मंगलवार, 15 मार्च 2011

मन की व्यथा


इधर चार पांच दिनों से कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा था।जापान में हुयी तबाही प्रकृति की विनाशकारी लीला,उस पर उसका भयानक ताण्डव शायद जेहन से उतर ही नहीं रहा है। ऐसा लगता है जैसे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है। समाचार पत्रों और टी वी पर दिखाये जाने वाले महाविनाश का दृश्य आंखों से हट ही नहीं रहा है। मन बहुत बेबस बेचैन और अपने आप को बहुत लाचार समझ रहा है।

क्या अपने हाथ में कुछ भी नहीं है? हम क्या केवल देखने और सुनने के लिये ही रह गये हैं। जो लाखों लोग सुनामी की लहरों में खो गये,शहर के शहर को प्रकृति ने अपने कोप का भाजन बना लिया जो बचे वो भी अपने अपने प्रिय जनों से बिछड़ बिखर गये। किसी को किसी के बारे में कुछ नहीं पता।

हालां कि प्रकृति के प्रलयंकारी रूप से हम आप भी सुरक्षित नहीं हैं। ये जिन्दगी किसी की अपनी नहीं है। कभी भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है पर जब तक सांस है तब तक आस है। इसी उम्मीद पर लोग जीते भी हैं। आज हम अपने अपने घरों में बैठ कर आराम से खाना खा रहे हैं,टी वी पर न्यूज व सीरियल देखने में लगे हैं।

पर हर कौर गले में अटकता हुआ सा महसूस होता है। सच मानिये जब भी खाना सामने आता है वो तबाही का मंजर किसी शूल की भांति दिल में चुभ सा जाता है।और यह तबाही बर्बादी अभी भी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। मन इतना अशान्त हो गया है कि कुछ भी अच्छा नहीं लगता । पर मन को कैसे समझाये कि जो हर वक्त वहीं का चक्कर लगाता रहता है। बस आज आपसे मन की व्यथा बांटने का मन हुआ और लिखने बैठ गयी।

सांई नाथ के आगे जब भी हाथ जोड़ती हूं दिल से यही प्रार्थना करती हूं कि हे सांई बाबा जो भूकंप और सुनामी की लहरों में समा गये उनकी अत्मा को शान्ति देना।जो अनाथ बेघर और अपना सब कुछ गंवा कर बच गये हैं उनको भी शान्ति दो। धैर्य के साथ इन विकट परिस्थितियों का सामना करने का संबल दो । हे प्रभु इन सबके साथ हमेशा अपने आशीष के हाथ रखना। इस वक्त तुम्हारे सहारे से बढ़ कर कोई दूसरा नहीं दिखता। हम सबको तुम्हारे सहारे की जरूरत है।

कुछ पंक्तियाँ…

प्रकृति अपना विनाशकारी रूप है दिखला रही

कभी भूकंप,कभी सुनामी बन सब कुछ है निगल रही

कितने शहर,गाँव इसके आगोश में समा गये

अपने दूजे सब बिखर गये कितने…

गिनती कोई रही नहीं।

जुदा हुई आँखें

खोई खोई सी दिख रही…

जीने को अब बचा क्या

शायद साँसें यही हैं कह रहीं।

लेकिन प्रकृति का तो तांडव

अभी भी बरकरार है

कितने कहर और ढायेगी

किसी को कुछ पता नहीं।

फ़िर भी आलम समाज का देखिये

उसपर जैसे असर नहीं

कुछ चेते, फ़िर भी अभी

कुछ की आँखें बन्द पड़ीं।

किसी की सत्ता में जाँ है

तो कोई कुर्सी के है पीछे पड़ा

दुराचार और भ्रष्टाचार में

अब भी कोई कमी नहीं।

हैवानों की हैवानियत में

कोई फ़र्क पड़ा नहीं

एक तरफ़ प्रकृति का प्रकोप

तो,इनका कहर भी कम नहीं।

आँखें नम हैं,दिल है रोता

क्यों नहीं समझता अब भी कोई

आओ सबके लिये दुआ करें

जो गये,जिनकी साँसें बची हुईं।

जीवन का भरोसा नहीं

हँस लो,मुस्कुरा लो

अब भी वक़्त है,बंद करो सब

प्रकृति सबक सिखा रही।

000 पूनम

36 टिप्‍पणियां:

