रविवार, 23 नवंबर 2008

ऑंखें


ऑंखें
जाने क्या कहती रहती है
आंखों की परिभाषा
कुछ गुनती कुछ बुनती रहती
है ये मन की अभिलाषा.

आँखों से छलकती है
जीवन की आशा
आँखों से ही टपकती है
जिज्ञासा और निराशा.

ऑंखें नहीं तो क्या जानें
क्या सूखा क्या बरसा
बिन आँखों के जीवन जैसे
बूँद बूँद को तरसा.

ऑंखें ही तो बयां करती हैं
झूठ और सच का किस्सा
कह न सके जो बात जुबान
वो बनती आंख का हिस्सा.

आँखों में ही जीवन का
हर लम्हा लम्हा बसता
इसीलिये ये जग आँखों को
ईश्वर की इनायत कहता.
००००००००००
पूनम

5 टिप्‍पणियां:

www.creativekona.blogspot.com ने कहा…

Poonamji,
Apkee ankhen aur Kavita dono hee kavitaen bahoot sunder han.Ankhon ke madhyam se jahan apne ek achcha sandesh diya ha,vaheen Kvita..men apne ek kavi ke andar chalne vale antardvndva ko roopayit karne ka prayas kiya ha.Dono rachnaon ke liye meree hardik badhai evam shubh kamnaen.

seema gupta ने कहा…

आँखों से छलकती है
जीवन की आशा
आँखों से ही टपकती है
जिज्ञासा और निराशा.
" a beautifuly composed poem with nice thoughts"

Regards

Meenu khare ने कहा…

good expression...

Babli ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! आंखें सब कुछ कह देती है और आपने हर एक लाइन इतना सुंदर लिखा है कि तारीफ के लिए अल्फाज़ कम पर गए! बहुत ही गहराई से आपने सुंदर रूप से शब्दों में पिरोया है! बहुत पसंद आया आपकी ये रचना !

SAJAN.AAWARA ने कहा…

AANKHE DIL KA AAYENA HOTI HAIN. APNE JO PANKTIYD LIKHI HAIN WO SUNDAR HAIN. . . . . JAI HIND JAI BHARAT