शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

मुस्कान मत छीनिए


  (आज 31 जुलाई को मेरे बाबू जी प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार आदरणीय प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की पुण्य तिथि है।2016 की 31 जुलाई को ही 87 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था।इस बार कोरोना संकट को देखते हुए हम सभी  उनकी स्मृति में कोई साहित्यिक आयोजन भी नहीं कर सके।इसी लिए मैं आज अपने ब्लॉग “झरोखा ” पर मैंने उनकी एक कहानी “मुस्कान मत छीनिए” प्रकाशित कर रही हूं।क्योंकि उनकी रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।)

(प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव )
मुस्कान मत छीनिए
                   
                                                                                       

            मैं मुंबई की एक बडी कम्पनी में अधिकारी हूं। अपनी सोसायटी में मेरा बड़ा मान सम्मान है।एक बेटे और पत्नी से भरी पूरी मेरी खुशहाल जिन्दगी है।कोई चिन्ता नहीं. पर क्या हुआ कि अचानक एक बात ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी।
       ‘‘ सर, आप हमारे स्कूल के चेयरमैन हैं।हमारे सालाना जलसे की अध्यक्षता भी आप को ही करनी है।बस, इस बार कुछ ऐसा बोलिए कि जो हमारे बच्चों के मन को छू लें। अगर कहीं यह बात आप की जिन्दगी से जुडी हो तो कहना ही क्या।बहुत प्रभाव डालेगी सर !’’ ये शब्द थे हमारे स्कूल के हेड मास्टर साहब के जो उन्होंने परसों मुझसे कहे थे।ये वही शब्द थें जिन्होंने मुझे परेशान कर दिया था।

    लगता है ईश्वर ने ही मेरी सहायता की।अचानक मुझे अपने पिता जी वाली घटना याद आ गई।बस, फिर क्या था. मैं प्रसन्नता से खिल उठा।मिल गया मुझे रास्ता।सचमुच यह घटना कोई मामूली बात नहीं थी।मन के छू लेने वाली भी और मेरी जिन्दगी से जुड़ी हुई भी।

   स्कूल के सालाना जलसे का दिन भी आ पहुँचा।सभी औपचारिक कार्यक्रम पूरे हो गये।अन्त में मुझसे दो शब्द बोलने का आग्रह किया गया।मैंने देखा हजारों आँखों में एक गहरी उत्सुकता झलक रही थी।

       मैंने बोलना शुरू किया - ‘‘आदरणीय शिक्षक और अभिभावकगण तथा प्यारे बच्चों, मैं कोई लम्बा चौड़ा भाषण देने वाला नहीं हूँ।बस,एक दिलचस्प घटना सुनाता हूँ।इसमें आप को अवश्य आनन्द आयेगा।कुछ महीने पहले गाँव से मेरे पिता जी कुछ समय मेरे पास रहने के लिये मुम्बंई आये थे।हम लोगों ने दिल से उनका स्वागत किया।बताता चलूँ, मेरे पिताजी बडे मस्त मौला है।उन्हें अंगे्रजी तो दूर हिन्दी भी ठीक से नहीं आती।ऊपर की ओर खुंटियाई हुई धोती और कुर्ता उनका पहनावा है।पर उन्हें इन बातों की कोई चिन्ता नहीं थी।वे सबसे कहते मैं तो अपने बेटे के पास आया हूं।उसके परिवार के साथ रहूँगा।न मुझे मुम्बई शहर घूमना है, न यहाँ के नाच तमाशे देखने हैं।     

लेकिन मैं सोचता - पिता जी पहली बार मुंबई आये हैं।हम उन्हें यहाँ की हर चीज  दिखायेंगे।अच्छे अच्छे होटलों में खाना खिलायेंगे।

