रविवार, 15 सितंबर 2019

यात्राएं

फोटो क्रेडिट:हेमंत कुमार 

यात्राएं
ये यात्राएं भी
कितनी अजीब होती हैं।

जैसे हम गुजरते हुए
टेढ़े मेढे रास्तों से
नदी नालों पहाड़ों के
सौन्दर्य को देखते
सराहते,आश्चर्यचकित होते
अपने पीछे छोड़ते हुए
आगे बढ़ते जाते हैं
अपनी अपनी मंजिल की ओर।

ठीक वैसे ही
हमारी जिन्दगी का सफ़र भी
कभी आसान तो कभी कठिन
और दुरूह होता जाता है।

पर ये यात्राएं हमारी
बहुत मददगार होती हैं
जहाँ सफ़र में
हम एक दूसरे को
धकियाते ठेलते झगड़ते
अपनी अपनी जगह पर
कब्ज़ा करने में
जूझते रहते हैं
पर अपने स्वार्थवश
ये नहीं सोचते कि
हमारी इन हरकतों की वजह से
दूसरों को तकलीफ हो सकती है।
तो क्यों न हम सब
इन्हीं टेढ़े मेढे
रास्तों की तरह
जाने अनजानों को अपनाते
गले लगाते
एक दूसरे की मदद करते
अपने सुख दुःख को
एक दूसरे से बाटते
अपनी अपनी समस्याओं
को भी झेलते
हंसते हंसाते इसी तरह
अपनी जिंदगी का
सफ़र पूरा करें।
०००
पूनम श्रीवास्तव


मंगलवार, 30 जुलाई 2019

कहानी--बेटी


(कल 31जुलाई को मेरे स्व०पिताजी(श्वसुर जी)आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की तीसरी पुण्य तिथि है।इस अवसर पर पाठकों के लिए प्रस्तुत है उनकी एक कहानी “बेटी”। यह कहानी पिता जी ने सन 2010 में लिखी थीबेटियों को समाज में उचित स्थान दिलाने के एक प्रयास वाली यह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 2010में थी।–-पूनम श्रीवास्तव)

