शुक्रवार, 2 मई 2014

मौसी की चालाकी

बिल्ली ने ये मन में ठाना
चूहों को है सबक सिखाना
खेल चुके घण्टी का खेल
अब मुझको है शंख बजाना।

बहुत विचार किया मौसी ने
शुरू किया फ़िर गाना गाना
जंगल के सारे जीवों को
लगी सिखाने ढोल बजाना।

चूहों को भी शौक लगा फ़िर
क्यूं ना सीखें हम भी गाना
भूल गये मौसी का गुस्सा
लगे सीखने ढोल बजाना।

मौसी मन ही मन मुस्काई
चूहों पर खुब प्यार लुटाई
जितने चूहे आते जाते
मौसी खाके गाती गाना।
0000
पूनम श्रीवास्तव


11 टिप्‍पणियां:

manohar chamoli ने कहा…

hummmmmm!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

sunder baal rachna

Kuldeep Thakur ने कहा…

-सुंदर रचना...
आपने लिखा....
मैंने भी पढ़ा...
हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
दिनांक 05/05/ 2014 की
नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
हलचल में सभी का स्वागत है...

कविता रावत ने कहा…

चूहा बिल्ली का खेल निराला

बहुत सुंदर बाल रचना

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

बहुत खूब

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-05-2014) को "संसार अनोखा लेखन का" (चर्चा मंच-1602) पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद प्रसाद ने कहा…

बहुत सुन्दर !
New post ऐ जिंदगी !

Onkar ने कहा…

सुंदर बाल कविता

Onkar ने कहा…

सुंदर बाल कविता

Vinay Prajapati ने कहा…

बाल कविता तो मस्त है!

Rakesh Kumar ने कहा…

चूहे ड़ाल ड़ाल
तो बिल्ली भी पात पात

बहुत सुन्दर पूनम जी,