एक दिन हम लोग जिद करके उन्हें एक पाँच सितारा होटल में ले गये।हमारी  मेज पर खाने की अच्छी अच्छी चीजें आयीं पर पिता जी के दाँत कमजोर थे।इसलिए उन्होंने खाने में कोई दिलचस्पी नही दिखाई।हाँ चलते चलते उन्होंने कुछ नमकीन अपनी धोती में गांठ लगा कर रख ली।सोचा होगा, घर चलकर इन्हें सिलबट्टे पर कुचलवा कर आराम से खाऊँगा।दुर्भाग्यवश होटल की लाबी में उनका पैर फिसला और वे गिर पडे़।सारी नमकीन कीमती कालीन पर बिखर गई।

प्रिय बच्चों, तुम सोचते होगे, मै बड़ा शर्मिन्दा हुआ हूँगा।पिता जी पर बिफर पडा हूँगा। उन्हे आगे से किसी आलीशान जगह न ले जाने की कसम खायी होगी।पर साहब, ऐसा कुछ भी नही हुआ।

मैंने बडी विनम्रता से उन्हे सहारा देकर उठाया।फिर हँसते हुए कहा-मजा आया न पिता जी।अब हम अगले रविवार को फिर यहाँ आएंगे।पिताजी ने भी तुरन्त हाँ कर दी।उन्हें उस जगह बडा आनन्द आया था।

        अचानक एक छात्र ने खडे़ होकर पूछा--‘‘ सर, क्या आप जरा भी शर्मिन्दा नहीं हुए ? कहाँ आप की यह पोजीशन, कहाँ आपके पिताजी की देहाती वेशभूषा।फिर उस आलीशान होटल के लोगों ने भी यह नजारा जरूर देखा होगा।’’

मैने तुरन्त हँस कर कहा -- ‘‘ प्यारे बच्चों भूल जाओ यह बात।आखिर वे मेरे पिता थे।उनकी अपनी गाँव की बोली है।वे कहीं भी जायें, घोती में ही रहते हैं।होटल से नमकीन उठा लिया ताकि बाद में खा सकें।उन्हें जो अच्छा लगता है करतें हैं।इसमें क्या हुआ, मुझे क्यों शर्म आए।उनका अपना स्वभाव है, अपनी आदतें हैं।उनकी अपनी जीवन शैली है।साठ सत्तर साल से वे इसी तरह जीते चले आ रहे हैं।उन्हें बदलने का अधिकार किसी को नहीं है।वे किसी को नुकसान तो नहीं पहुंचाते।केवल अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार चलतें है।’’

बच्चों, मैं होटल वालों की चिन्ता भी क्यों करता।उन्हें अपना भुगतान और टिप्स मिल ही जाते थे।मुझे अपने पिता जी की खुशी की चिन्ता रहती है, और किसी बात की नहीं।मेरी पत्नी को भी अपने ससुर जी पर नाज है।मेरा बेटा गर्व से अपने साथियों को अपने बाबा के बारे में बताता है।
‘‘ खैर, यह तो हुई मेरी अपनी बात।अब तुम कुछ अपने बारे में, अपने यहाँ के बारे में बताओ।हाँ हाँ, संकोच मत करो।देखो, मैने अपने पिता जी के बारे में कैसा बताया।’’

               मेरी इस बात से उत्साहित होकर एक छात्र बोला --‘‘ सर मेरे पिता एक बडे़ इंजीनियर हैं।लेकिन हमारे यहाँ तो जब कोई गाँव से आता है, चाहे वह बाबा दादी ही क्यों न हों, हम लोग कुछ परेशान से हो जाते हैं।उन्हें बाहर घुमाना फिराना तो दूर, बाहर के लोगों से भी नहीं मिलने दिया जाता।

एक दूसरे छात्र ने बेबाकी से अपने घर का राज खोला --‘‘ सर मेरी मम्मी ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं हैं।अंग्रेजी तो बिल्कुल नहीं जानती।इसीलिए पापा उन्हें बाहर ले जाने से कतराते हैं।कहीं छुरी काँटे से खाना पड़ गया तब क्या होगा।’’