                          बेटी


प्रेमस्वरुप श्रीवास्तव
          शेफाली आज बेहद खुश थीइसलिए नहीं कि शहर के एक प्रतिष्ठित कालेज में उसे एडमिशन मिल गया थावह इतनी टैलेन्टड थी कि उसे एडमिशन पाने की कोई चिन्ता नही थीउसकी खुशी की वजह यह थी कि जब से पापा यहां ट्रांसफर होकर आये वे इसी बात को लेकर रात दिन परेशान रहते थेउनकी वह परेशानी आज दूर हो चुकी थी
                लेकिन पापा के पास तो परेशानियों का भण्ड़ार थाएक जाती तो दूसरी निकल आती  शेफाली का कालेज घर से काफी दूर थावे नजदीक के किसी कालेज में एड़मिशन चाहते थेपर कालेज स्टैडर्ड हो और करीब भी, ये दोनो बातें एक साथ संभव नही थींअब शेफाली अकेली इतनी दूर कैसे जायेगीउस रूट पर हर दस मिनट पर आटो आते आते जाते थेपर इससे क्या हुआजमाना खराब हैशेफाली का आना जाना कैसे सुरक्षित होगावैसे उनका आफिस उधर ही थापर शेफाली उनके साथ नही जा सकती थी पीरियड के हिसाब से उसे कभी देर तो कभी सबेरे जाना होगा
                शेफाली ने पापा को समझाया -पापा, आप क्यों इतनी चिन्ता करते हैं मैं अब छोटी सी बच्ची तो रही नहीं मै किसी भी परेशानी से निपटने में सक्षम हूँ हाँ, आप से आने जाने में काफी पैसे लगेंगेंइसलिए आप मुझे एक स्कूटी खरीद दीजिए तो पैसे और समय, दोनो की काफी बचत हो सकती है
                पापा चौंक पड़े, शेफाली महानगर की इतनी भीड़ भाड़ वाली सड़क पर स्कूटी चलायेगी, तरह तरह के एक्सीडेन्ट की काल्पनिक तस्वीरें उनके जेहन में नाचनें लगीं, अखबार इन्ही खबरों से पटे रहते है
                पापा के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें देखते ही शेफाली हँस कर बोली-पापा, मै जानती हूँ, मेरी इस बात से आप क्यों चिन्ता में पड़ गये, मै लड़की हूँ न, डरिये मत पापा, आपकी यह बेटी तो एक दिन आकाश की ऊँचाइयों में छलांग लगाकर दिखयेगी।”
                “नही बेटी मै यह नही करूँगा, आटो मे जो भी पैसे लगते है लगने दे, वह तेरी स्कूटी से ज्यादा सुरक्षित साधन है।” पापा बोले
                “लेकिन पापा, यहाँ तो भीड़ इतनी है कि आटो में जगह पाने के लिए मेरा बड़ा वक्त लगेगा, छोटे बड़े सभी तो अपने अपने साधन से आ जा रहे हैं, अब एक्सीडेंट के डर से कोई अपने घर तो नहीं बैठा रहता
लेकिन शेफाली......पापा और कुछ बोलते कि शेफाली ने बात बीच में ही काट दी........ पापा आपके इसी भय ने क्या गौरव भैया के पूरे कैरियर को नहीं प्रभावित कर दिया उन्होंने किस हौसले से डाक्टरेट की डिग्री हासिल की थी़ किन्तु जब पोर्ट ब्लेयर के गर्वनमेंट कॉलेज में उनका एप्वाइंटमेंट हुआ तो आपने उन्हें नहीं जाने दिया
                “पोर्ट ब्लेयर का मतलब जानती है तू ? अंग्रेजों के जमाने का काला पानी, अंडमान निकोबार, भला इतनी दूर जाने की इजाजत मैं कैसे देता, जिधर भी नजर डालो बस समन्दर ही समन्दर
अब वह जमाना नहीं रहा पापा, आज दूरियों का कोई मतलब नहीं होता, फिर बाद में उनका तबादला दिल्ली भी हो सकता था, या किसी भी सेन्ट्रल कॉलेज मेंसमाज कल्याण विभाग में सहायक निदेशक के पद पर उनकी नियुक्ति बाड़मेर जैसलमेर जोन में हो रही थी
हाँ हाँ, मगर बेटी वह रेगिस्तानी इलाका है, एक एक बूँद पानी के लिए तरस जाते हैं लोग, फिर पाकिस्तान का बार्डर भी करीब, हमेषा जान का खतरा, मैंने उसे इसीलिए वहाँ जाने नहीं दिया .
श्षेफाली हँस कर बोली-पापा भूल जाइये अब वह जमानाआज तो रेगिस्तानों में भी हरियाली झूम रही है फिर एकदम बार्डर पर लोग कितना निडर हो कर रह रहे हैं वैसे बाद में भइया अपने हेड क्वार्टर दिल्ली शिफ्ट हो जाते, भइया कितने डिप्रेशन में आ गये थे, किसी तरह उससे उबरे तो आज एक मामूली प्राइवेट फर्म में उन्हें मुश्किल से नौकरी मिलीडाक्टरेट करने के बाद भी किसी तरह नमक रोटी का ठिकानाडाक्टरेट करने में उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ी थी, कितना वक्त जाया किया उन्होंने क्या आप अपनी बेटी के साथ भी यही चाहते हैं शेफाली ने पापा की आँखों में आँखें डाल कर कहा
