वह उस लके के पास गया प्यार से सिर सहलाते हुए पूछा-“क्या भूख लगी है?”उस लके ने हां में सिर हिलाया।तो वह लका अपना काम छो कर पास की दुकान से दही जलेबी व ब्रेड ले आया और उस बच्चे से बोला-‘लो खाओ”।बच्चा भूखा तो था ही।किसी का प्यार पाकर उसकी आखों से झर झर आंसू बहने लगे।लडके ने कहा-“रो मत, पहले खा लो।” फ़िर लका झट्पट खाने क सामान चट कर गया। तुम कहां रहते हो?लके ने ना मे गर्दन हिलाई।तब वह लका उस बच्चे को लेकर अपने घर आ गया।और बच्चे से बोला-“चलो आराम कर लो तुम्।तब तक मैं अपना अधूरा काम पूरा कर के आता हूं ।”
       सुबह जब वह सो कर उठा तो उसे बहुत ही अच्छा लग रहा था।उस समय वह लडका अपने और बच्चे के लिये चाय बना रहा था।तब बच्चे ने कहा-भैया मै भी आपके साथ काम पर चलूंगा। थोड़ी देर सोचने के बाद लड़के ने पूछा-तुम्हारा नाम क्या है?बच्चे ने कह-रवि।और उसने फ़िर उस लड़के कि तरफ़ देखा और पूछा- भैया आपका नाम क्या है? लड़के ने कहा कि कुछ भी कह लो।मुझे तो बेचारा नाम इसलिये याद है क्योंकि बचपन में अपने लिये सिर्फ़ यही नाम मैंने सुना है।और फ़िर हंस पड़ा। अच्छा चलो चलते हैं काम पर ।फ़िर रवि को साथ लेकर वह माल ढोने की जगह गया।फ़िर उसने रवि से कहा तू चुपचाप यहीं बैठा रह।कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है।काम खत्म होते ही साथ मे घर चलेंगे।थक-हार कर दोनों घर लौटे, थोड़ा चाय पानी किया फ़िर ज़मीन पर चटाई बिछा कर लेट गये।रवि तो सो गया लेकिन लड़के को रात भर नींद नही आयी।
     वो कुछ सोच रहा था।फ़िर उसने रवि की तरफ़ देखा।रवि को देखते देखते उसके मन में अपने बचपन के दिन याद आ गये।बचपन में जो गरीबी देखी थी उसने उसे याद कर ही वह सिहर उठा।अनाज के एक एक दाने को वो लोग मोहताज रहते थे।ईश्वर किसी को वैसे दिन न दिखलाए।उसकी आंखों में आंसू झिलमिला उठे।उसने अपने मन में निश्चय किया कि वह रवि जैसे और बच्चों को अपने साथ रखेगा।ताकि कोई उन्हें बेचारा न कह सके।ऐसे किसी बच्चे को कोई अनाथ न कह सके।तब उसकी आंखों में दृढ़ निश्चय और संतोष का भाव दिखायी पड़ा।फ़िर वह भी चैन की नींद सो गया।
     सबेरे उठते ही बड़े उत्साह से उसने रवि से कहा—“रवि,आज से हम अपने साथ उन बच्चों को रखने की कोशिश करेंगे जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है।“
“बात तो सही है भैया आपकी---पर इतने सारे बच्चों को खान खिलाने के लिये पैसा कहां से आयेगा हमारे पास?” रवि ने उत्सुकता से पूछा।
लड़का रवि की बात सुन कर हंस पड़ा—“अरे पगले,किसी को कोई थोड़े ही खिलाता है।वह तो भगवान हैं जो सबके नाम का अन्न बनाते हैं।” कहने को तो वह कह गया।पर उसने अपने मन में सोचा कल से मैं और कड़ी मेहनत करूंग तभी अपने घर आये सभी बच्चों के चेहरों पर खुशी ला सकूंगा।
   अगले दिन सुबह उसने जल्दी से उठकर उसने जल्दी से चाय पिया और रवि को भी देकर काम पर चला गया।वह मेहनत और सिर्फ़ मेहनत करना चाहता था ताकि अन्य बच्चों का भविष्य भी संवारा जा सके।
    धीरे धीरे उसके यहां बच्चों की संख्या बढ़ती गयी।बच्चे भी अपने भइया के अनुरूप ही छोटे छोटे काम करके उसकी मदद कर देते थेऍहल पड़ा था अब आहिस्ता आहिस्ता उनकी खुशियों का संसारअर बच्चे का चेहरा वहां खुशी से चमकता रहता था।पर उन बच्चों की ये खुशी भी ज्यादा दिन तक नहीं चल सकी।
   एक दिन वह लड़का कुछ सामान ट्रक में लदवाकर सड़क के उस पार जा रहा था कि तभी तेजी से भागती गुयी एक कार ने उसे टक्कर मार दी। और वो वहीं पर लहूलुहान हो कर गिर पड़ा।उसके सर में गम्भीर चोट आई थी। वह वहीं तड़प कर हमेशा के लिये शान्त हो गया। आस-पास लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी।उस भीड़ में कुछ उसे जानने वाले भी थे।किसी ने चिल्लाकर कहा—“अरे ये तो वही बेचारा है।
   तभी वहां पर उसके साथ रहने वाले बच्चे भी आ गये ।शायद किसी ने उन्हें भी खबर कर दी थी।उसके लिये लोगों के मुंह से बेचारा शब्द सुनकर सारे बच्चे चीख पड़े---मत कहो उन्हें बेचारा---वो बेचारे नहीं हमारे भगवान थे।उन्हीं की बदौलत आज हम कुछ करने लायक हो गये।---वो तो सभी के आदर्श थे।महान थे। हम सभी न बेचारे हैं न ही अनाथ।
   उन सभी बच्चों की आंखें नम हो आईं थीं।
उन सभी बच्चों ने मिलकर अपने बड़े भैया का अन्तिम संस्कार किया।और उनके घर के सामने उनकी मूर्ति स्थापित कर उन्हीं के आदर्शों पर चलने लगे।
      0000
पूनम श्रीवास्तव
               