इसी तरह और भी बच्चे बोले।मुझे बहुत अच्छा लगा।अंत में मैंने उनसे कहा-- ‘‘ देखो बच्चों, लोग क्या सोचेगें या क्या कहेगें, यह सोचना हमारा काम नही है।उन्हें सोचने कहने दीजिए।अपनों के साथ अपनों जैसा व्यवहार कीजिए।क्यों किसी को बाध्य किया जाय कि वह छुरी काँटे से खाना खाये या पैंट कमीज पहने।गैरों की खुशी के लिये हम अपनों की मुस्कान तो नही छीन सकते प्यारे बच्चों।हम किसी को मुस्कान देते हैं तो समझों उसे जिन्दगी का सबसे बडा तोहफा दे रहे हैं।’’

         मेरे इन दो शब्दों के बाद लोगों के चेहरों पर मुस्कान और प्रसन्नता साफ नजर आ रही थी।हाल तालियों से गूँज रहा था।लेकिन मेरे लिए यह सब याद रखने वाली बात नहीं थी।मैं तो बस प्रसन्न था, मैंने अपने ही जीवन के एक सच से उन्हें कुछ देने की कोशिश की।
                                0000



लेखक-प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।31जुलाई2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन।शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम00।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र पत्रिकाओं सरस्वती,कल्पना, प्रसाद,ज्ञानोदय, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,कहानी,नई कहानी, विशाल भारत,आदि में कहानियों,नाटकों,लेखों,तथा रेडियो नाटकों, रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।
     आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र मृत्यु पर्यंत जारी रहा। 2012में नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया से बाल उपन्यासमौत के चंगुल में तथा 2018 में बाल नाटकों का संग्रह एक तमाशा ऐसा भी” प्रकाशित।


रविवार, 15 सितंबर 2019

यात्राएं

फोटो क्रेडिट:हेमंत कुमार 

यात्राएं
ये यात्राएं भी
कितनी अजीब होती हैं।

जैसे हम गुजरते हुए
टेढ़े मेढे रास्तों से
नदी नालों पहाड़ों के
सौन्दर्य को देखते
सराहते,आश्चर्यचकित होते
अपने पीछे छोड़ते हुए
आगे बढ़ते जाते हैं
अपनी अपनी मंजिल की ओर।

ठीक वैसे ही
हमारी जिन्दगी का सफ़र भी
कभी आसान तो कभी कठिन
और दुरूह होता जाता है।

पर ये यात्राएं हमारी
बहुत मददगार होती हैं
जहाँ सफ़र में
हम एक दूसरे को
धकियाते ठेलते झगड़ते
अपनी अपनी जगह पर
कब्ज़ा करने में
जूझते रहते हैं
पर अपने स्वार्थवश
ये नहीं सोचते कि
हमारी इन हरकतों की वजह से
दूसरों को तकलीफ हो सकती है।
तो क्यों न हम सब
इन्हीं टेढ़े मेढे
रास्तों की तरह
जाने अनजानों को अपनाते
गले लगाते
एक दूसरे की मदद करते
अपने सुख दुःख को
एक दूसरे से बाटते
अपनी अपनी समस्याओं
को भी झेलते
हंसते हंसाते इसी तरह
अपनी जिंदगी का
सफ़र पूरा करें।
०००
पूनम श्रीवास्तव


मंगलवार, 30 जुलाई 2019

कहानी--बेटी


(कल 31जुलाई को मेरे स्व०पिताजी(श्वसुर जी)आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की तीसरी पुण्य तिथि है।इस अवसर पर पाठकों के लिए प्रस्तुत है उनकी एक कहानी “बेटी”। यह कहानी पिता जी ने सन 2010 में लिखी थीबेटियों को समाज में उचित स्थान दिलाने के एक प्रयास वाली यह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 2010में थी।–-पूनम श्रीवास्तव)