: केवल राम : ने कहा…

आदरणीया पूनम जी
आपने मन की संवेदना को पूरी तरह से अभिव्यक्त किया है ..जीवन और मृत्यु तो किसी के हाथ में नहीं हैं ....हम बस जीवन में रहते हुए इस जीवन के बारे में सोच सकते हैं ...इसे सांसों के रहते हुए सुंदर बनाने का प्रयास कर सकते हैं ..लेकिन जब कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो उस पर इंसान का कोई वश नहीं चलता ..यह इंसान की एक भूल है कि उसने प्रकृति पर विजय पा ली है ...लेकिन ऐसा नहीं है ...हम खुद को प्रकृति के अनुकूल रख पायेंगे तो यह भी हमें अपने पास रहने देगी ...आपने जो प्रार्थना की है ..ईश्वर उसे पूरा करे ..यही कामना है ..आपका आभार

Kailash C Sharma ने कहा…

यद्यपि प्रकृति और दुर्घटनाओं पर किसी का वश नहीं, लेकिन कुछ हद तक हम भी इसके लिये ज़िम्मेदार हैं. जब हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं तो इस तरह की दुखद घटनाएँ हम कब तक टाल सकेंगे. हमें भी प्रकृति का सम्मान करना सीखना चाहिए..बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना..आभार

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

प्रकृति सबक सिखा रही।
--------
सच में पूनम जी प्रकृति का इशारा ही है ऐसी घटनाएँ...... काश हम समझ सकें.... सार्थक रचना

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आपकी संवेदनायें सामयिक हैं, प्रकृति के संकेत फिर भी समझने होंगे।

राकेश कौशिक ने कहा…

अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदाओं से हमें सबक लेना चाहिय - सार्थक तथा समसायिक पोस्ट

सहज साहित्य ने कहा…

पूनम जी प्रकृति की उपेक्षा का ख़मियाज़ा देर सवेर सभी को भुगतना पड़ेगा । जहाँ की व्यवस्था पूरी चाक चौबन्द थी , उन्हें भी हार माननी पड़ी । हमारे यहाँ तो लापरवाही चरम सीमा पर है, अत: सचेत होना ज़रूरी है ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सच है ...सबके मन में यह व्यथा है ..जानते हैं की प्रकृति से खिलवाड़ उचित नहीं ..फिर भी स्वार्थी बने सब कर रहे हैं ...खामियाज़ा तो उठाना ही पड़ेगा ...काश अब भी सबक ले सकें ..

अच्छी प्रस्तुति

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bheetar ke dard ko bas ji rahe sab ... kahin sunami, kahin aruna shaanbag, kahin jod ghataaw , ... bas yahi hai aur hai khamoshi

राज भाटिय़ा ने कहा…

यह तो सब का हाल हे, सभी इस व्यथा से बहुत व्याथित हे...
अच्छी प्रस्तुति !! धन्यवाद

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

प्रकृति के आगे किसी का कोई बस नहीं चलता!
सच पूछा जाए तो इस प्रकार की प्रलय करके कुदरत अपना संतुलन बनाती है!

सदा ने कहा…

जीवन का भरोसा नहीं

हँस लो,मुस्कुरा लो

अब भी वक़्त है,बंद करो सब

प्रकृति सबक सिखा रही।

एक सच बयां करती पंक्तियां ....अनुपम प्रस्‍तुति ।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

हैवानों की हैवानियत में

कोई फ़र्क पड़ा नहीं

एक तरफ़ प्रकृति का प्रकोप

तो,इनका कहर भी कम नहीं

सारी दैविक आपदा प्रकृति प्रदूषण के कारण आ रही है मगर अब भी इन्सान चेत नहीं रहा है.
ओम साईं नाथाय नमः.

ashish ने कहा…

प्रकृति से हम खेल रहे है तो वो हमारे साथ क्यू ना खेले ? अभी भी हम नहीं चेते तो महाप्रलय बहुत दूर नहीं दिखती .