रविवार, 19 जून 2016

पिता हो गये मां

पितृ दिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। आज में आपको पढ़वा रही हूं प्रदीप सौरभ की एक बहुत भावनात्मक कविता।


पिता हो गये मां

पिता दहा्ड़ते
मेरा विद्रोह कांप जाता
मां शेरनी की तरह गुत्थमगुत्था करती
बच्चों को बचाती
दुलराती
पुचकारती
मां की मृत्यु के बाद
पिता मां हो गये।

पिता मर गये और मां ने नया अवतार ले लिया
सौ साल पार कर चुकने के बाद भी
वे खड़े रहते
अड़े रहते
वाकर पर चलते
फ़ुदक फ़ुदक
सहारे पर उन्हें गुस्सा आता
वे लाचारगी से डरते।

कभी-कभी अपने विद्रोह पर खिसियाता मैं
क्षमाप्रार्थी के तौर पर प्रस्तुत होता
पिता बस मुस्कुरा देते
अश्रुधारा बह उठती
पिता मां की तरह सहलाते।

फ़िर एक दिन वे मां के पास चले गये
उनके अनगिनत पुत्र पैदा हो गये
कंधा देने की बारी की प्रतीक्षा ही करता रहा मैं
और वे मिट्टी में समा गये।

अक्सर स्मृतियों के झोंके आते
गाहे-बगाहे रात-रात सोने न देते
विद्रोह और पितृत्व की मुठभेड़ में
पितृत्व बार बार जीतता
निरर्थक विद्रोह भ्रम है और पितृत्व सत्य।

पिता मैं भी बना
दो बेटियों का
पिता क्या होते हैं तब यह मैंने जाना।

पिता बरगद होते हैं
पिता पहाड़ होते हैं
पिता नदी होते हैं
पिता झरने होते हैं
पिता जंगल होते हैं
पिता मंगल होते हैं
पिता कलरव होते हैं
पिता किलकारी होते हैं
पिता धूप और छांव होते हैं
पिता बारिश में छत होते हैं
पिता दहाड़ते हैं तो शेर होते हैं।
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प्रदीप सौरभ:

हिन्दी के चर्चित कवि,पत्रकार और लेखक। मुन्नी मोबाइल उपन्यास काफ़ी चर्चित।“तीसरी ताली”,” “देश भीतर देश” तथा “और बस तितली” उपन्यासों के साथ 2014 में नेशनल बुक ट्रस्ट से विज्ञापन और इलेक्ट्रानिक माधयमों पर केन्द्रित पुस्तक  भारत में विज्ञापन।कानपुर में  जन्म।परन्तु साहित्यिक यात्रा की शुरुआत इलाहाबाद से। कलम के साथ ही कैमरे की नजर से भी देश दुनिया को अक्सर देखते हैं।पिछले 35 सालों में कलम और कैमरे की यही जुगलबन्दी उन्हें खास बनाती है।गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत। लेखन के साथ ही कई धारावाहिकों के मीडिया सलाहकार।