                          बेटी


प्रेमस्वरुप श्रीवास्तव
          शेफाली आज बेहद खुश थीइसलिए नहीं कि शहर के एक प्रतिष्ठित कालेज में उसे एडमिशन मिल गया थावह इतनी टैलेन्टड थी कि उसे एडमिशन पाने की कोई चिन्ता नही थीउसकी खुशी की वजह यह थी कि जब से पापा यहां ट्रांसफर होकर आये वे इसी बात को लेकर रात दिन परेशान रहते थेउनकी वह परेशानी आज दूर हो चुकी थी
                लेकिन पापा के पास तो परेशानियों का भण्ड़ार थाएक जाती तो दूसरी निकल आती  शेफाली का कालेज घर से काफी दूर थावे नजदीक के किसी कालेज में एड़मिशन चाहते थेपर कालेज स्टैडर्ड हो और करीब भी, ये दोनो बातें एक साथ संभव नही थींअब शेफाली अकेली इतनी दूर कैसे जायेगीउस रूट पर हर दस मिनट पर आटो आते आते जाते थेपर इससे क्या हुआजमाना खराब हैशेफाली का आना जाना कैसे सुरक्षित होगावैसे उनका आफिस उधर ही थापर शेफाली उनके साथ नही जा सकती थी पीरियड के हिसाब से उसे कभी देर तो कभी सबेरे जाना होगा
                शेफाली ने पापा को समझाया -पापा, आप क्यों इतनी चिन्ता करते हैं मैं अब छोटी सी बच्ची तो रही नहीं मै किसी भी परेशानी से निपटने में सक्षम हूँ हाँ, आप से आने जाने में काफी पैसे लगेंगेंइसलिए आप मुझे एक स्कूटी खरीद दीजिए तो पैसे और समय, दोनो की काफी बचत हो सकती है
                पापा चौंक पड़े, शेफाली महानगर की इतनी भीड़ भाड़ वाली सड़क पर स्कूटी चलायेगी, तरह तरह के एक्सीडेन्ट की काल्पनिक तस्वीरें उनके जेहन में नाचनें लगीं, अखबार इन्ही खबरों से पटे रहते है
                पापा के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें देखते ही शेफाली हँस कर बोली-पापा, मै जानती हूँ, मेरी इस बात से आप क्यों चिन्ता में पड़ गये, मै लड़की हूँ न, डरिये मत पापा, आपकी यह बेटी तो एक दिन आकाश की ऊँचाइयों में छलांग लगाकर दिखयेगी।”
                “नही बेटी मै यह नही करूँगा, आटो मे जो भी पैसे लगते है लगने दे, वह तेरी स्कूटी से ज्यादा सुरक्षित साधन है।” पापा बोले
                “लेकिन पापा, यहाँ तो भीड़ इतनी है कि आटो में जगह पाने के लिए मेरा बड़ा वक्त लगेगा, छोटे बड़े सभी तो अपने अपने साधन से आ जा रहे हैं, अब एक्सीडेंट के डर से कोई अपने घर तो नहीं बैठा रहता
लेकिन शेफाली......पापा और कुछ बोलते कि शेफाली ने बात बीच में ही काट दी........ पापा आपके इसी भय ने क्या गौरव भैया के पूरे कैरियर को नहीं प्रभावित कर दिया उन्होंने किस हौसले से डाक्टरेट की डिग्री हासिल की थी़ किन्तु जब पोर्ट ब्लेयर के गर्वनमेंट कॉलेज में उनका एप्वाइंटमेंट हुआ तो आपने उन्हें नहीं जाने दिया
                “पोर्ट ब्लेयर का मतलब जानती है तू ? अंग्रेजों के जमाने का काला पानी, अंडमान निकोबार, भला इतनी दूर जाने की इजाजत मैं कैसे देता, जिधर भी नजर डालो बस समन्दर ही समन्दर
अब वह जमाना नहीं रहा पापा, आज दूरियों का कोई मतलब नहीं होता, फिर बाद में उनका तबादला दिल्ली भी हो सकता था, या किसी भी सेन्ट्रल कॉलेज मेंसमाज कल्याण विभाग में सहायक निदेशक के पद पर उनकी नियुक्ति बाड़मेर जैसलमेर जोन में हो रही थी