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

साँस 'कल' हो गयी एक पल में,
उम्र 'पल' हो गई एक पल में,
देख कर खूं का प्यासा समंदर,
प्यास 'जल' हो गयी एक पल में !

काश! हमारी नींद अब भी खुल जाय तो कम से कम बचा खुचा सहेज सकें !

दीर्घतमा ने कहा…

पूनम जी नमस्ते
बहुत दिन बाद मई आपकी पोस्ट देख रहा हु बहुत अच्छा लगा आपका भुक मन ने जो कबिता कही है उसे बारम्बार प्रणाम भगवान जापानियों को सम्हालने का समय दे प्रकृति पर किसी का बस नहीं है .ईश्वर स्वर्गवासी हुए लोगो की आत्मा को शांति प्रदान करे.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

poonam ji sach me is anhoni durghatna ne to sab ke dilo me maatam sa kar diya hai. kuchh palo ko bhi un logo ke bare me sochti hun to man kitne hi avsaad se bhar uthta hai..bhagwaan se yahi prarthna hai ki koi chamtkaar kar is pralay ko roken aur jo musibat me hain unko kisi bhi zariye se madad pahuchaayen aur insaan apni insaaniyat ke farz pure karen.

निर्मला कपिला ने कहा…

आपकी कामना पूर्ण हो यही कह सकते हैं सब प्रकृ्ति के हाथ मे है। शुभकामनायें।

रचना दीक्षित ने कहा…

समझने वालों के लिए प्रक्रति का ये इशारा ही काफी है पिछले काफी समय से चल रहा है ये सब फिर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. सब यहाँ आज भी उसी रफ़्तार से भ्रष्टाचार करने में लगे है जाने क्या क्या ले जाने वाले हैं यहाँ से.

OM KASHYAP ने कहा…

आदरणीया पूनम जी
नमस्कार..
आप सभी ने सही कहा
आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाये
ब्लॉग पर अनियमितता होने के कारण आप से माफ़ी चाहता हूँ .

muskan ने कहा…

आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

Kunwar Kusumesh ने कहा…

हफ़्तों तक खाते रहो, गुझिया ले ले स्वाद.
मगर कभी मत भूलना,नाम भक्त प्रहलाद.
होली की हार्दिक शुभकामनायें.

Ravi Rajbhar ने कहा…

Apne sabhi ke man ki byatha kah di.
sach me kabhi-2 kam kitane majbur ho jate hain ...........hai na?

Holi ki Subhkamnaye.

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता ! उम्दा प्रस्तुती! ! बधाई!
आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

ज्योति सिंह ने कहा…

shayad hame hi jimmedaar hai par hai dukh ki baat .holi ki badhai aapko .

Kailash C Sharma ने कहा…

होली की हार्दिक शुभकामनायें !

क्षितिजा .... ने कहा…

आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएं

BrijmohanShrivastava ने कहा…

होली का त्यौहार आपके सुखद जीवन और सुखी परिवार में और भी रंग विरंगी खुशयां बिखेरे यही कामना

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

रंग-पर्व पर हार्दिक बधाई.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

प्राकृतिक आपदा पर इंसान का कोई वश नहीं ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपको और समस्त परिवार को होली की हार्दिक बधाई और मंगल कामनाएँ ....

Patali-The-Village ने कहा…

आपकी कामना पूर्ण हो यही कह सकते हैं सब प्रकृ्ति के हाथ मे है। धन्यवाद|

neelima sukhija arora ने कहा…

अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदाओं से हमें सबक लेना चाहिये

Babli ने कहा…

आपकी टिपण्णी और हौसला अफ़जाही के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

बेनामी ने कहा…

पूनम जी जीवन की बगिया मे फूलो के साथ शूल भी उगते है यही जीवन क सच है, बहुत सुन्दर रचना

urmila ने कहा…

पूनम जी जीवन की बगिया मे फूलो के साथ शूल भी उगते है यही जीवन क सच है, बहुत सुन्दर रचना

Ramkumar Vaishnav ने कहा…

मेरी मदद करे ब्लाक बनाने मे जिसमे मै भी ऊपनी रचना आप सबके समक्ष प्रसूतुत कर सकू