शेफाली की आँखों की चमक के आगे पापा को झुकना पड़ा दो दिन बाद ही घर में स्कूटी आ गई शुरु के चार-छः दिन पापा अपना स्कूटर उसके साथ ही ले जाते रहे, फिर उसकी ड्राइविंग निपुणता देख उनके तमाम भय और आशंका आप से आप खत्म हो गये, वे निश्चिन्त हो गए, मगर ऑफिस से प्रतिदिन पत्नी को फोन करना न भूलते कि शेफाली आ गई या नहीं, फिर धीरे-धीरे यह भी छूट गया .
ग्रेजुएशन के बाद शेफाली ने आगे की क्लास में एडमिशन ले लियासमय यों ही गुजरता जा रहा था, मगर एक दिन शेफाली ने पापा की जिन्दगी में भूचाल सा ला खड़ा किया, उस दिन ऑफिस से लौटे पापा नाश्ता कर रहे थे कि शेफाली बोली-पापा मैं कुछ कहूँ तो आप नाराज तो नही होंगे ?”
नहीं बेटी, भला तू मुझे नाराज करने वाली कोई बात कहेगी ही क्यों, बोल क्या कहना चाहती है
पापा मेरी दो तीन सहेलियों ने एयरफोर्स में पायलेट की ट्रेनिंग के लिए एप्लाई किया है, क्या मैं भी एप्लीकेशन दे दूँ ?”
पायलेट! पापा के सिर से पैर तक जैसे एक सर्द हवा का झोंका गुजर गयामतलब कि ऊपर जहाज को आसमान में उड़ाने वाले पायलेट की ट्रेनिंग---वह भी एयर फोर्स में---उन्होंने तो उसे डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनाने के सपने पाल रखे थेऔर यह उनकी बेटी हर पल खतरे में जीने वाली नौकरी की बात कर रही है वे गंभीर स्वर में बोले-जिस नौकरी में कब जिन्दगी का आखिरी पल आ जाए, तू वहाँ की बात कर रही है नहीं शेफाली बेटे नहींतुझे तो एक से एक अच्छी नौकरी मिलेगी
शेफाली जानती थी---पापा का यही उत्तर होगालेकिन वह निराश हुए बिना हँस कर बोली--पापा मैं तो एक कोशिश करके देखना चाहती हूँमेरा सेलेक्शन कहाँ हुआ ही जा रहा है हजारों में किसी एक को चांस मिलता हैजिन्दगी और मौत का खेल कहाँ नहीं होताफिर आप यकीन मानिए, मेरे हाथ की लकीरें बता रहीं हैं कि मैं आकाश की ऊँचाइयों को छूने वाली हूँमौत को मैं कभी पास नहीं फटकने दूँगी, और हाँ याद कीजिएये आप ही के शब्द हैं न - दोस्तों, हर पल को जियो अन्तिम पल ही जान, अन्तिम पल है कौन सा, ये कौन सका है जान!
इस क्षण भी शेफाली की आँखों में वही आत्मविश्वास की भरपूर चमक थीएक जादू भरी चमकपापा उसके सम्मोहन से अपने को नहीं बचा पाए,उन्होंने नाश्ता खत्म कर चाय की आखिरी चुस्की के साथ उसकी ओर मुस्करा कर देखाशेफाली उनके गले से लिपटती हुई बोली-- पापा आप सचमुच कितने ग्रेट हैं
काश--गौरव के केस में उन्होंने यह ग्रेटनेस दिखाई होती तब गौरव का चेहरा कैसा मुर्झाए फूल सा हो उठा था फिर उसके चेहरे पर कभी रौनक नहीं दिखाई दीआज भी वह अपने ऑफिस से थका माँदा लौटता है तो वैसा ही मुर्झाया चेहरा लिए हुएमगर आज शाम उस चेहरे को देख वे पहली बार मन ही मन रो पड़ेआज तक उन्होंने कभी इसे इस शिद्दत से नहीं अनुभव किया थाशायद शेफाली ने ही उन्हें यह अनुभव करने की चेतना दीलेकिन अब क्या हो सकता था ? कुछ नहीं
एक दिन शेफाली ने सचमुच छलांग लगा दीपायलट के प्रशिक्षण के लिए वह चुन ली गईजिसने सबसे पहले उसे बधाई दी वह था गौरववह अपने सारे दर्द भुला कर बस मुस्करा रहा थायह बात नहीं कि शेफाली उसकी मुस्कराहट के पीछे छिपे दर्द को नहीं पहचान रही थीपर इसके साथ वह कुछ और भी सोच रही थी अपने बड़े भाई के लिए
पायलेट का प्रशिक्षण कोर्स पूरा कर एक दिन शेफाली अपने यूनिफार्म में सबके सामने आ खड़ी हुईपापा, मम्मी, गौरव, सब चकित से उसे देखे जा रहे थेवह इस समय शेफाली मात्र नहीं बल्कि एक शक्तिपुंज सी दिखाई दे रही थी
अचानक वह बोली -पापा मेरा प्लेन कौन सा होगा, पोस्टिंग कहाँ होगी, बताना संभव नहीं हैलेकिन आप लोग यहाँ ऊपर आसमान से गुजरते किसी भी प्लेन को देखेंगे तो आप सब को इस बेटी की याद जरुर आयेगीमुझे अपनी इस सफलता से ज्यादा खुशी आपकी सोच में परिवर्तन आने से हैगौरव भैया को लेकर आप बिल्कुल उदास न होंउन्होंने अभी भी कुछ खोया नहीं हैउन्हें जो हासिल होना चाहिए था वह होकर रहेगायह मैं करुँगींउन्हें अपने से भी बड़ी कामयाबी दिला कर दिखाऊँगी
शेफाली की आँखों में एक बेटे, एक बेटी दोनों की चमक थीएक संकल्प, एक विश्वास से भरपूर नजर आ रही थी वहगौरव ने प्रसन्नता से अपनी छोटी बहन को गले लगा लिया
                               ००००००

