शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

एक याद


आज याद रही है माँ बहुत
आज मन रोने को है बहुत
लगता है जैसे बरसों बीत गये
मां का चेहरा देखने को तरस गये
ऐसा नही है की उनसे बात नहीं होती
हो जाती है बात फोन पर
मुलाकात नही होती
आज लग रहा है क्यों याद आता है
बेटियों को मायका
जबकि उनका ख़ुद का घर पुरा भरा हुआ
मां-बाबू सा ही प्यार मिलता ससुराल में
फ़िर भी कमी है अखरती थोड़ी बहुत
आज याद आ रही है माँ बहुत
वो डालडे घी में नमक लगा
मां के हाथ की बनी रोटियां
बेकार है उस स्वाद के आगे
छप्पन भोग की थालियाँ
आज याद आ रही है मां बहुत
लगा कर सर में तेल
गूंथती थी दो चोटियाँ
डांटती भी थी
जिसमें छुपा
प्यार होता था बहुत
आज याद आ रही है माँ बहुत
धीरे धीरे अब समझ में
आती है वो माँ की बातें
जो समझाती रहती हमको
लगती थी वो बेमानी बातें
मां की सीख से हमने भी
अब सीखा थोड़ा बहुत
आज याद आ रही है माँ बहुत ।
पूनम

13 टिप्‍पणियां:

विनय ने कहा…

प्रभावशाली कविता!

अविनाश ने कहा…

dil ko chu gaye

रश्मि प्रभा ने कहा…

माँ तो बचपन होती है,उम्र की पहली सीढ़ी से साथ चलती है,
उसकी याद अलग होती है.......
बहुत अच्छी यादें

amitabhpriyadarshi ने कहा…

पूनम जी आपने याद दिला दी माँ . प्यारी थपकी, आचल में समेटना, माथे पर स्नेहिल चुम्बन सब ताज़ा हो गया.
धन्यवाद.
आपकी और भी कवितायें पढ़ी. अच्छा लगा खास कर बेटियाँ .रचनाएँ सुंदर हैं .

ilesh ने कहा…

"Maa" is ek shabd me hi duniya ki saari khushi sama jati he....umda peshkash...

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

माँ है ऐसा एक झरोखा,
जो दिखलाता बचपन की वे सारी मधुर झाँकियाँ!

जिन्हें देखकर मन रोता है,
हँसता भी है चहक-चहककर ख़ुश हो बजा तालियाँ!

kumar Dheeraj ने कहा…

बिल्कुल बढ़िया कविता । मां के नही होने का गम आपको है ...मां से प्यारी चीज इस धरती कुछ नही होता है । मां का साथ में रहना ,उसके साथ व्यतीत किये बचपन किसे नही याद आता है । फिर अपने बच्चे के सारे दुख को अपने आंचल में लेकर मां क्या नह करती है । तभी तो मां सबसे ज्यादा प्यारी होती है । शुक्रिया

creativekona ने कहा…

पूनम जी ,
आपने माँ के लिए बहुत ही सुंदर ,भावः पूर्ण
पंक्तियाँ लिखी हैं .बधाई स्वीकारें.
मैं तो आपकी रचनाएँ अक्सर पढता हूँ .देख रहा हूँ आपकी कविताओं,गजलों .गीतों के शिल्प एवं कथ्य दोनों में काफी निखर अत जा रहा है .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

माँ की ममता, हर बेटी को,याद बहुत आती है।
सूने मन में माता की, परझाँई उभर आती है।।

माता की शिक्षाओं को, अपनी बेटी को देती हूँ।
बचपन में जो सीख मिली थी,वो बेटी को देती हूँ।।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
sandhyagupta ने कहा…

Maan sansar me ishwar ka jeeta jagta swaroop hai.
Atyant prabhavi aur bhavpurna rachna.

Meenu khare ने कहा…

बहुत प्यारी कविता और माँ का फोटो .

Dr. shyam gupta ने कहा…

bahut sundar,

"poorn shabd 'maan',poorn granyh maan.
shishu baanee kaa prathm shabd maan.
jeevan kee har ek safltaa kee,
pahlee seedee hotee maan."

" maan anupam hai,vah aseem hai,
chhamaa dayaa sraddha ka sagar.
kabhi nahin reetee ho paatee,
maan ki mamtaa roopee gaagar.

(dr shyam gupt ke pre kaavy-mahaa kavy se)