हाँ हाँ, मगर बेटी वह रेगिस्तानी इलाका है, एक एक बूँद पानी के लिए तरस जाते हैं लोग, फिर पाकिस्तान का बार्डर भी करीब, हमेषा जान का खतरा, मैंने उसे इसीलिए वहाँ जाने नहीं दिया .
श्षेफाली हँस कर बोली-पापा भूल जाइये अब वह जमानाआज तो रेगिस्तानों में भी हरियाली झूम रही है फिर एकदम बार्डर पर लोग कितना निडर हो कर रह रहे हैं वैसे बाद में भइया अपने हेड क्वार्टर दिल्ली शिफ्ट हो जाते, भइया कितने डिप्रेशन में आ गये थे, किसी तरह उससे उबरे तो आज एक मामूली प्राइवेट फर्म में उन्हें मुश्किल से नौकरी मिलीडाक्टरेट करने के बाद भी किसी तरह नमक रोटी का ठिकानाडाक्टरेट करने में उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ी थी, कितना वक्त जाया किया उन्होंने क्या आप अपनी बेटी के साथ भी यही चाहते हैं शेफाली ने पापा की आँखों में आँखें डाल कर कहा
शेफाली की आँखों की चमक के आगे पापा को झुकना पड़ा दो दिन बाद ही घर में स्कूटी आ गई शुरु के चार-छः दिन पापा अपना स्कूटर उसके साथ ही ले जाते रहे, फिर उसकी ड्राइविंग निपुणता देख उनके तमाम भय और आशंका आप से आप खत्म हो गये, वे निश्चिन्त हो गए, मगर ऑफिस से प्रतिदिन पत्नी को फोन करना न भूलते कि शेफाली आ गई या नहीं, फिर धीरे-धीरे यह भी छूट गया .
ग्रेजुएशन के बाद शेफाली ने आगे की क्लास में एडमिशन ले लियासमय यों ही गुजरता जा रहा था, मगर एक दिन शेफाली ने पापा की जिन्दगी में भूचाल सा ला खड़ा किया, उस दिन ऑफिस से लौटे पापा नाश्ता कर रहे थे कि शेफाली बोली-पापा मैं कुछ कहूँ तो आप नाराज तो नही होंगे ?”
नहीं बेटी, भला तू मुझे नाराज करने वाली कोई बात कहेगी ही क्यों, बोल क्या कहना चाहती है
पापा मेरी दो तीन सहेलियों ने एयरफोर्स में पायलेट की ट्रेनिंग के लिए एप्लाई किया है, क्या मैं भी एप्लीकेशन दे दूँ ?”
पायलेट! पापा के सिर से पैर तक जैसे एक सर्द हवा का झोंका गुजर गयामतलब कि ऊपर जहाज को आसमान में उड़ाने वाले पायलेट की ट्रेनिंग---वह भी एयर फोर्स में---उन्होंने तो उसे डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनाने के सपने पाल रखे थेऔर यह उनकी बेटी हर पल खतरे में जीने वाली नौकरी की बात कर रही है वे गंभीर स्वर में बोले-जिस नौकरी में कब जिन्दगी का आखिरी पल आ जाए, तू वहाँ की बात कर रही है नहीं शेफाली बेटे नहींतुझे तो एक से एक अच्छी नौकरी मिलेगी
शेफाली जानती थी---पापा का यही उत्तर होगालेकिन वह निराश हुए बिना हँस कर बोली--पापा मैं तो एक कोशिश करके देखना चाहती हूँमेरा सेलेक्शन कहाँ हुआ ही जा रहा है हजारों में किसी एक को चांस मिलता हैजिन्दगी और मौत का खेल कहाँ नहीं होताफिर आप यकीन मानिए, मेरे हाथ की लकीरें बता रहीं हैं कि मैं आकाश की ऊँचाइयों को छूने वाली हूँमौत को मैं कभी पास नहीं फटकने दूँगी, और हाँ याद कीजिएये आप ही के शब्द हैं न - दोस्तों, हर पल को जियो अन्तिम पल ही जान, अन्तिम पल है कौन सा, ये कौन सका है जान!
