रविवार, 10 अक्तूबर 2010

सीख


जला जला कर खुद को,खाक करते हैं क्यों

ज़िन्दगी अनमोल खज़ाना,जीना तो सीख लें।

देख कर औरों की खुशियाँ,कुढ़ते हैं क्यों

गैरों की खुशी में भी, हँसना तो सीख ले॥

रास्ते मंज़िलों के आसान ढ़ूँढ़ते हैं क्यों

मुश्किलों का सामना करना तो सीख लें।

छूने को ऊँचाई आकाश की कोशिश तो करें ज़रूर

पर पहले पाँव को ज़मीं पे जमाना तो सीख लें।

अपने को गैरों से ऊँचा समझते हैं क्यों

एक बार खुद को भी आँकना तो सीख लें।

तकदीर को ही हर कदम पर कोसते हैं क्यों

रह गई कमी कहाँ जानना तो सीख लें।

करके भरोसा दूसरों पर पछताते हैं क्यों

बस हौसला बुलंद करना खुद का तो सीख लें।

ज़िन्दगी का नाम सिर्फ़ पाना ही क्यों

खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लें।

000

पूनम

37 टिप्‍पणियां:

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

छूने को ऊँचाई आकाश की कोशिश तो करें ज़रूर
पर पहले पाँव को ज़मीं पे जमाना तो सीख लें।
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बहुत शिक्षाप्रद पंक्तियाँ लिखी आपने.....
अच्छी लगी आपकी प्रेरणादायी रचना

'उदय' ने कहा…

... bahut sundar ... shaandaar !

दीर्घतमा ने कहा…

आपकी कबिता तो बहुत भाव पूर्ण तथा शिक्षा प्रद होने क़े साथ-साथ अपने ब्लॉग की संरचना भी बहुत सुन्दर की है इतनी अच्छी कबिता लिखने क़े लिए भगवान आपको मेधावी बनाये रखे जिससे इस प्रकार की कबिता हमलोगों को पढने को मिलती रहे ,सुन्दर रचना क़े लिए बहुत- बहुत धन्यवाद.

अरुणेश मिश्र ने कहा…

अत्यंत प्रेरक रचना पूनम जी ।

Shekhar Suman ने कहा…

वाह ! बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति.. अगर हम इतना कुछ सीख लें तो धरती तो स्वर्ग बन जाएगी...
सुनहरी यादें ....

Apanatva ने कहा…

poonam.......sunder sandesh detee rachana...bahut pasand aaee.........
tumhe to malum hee hai ki mai sadaiv hee sarthak aur sakaratmak lekhan me hee vishvas rakhtee hoo...........
bahut hee sunder rachana ke liye badhaee..........

शरद कोकास ने कहा…

पूरी रचना में बेहतरीन सन्देश है ।

Udan Tashtari ने कहा…

देख कर औरों की खुशियाँ,कुढ़ते हैं क्यों
गैरों की खुशी में भी, हँसना तो सीख ले॥



-संदेशात्मक गीत...बहुत उम्दा सीख. आभार.

संजय भास्कर ने कहा…

आपने बहुत ही उम्दा रचना लिखी है!

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर रचना, आप सब को नवरात्रो की शुभकामनायें,

nai post Apna Ghar par swagat hai..

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर शिक्षाप्रद पंक्तियाँ है ...

हरीश प्रकाश गुप्त ने कहा…

प्रेरक और सन्देशप्रद गजल के लिए आभार।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जिन्दगी पाने के लिये कितना कुछ खोना पड़ता है।

hempandey ने कहा…

इस नसीहत भरी रचना की सभी नसीहतें अनुकरणीय हैं |

वन्दना ने कहा…

सुन्दर संदेश देती प्रेरणास्पद कविता।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ज़िन्दगी का नाम सिर्फ़ पाना ही क्यों

खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लें।
waah bahut sahi

मनोज कुमार ने कहा…

प्रेरक और बहुत संदेशप्रद रचना!बहुत अच्छी प्रस्तुति।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

दुर्नामी लहरें, को याद करते हैं वर्ल्ड डिजास्टर रिडक्शन डे पर , मनोज कुमार, “मनोज” पर!

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर संदेश देती आप की यह कविता, धन्यवाद

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

करके भरोसा दूसरों पर पछताते हैं क्यों

बस हौसला बुलंद करना खुद का तो सीख लें

बहुत सुन्दर सन्देश देती अच्छी रचना ....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अपने को गैरों से ऊँचा समझते हैं क्यों
एक बार खुद को भी आँकना तो सीख लें ...

बहुत ज़रूरी है अपनी क्षमताओं को पहचानना ....
अच्छी रचना है ...

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बड़ी अच्छी सीख दी है आपने।

Shaivalika Joshi ने कहा…

Bahut Khoob Kahaa

ZEAL ने कहा…

करके भरोसा दूसरों पर पछताते हैं क्यों

बस हौसला बुलंद करना खुद का तो सीख लें।

ज़िन्दगी का नाम सिर्फ़ पाना ही क्यों

खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लें।

....

बेहतरीन अभिव्यक्ति ।

.

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

Umra Quaidi ने कहा…

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

Priyanka Soni ने कहा…

सुन्दर कविता ! सुन्दर अभिव्यक्ति !

Parul ने कहा…

har pankti zazbe se bhari hai aur aakhiri had tak junu si hai..beautiful

उपेन्द्र " the invincible warrior " ने कहा…

ज़िन्दगी का नाम सिर्फ़ पाना ही क्यों
खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लें।

बहुत ही प्रेरणादायी प्रस्तुति.

Poorviya ने कहा…

बस हौसला बुलंद करना खुद का तो सीख लें।


ज़िन्दगी का नाम सिर्फ़ पाना ही क्यों

खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लें।
bahut sunder .

Babli ने कहा…

मोर की तरह ख़ूबसूरत और सन्देश देती हुई शानदार रचना लिखा है आपने! आपकी लेखनी को सलाम!

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

अच्छा लिखा है जी.

Vijai Mathur ने कहा…

Kavita ki pratyek pankti haqiqat bayan kar rahi hai. jaisi aapne kamna ki hai sabhi manney lagen to swarg ka aabhas yahin ho jayega ,isliye log nahi mantey. Logon ka swarg to kahi aur hai .

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

छूने को ऊँचाई आकाश की कोशिश तो करें ज़रूर

पर पहले पाँव को ज़मीं पे जमाना तो सीख लें।
वाह वाह पूनम जी बहुत सुंदर जीवन दर्शन । अानंदित कर गई आपकी ये कविता ।

BrijmohanShrivastava ने कहा…

हंसना तो सीख लें ,जीना तो सीख लें ,जमीन पर पांव जम जाने के बाद ही आसमान को छूने की कोशिश की जानी चाहिये ।गैरों से अपने को उंचा समझने की ही तो बीमारी है जो बढती चली जारही है। हौसला बुलंद करना और सब्र करना आगया उसे जीना आगया । बहुत सुन्दर रचना

sandhyagupta ने कहा…

दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

Kunwar Kusumesh ने कहा…

ज़िन्दगी का नाम सिर्फ़ पाना ही क्यों
खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लें
बहुत अच्छी रचना है. दशहरा की हार्दिक बधाई .

कुँवर कुसुमेश
समय हो तो कृपया ब्लॉग:kunwarkusumesh.blogspot.com पर मेरी नई पोस्ट देखें.

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति बेहतरीन सन्देश