बुधवार, 16 नवंबर 2011

आ मुसाफ़िर लौट आ


आ मुसाफ़िर लौट आ अब भी अपने डेरे पर,

भटकता रहेगा कब तलक,तू यूं ही अब डगर डगर।

दिन ढले सूरज भी देख जा छुपा है आसमां में,

सुरमई शाम आ चुकी है अब अपने वक्त पर।

पेड़ पशु पक्षी भी देख अब तो सोने जा रहे,

कह रहे हैं वो भी अब तू भी तो जा आराम कर।

लुटा दिया जिनकी खातिर तूने जीवन अपना ताउम्र,

क्या तुझे पूछा उन्होंने इक बार भी पलटकर।

तेरे ही लहू के अंश हो गये तितर बितर,

बेगाने हो गए जिन्हें तूने रखा सीने से लगाकर।

जाने वक्त की घड़ी कब किधर रुख बदल ले,

कब तक खड़ा रहेगा तू जिन्दगी के हाशिये पर।

वक्त है अब भी सम्हल जा अपने लिये भी सोच तू,

जी लिया गैरों की खातिर अपने लिये भी जी ले जी भर।

000000

पूनम

41 टिप्‍पणियां:

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Apne kandhon par uthaye bojh jo chalta raha..
Wo kaabhi bhi, saans tak..
Lene ki khatir na ruka..

Sundar bhaav...

Deepak Shukla..

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुंदर,
क्या कहने
शुभकामनाएं

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दिनभर के श्रम को रात का विश्राम आवश्यक है।

minoo bhagia ने कहा…

nadan pariney ghar aa jaa :)

Sunil Kumar ने कहा…

कई अर्थों को समेटे हुए एक अच्छी रचना बधाई

पत्रकार-अख्तर खान "अकेला" ने कहा…

bhtrin rchnaa ke liyen mubark ho .akhtar khan akela kota rajsthan

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना .....

dheerendra ने कहा…

पूनम जी बहुत सुंदर प्रस्तुति बधाई...

ASHA BISHT ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति तमाम भावों को समेटे हुए ...

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत सुंदर रचना .....

Human ने कहा…

बहुत ही अच्छे भाव कलम को बख्शें हैं आपने ।


अपने महत्त्वपूर्ण विचारों से अवगत कराएँ ।

औचित्यहीन होती मीडिया और दिशाहीन होती पत्रकारिता

घनश्याम मौर्य ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर भाव कविता के। अगर इन पंक्तियों को एक समान मीटर में लिखा जाये तो सोने पे सुहागा वाली बात हो जायेगी।

डॉ0 मानवी मौर्य ने कहा…

भावपूर्ण प्रस्‍तुति।

shikha varshney ने कहा…

नादान परिंदे घर आ जा......

G.N.SHAW ने कहा…

पूनम जी , इस कविता में एक छुपी हुयी दर्द और उसके साथ ही हर एक की एक किनारा होता है - को आपने बहुत ही सहज भाव में प्रस्तुत कर दिखाया है ! बहुत - बहुत शुभ कामनाएं !!

वन्दना ने कहा…

पूनम जी इंसान बस वापस ही नही लौटना चाहता चाहे नीड कितना भी दुखदायी क्यो ना हो उससे जुडा रहना चाहता है जब तक कि कोई उसे बाहर ना निकाले………॥जबकि अन्तिम परिणति तो यही है ना……………अगर हम सब पहले ही इस सत्य को जान ले और स्वीकार कर ले तो जीना बहुत आसान हो जाये।

सदा ने कहा…

वक्त है अब भी सम्हल जा अपने लिये भी सोच तू,

जी लिया गैरों की खातिर अपने लिये भी जी ले जी भर।
बहुत ही बढि़या ...भावमय करते शब्‍दों का संगम ।

रविकर ने कहा…

आपकी रचना शुक्रवारीय चर्चा मंच पर है ||

charchamanch.blogspot.com

sushma 'आहुति' ने कहा…

behtreen aur bhaavpurn.......

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

एक पेंटिंग की तरह सुन्दर कविता है पूनम बहिन!!

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुंदर!

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत बढ़िया....कुछ ऐसा जो आमतौर पर पढ़ने नहीं मिला करता..। मेरे पोस्ट पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं ।.बधाई ।

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है ... नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 19-11-11 को | कृपया पधारें और अपने अमूल्य विचार ज़रूर दें...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत सच कहा है ... सही समय पर अपने बारे में सोच लेना चाहिए ... कहीं देर न हो जाए ..

Gyandutt Pandey ने कहा…

जी लिया गैरों की खातिर अपने लिये भी जी ले जी भर।
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अब बहुधा इस सोच से दो चार होता हूं।

सुमन'मीत' ने कहा…

बहुत सुन्दर ..पूनम जी

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सोचने पर विवश करती अच्छी प्रस्तुति

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल आज 24-- 11 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज ..बिहारी समझ बैठा है क्या ?

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल आज 24-- 11 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज ..बिहारी समझ बैठा है क्या ?

Rakesh Kumar ने कहा…

आपकी पोस्ट पर देरी से आने के लिए क्षमा चाहता हूँ.बहुत सुन्दर भावपूर्ण और प्रेरक प्रस्तुति है आपकी.

बहुत बहुत आभार पूनम जी.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
नई पोस्ट पर हार्दिक स्वागत है.

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

पूनम जी बहुत सुन्दर ...काश लोग इस पर विचार करें और ऐसा न हो ....अपने लहू सदा हमारे बने रहें ...
बधाई हो ..सुन्दर सीख देती रचना
भ्रमर ५


लुटा दिया जिनकी खातिर तूने जीवन अपना ताउम्र,

क्या तुझे पूछा उन्होंने इक बार भी पलटकर।


तेरे ही लहू के अंश हो गये तितर बितर,

बेगाने हो गए जिन्हें तूने रखा सीने से लगाकर।

Kailash C Sharma ने कहा…

जाने वक्त की घड़ी कब किधर रुख बदल ले,

कब तक खड़ा रहेगा तू जिन्दगी के हाशिये पर।

...रचना के भाव अंतस को गहराई तक छू जाते हैं...बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..आभार

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

vichaarneey post.

meri pahle ki tippani gayab ho gayi hai.

dheerendra ने कहा…

क्या बात है,..सुंदर रचना ,..
मेरे नए पोस्ट पर स्वागत है,,

Rachana ने कहा…

bahut hi sunder kuchh pal apne liye bhi ji .sahi kaha aapne
rachana

Dr.Bhawna ने कहा…

लुटा दिया जिनकी खातिर तूने जीवन अपना ताउम्र,

क्या तुझे पूछा उन्होंने इक बार भी पलटकर।

तेरे ही लहू के अंश हो गये तितर बितर,

बेगाने हो गए जिन्हें तूने रखा सीने से लगाकर...

Ekdma sach ko sparsh karti panktiyan bahut sundar...

Kewal Joshi ने कहा…

गहरे , बिचारणीय सुन्दर भाव .... आभार.

होली की शुभकामनाएं.

सूबेदार जी पटना ने कहा…

कई संदर्भो को समेटी हुई कबिता यट्टम रचना बहुत-बहुत बधाई.

madhu singh ने कहा…

बहुत सुंदर, अच्छी रचना कब तक खड़ा रहेगा तू जिन्दगी के हाशिये पर। वक्त है अब भी सम्हल जा अपने लिये भी सोच तू, जी लिया गैरों की खातिर अपने लिये भी जी ले जी भर।

दीर्घतमा ने कहा…

जिंदगी से रूबरू कराती हुई कबिता-----
खुबसूरत ----