इस क्षण भी शेफाली की आँखों में वही आत्मविश्वास की भरपूर चमक थीएक जादू भरी चमकपापा उसके सम्मोहन से अपने को नहीं बचा पाए,उन्होंने नाश्ता खत्म कर चाय की आखिरी चुस्की के साथ उसकी ओर मुस्करा कर देखाशेफाली उनके गले से लिपटती हुई बोली-- पापा आप सचमुच कितने ग्रेट हैं
काश--गौरव के केस में उन्होंने यह ग्रेटनेस दिखाई होती तब गौरव का चेहरा कैसा मुर्झाए फूल सा हो उठा था फिर उसके चेहरे पर कभी रौनक नहीं दिखाई दीआज भी वह अपने ऑफिस से थका माँदा लौटता है तो वैसा ही मुर्झाया चेहरा लिए हुएमगर आज शाम उस चेहरे को देख वे पहली बार मन ही मन रो पड़ेआज तक उन्होंने कभी इसे इस शिद्दत से नहीं अनुभव किया थाशायद शेफाली ने ही उन्हें यह अनुभव करने की चेतना दीलेकिन अब क्या हो सकता था ? कुछ नहीं
एक दिन शेफाली ने सचमुच छलांग लगा दीपायलट के प्रशिक्षण के लिए वह चुन ली गईजिसने सबसे पहले उसे बधाई दी वह था गौरववह अपने सारे दर्द भुला कर बस मुस्करा रहा थायह बात नहीं कि शेफाली उसकी मुस्कराहट के पीछे छिपे दर्द को नहीं पहचान रही थीपर इसके साथ वह कुछ और भी सोच रही थी अपने बड़े भाई के लिए
पायलेट का प्रशिक्षण कोर्स पूरा कर एक दिन शेफाली अपने यूनिफार्म में सबके सामने आ खड़ी हुईपापा, मम्मी, गौरव, सब चकित से उसे देखे जा रहे थेवह इस समय शेफाली मात्र नहीं बल्कि एक शक्तिपुंज सी दिखाई दे रही थी
अचानक वह बोली -पापा मेरा प्लेन कौन सा होगा, पोस्टिंग कहाँ होगी, बताना संभव नहीं हैलेकिन आप लोग यहाँ ऊपर आसमान से गुजरते किसी भी प्लेन को देखेंगे तो आप सब को इस बेटी की याद जरुर आयेगीमुझे अपनी इस सफलता से ज्यादा खुशी आपकी सोच में परिवर्तन आने से हैगौरव भैया को लेकर आप बिल्कुल उदास न होंउन्होंने अभी भी कुछ खोया नहीं हैउन्हें जो हासिल होना चाहिए था वह होकर रहेगायह मैं करुँगींउन्हें अपने से भी बड़ी कामयाबी दिला कर दिखाऊँगी
शेफाली की आँखों में एक बेटे, एक बेटी दोनों की चमक थीएक संकल्प, एक विश्वास से भरपूर नजर आ रही थी वहगौरव ने प्रसन्नता से अपनी छोटी बहन को गले लगा लिया
                               ००००००

लेखक-प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11 मार्च, 1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।31 जुलाई 2016  को लखनऊ में आकस्मि निधन।शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम00।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र पत्रिकाओं सरस्वती,कल्पना, प्रसाद,ज्ञानोदय, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,कहानी, नई कहानी, विशाल भारत,आदि में कहानियों,नाटकों,लेखों,तथा रेडियो नाटकों, रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।
     आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों, नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र मृत्यु पर्यंत जारी रहा। 2012में नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया से बाल उपन्यासमौत के चंगुल में तथा 2018 में बाल नाटकों का संग्रह एक तमाशा ऐसा भी” प्रकाशित।