लेखक-प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11 मार्च, 1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।31 जुलाई 2016  को लखनऊ में आकस्मि निधन।शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम00।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र पत्रिकाओं सरस्वती,कल्पना, प्रसाद,ज्ञानोदय, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,कहानी, नई कहानी, विशाल भारत,आदि में कहानियों,नाटकों,लेखों,तथा रेडियो नाटकों, रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।
     आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों, नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र मृत्यु पर्यंत जारी रहा। 2012में नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया से बाल उपन्यासमौत के चंगुल में तथा 2018 में बाल नाटकों का संग्रह एक तमाशा ऐसा भी” प्रकाशित।

मंगलवार, 31 जुलाई 2018

पुस्तक समीक्षा---“मौत के चंगुल में”


(हिन्दी के प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार हमारे पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की आज पुण्य तिथि है।आज 31 जुलाई 2016 को वो हम सभी को छोड़ कर परमपिता के चरणों में समाहित हो गए थे आज वो भौतिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी रचनात्मकता तो हर समय हमारा मार्ग दर्शन करेगीमैं आज उनके चर्चित बाल उपन्यास मौत के चंगुल मेंकी बाल साहित्य के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर श्री कौशल पाण्डेय जी द्वारा लिखित समीक्षा यहाँ प्रकाशित कर रही हूँसाथ ही बाल साहित्य के सशक्त समीक्षक,आलोचक और कवि डा०सुरेन्द्र विक्रम जी द्वारा लिखित और जनसन्देश टाइम्स में प्रकाशित समीक्षा भी पुनः प्रकाशित कर रहीयही पिता जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी )
                                                                     

पुस्तक समीक्षा

लेखक-- कौशल पाण्डेय


मौत के चंगुल में
(बाल उपन्यास)
  लेखक:प्रेम स्वरूप श्रीवास्त
प्रकाशक:
नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया,नई दिल्ली
                                 बचकर निकलना-मौत के चंगुल से   

     हिन्दी उपन्यासों की तरह हिन्दी बाल उपन्यास भी एक अत्यंत आधुनिक विधा है, हिन्दी बाल उपन्यासों की एक छोटी,पर समृद्धिशील परम्परा होते हुए भी अभी तक बाल उपन्यास न तो लोकप्रिय हो पाए हैं और न ही इनकी कोई विशेष पहचान बन पाई है। इसके पीछे जो कारण नज़र आता है, वह है अर्थशास्त्र की मांग और पूर्ति का सिद्धांत। बाल उपन्यासों की मांग का पक्ष कभी भी अनुकूल नहीं रहा है। बड़ों की तरह बच्चों को हमारे यहां यह अधिकार नहीं रहा कि वे पाठ्यक्रमों से हटकर पढ़ी जाने वाली सामग्री की खरीद स्वयं करें। लेकिन अब स्थितियाँ बदल रही हैं। महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों में लगने वाले पुस्तक मेलों में बच्चों की सहभागिता बढ़ी है। उनके लिये अलग से स्टाल होते हैं, जहां वे अपनी रुचि की पुस्तकें क्रय करते हैं। इस बदलाव में नेशनल बुक ट्रस्ट की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।

          साहस और रोमांचपूर्ण कथायें बच्चों को सदैव आकर्षित करती रही हैं।ये कथायें बच्चों में एक जिज्ञासा पैदा कर, उनकी रुचि को लगातार बनाए रखकर, उन्हें पढ़ने को तो प्रेरित करती ही हैं, साथ ही उनमें साहस और वीरता का एक ऐसा भाव भी पैदा करती हैं, जिसकी आज इस कठिन समय में उन्हें बेहद ज़रूरत है। हाल ही में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित वरिष्ठ बाल साहित्यकार प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव का बाल उपन्यास मौत के चंगुल में एक ऐसी ही कृति है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक बच्चों को विश्व की एक ऐसी रोमांचकारी यात्रा पर ले जाता है, जहां कदम कदम पर उनका सामना बड़े-बड़े खतरों से होता है और उन खतरों से बच निकलना भी कम रहस्यमय नहीं है।अध्यापक वाटसन एक असामान्य एवं ज़िद्दी व्यक्ति है तो भी परिस्थितियों से हार नहीं मानता है। यही कारण है कि वह बच्चों का एक ऐसा स्कूल चलाता है,जहां लंगड़े,दृष्टिहीन एवं अपंग बच्चों के साथ पशु-पक्षी भी पारिवारिक सदस्यों की तरह रहते हैं।
         अचानक एक दिन उसने एक ऐसा निर्णय लिया, जो सबको आश्चर्य में डाल देता है।लोगों को लगा कि उसकी सनक कहीं बच्चों को मौत के मुंह तक ना पहुंचा दे, पर वह अपने फ़ैसले पर अडिग रहा।लोग उसकी मदद को आगे आये।वह एटलस नाम के एक समुद्री जहाज से करीब सात सौ बच्चों के साथ एक खतरनाक विश्व यात्रा पर निकल पड़ा।
                                       

         अपनी इस यात्रा में उसे किन-किन संकटों से गुज़रना पड़ा,इसे पढ़ना अपने आप में एक रोमांचकारी अनुभव से गुजरना है।खराब मौसम, अपाहिज बच्चे और उनके जीवन की पल-पल चिंता में लगे वाटसन ने बड़ी से बड़ी प्रतिकूल स्थितियों में भी हार नहीं मानी।न्यूयार्क बंदरगाह से सैनफ़्रांसिस्को तक ही यह यात्रा भारत होकर भी गुज़री।मुंबई आने के बाद यह यात्रा भारत दर्शन पर भी निकली।भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं का भी इस यात्रा में संक्षिप्त पर प्रभावी वर्णन मिलता है।बंगाल के जंगल में सांप से जुड़ी घटना रोंगटे खड़ी कर देती है।अंत में जहाज का समुद्र में डूबना और इस संकट से उबरना इस उपन्यास का सबसे खतरनाक और रोमांचकारी पक्ष है।सांसें ठहर सी जाती हैं कि अब आगे क्या होगा।

        सत्रह उपशीर्षकों में विभाजित यह रोचक कथा बच्चों को रोज़मर्रा के जीवन से अलग हटकर एक नई दुनिया से परिचय कराती है,जिसकी उन्हें पहले से कल्पना तक नहीं होती है।बच्चों ही नहीं बड़ों को भी इस उपन्यास का पढ़ना एक ज़िदभरी रोमांचक यात्रा के दुर्लभ अनुभव से होकर गुज़रना है।इस अनुभव का आनंद केवल इसे पढ़कर ही उठाया जा सकता है।पुस्तक के साथ दिये गये चित्रकार पार्थसेन गुप्ता के चित्र भी आलेख से कम जीवंत नहीं हैं।
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लेखक-- कौशल पाण्डेय
1310ए,वसंत विहार,
कानपुर 208021
मोबाइल:09389462070