शनिवार, 9 जनवरी 2010

कुहरा


बादलों के रंग देखो उड़ उड़ के रह गये

अश्कों की बरसात देखो बिन कहे ही बरस गये।

शीत ने अपनी घनी चादर रंग में कुहरे के बिछाई

उसके छंटने के इन्तज़ार में बस आंख मल के रह गये।

सूरज ने भी ना निकल कर रंग दिखाये अपने ताव के

चादरों के झरोखों से उसके दीदार को रह गये।

लोग यूं थरथरा रहे इस बर्फ़ को जमाती शीतलहरी में

पांव भी अपने को ज़मीं पर रखने से इनकार कर गये ।

गुजरती नही रातें सभी की रजाईयों के बीच में

और तो कुछ बिन कपडों के ही अलाव तापते रह गये।

सूरज और,ठंड के बीच जो जंग छिड़ी

भुगतने को खामियाजा उसका हम सभी ही रह गये।

ज्यों बादलों के बीच रंग धनुषी अच्छे लगे

वैसे ही कड़कड़ाती ठंड में सूरज की तपिश को रह गये।

जैसे गर्मी में क्षणिक हवा का झोंका भी प्यारा लगे

अहसास हो गुनगुनाती धूप का बस आह भर कर रह गये।

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पूनम

20 टिप्‍पणियां:

बालकृष्ण अय्य्रर ने कहा…

आपकी कविता में उपस्थित लय मुझे बहुत अच्छी लगी. एक अच्छी रचना के लिये आभार.

Apanatva ने कहा…

aapane to mousam ko nazar kar dee ye rachana .
bahut hee sunder sardee ka chitran kiya hai.
apana Bharat mahan hai ham log yanha south me garmee se tang hai.
power cut bhee hai fan nahee chala pa rahe .
ha na kitnee vividhata Bharat me.

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बहुत सुंदर भाव..मौसम के बिगड़ैल मिज़ाजा का ख़ामियाजा तो हमें ही भुगतना पड़ता है..एक सुंदर प्रवाह के साथ बढ़िया कविता..प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!!!!

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

अच्छा वर्णन किया गया है - कोहरा का!

ओंठों पर मधु-मुस्कान खिलाती, रंग-रँगीली शुभकामनाएँ!
नए वर्ष की नई सुबह में, महके हृदय तुम्हारा!
संयुक्ताक्षर "श्रृ" सही है या "शृ", उर्दू कौन सी भाषा का शब्द है?
संपादक : "सरस पायस"

sangeeta swarup ने कहा…

आज कल के मौसम का सटीक वर्णन....और उससे होने वाली परेशानियों का भी....आपके लेखन में आपकी संवेदनशीलता का पता चलता है ....उन लोगों के प्रति जो सर्दी में गर्म वस्त्रों के आभाव में रहते हैं....सुन्दर अभिव्यक्ति

sanjeev kuralia ने कहा…

एक सुंदर रचना के लिए आभार !

मनोज कुमार ने कहा…

सरलता और सहजता का अद्भुत सम्मिश्रण बरबस मन को आकृष्ट करता है।

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

sheet ritu ka sunder shabdo se sunder varnan rachna ki sundarta ko badha raha hai aur mujhe to ise padh kar aur thand lag rahi hai...

badhayi.rajayi me hi.

राज भाटिय़ा ने कहा…

सुंदर रचना.लेकिन यह कोहरा तो हर साल आता है, बस हम ही भुल जाते है, जेसे नेता हर बार आ कर अपनी वोट ले जाता है, हम ही उस के वादे भुल जाते है, जो उस ने कभी पुरे नही किये होते, ओर नये सपने दे जाता है

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सुन्दर!
घुघूती बासूती

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी कविता।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सर्दियों के ठिठुरते मौसम का सजीव चित्रण किया है ..........

अल्पना वर्मा ने कहा…

सूरज और ठंड के बीच छिड़ी जंग और उसके हम सब पर असर का खूब सही चित्रण किया है.
-अच्छी रचना.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

जैसे गर्मी के मौसम मे हवा का झोंका वैसे ही सर्दी के मौसम मे सूरज की तपिश ।उत्तम तुलना । सूरज और ठंड के बीच जंग मे कुछ लोगों ने आग के सहारे रातें काटीं ।बादलों के रंग , शीत की घनी चादर ,उत्तम चित्रण ।आग के सहारे रात काटने की बात पर मुझे "फूंस की रात "कहानी का हल्कू याद आ गया ।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सरलता और सहजता से आपने इन लफ़्ज़ों में मौसम की बात कह दी है ..बहुत पसंद आई यह रचना शुक्रिया

Rakesh ने कहा…

गुजरती नही रातें सभी की रजाईयों के बीच में

और तो कुछ बिन कपडों के ही अलाव तापते रह गये।
wah aapne mausam ka jo bayan kiya wo tathya ke saath samaj mein uplabdh sadhno ke abhav v uplabdhta ke beech ka furk bhi samja gaya ...drashya ka bayan hi kiya sahajta se aur apni taraf se na kuch kehte hue bhi sab kuch keh diya yehi es kavita ko shikher tak le jata hai ..sadhuvad

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

पूनम जी
नमस्कार
बड़ी सरल , सहज और भाव प्रधान रचना के लिए बधाई.

- विजय

rajiv ने कहा…

Sachmuch apna Lucknow itana bada ho gaya hai.. Koi itani achchi kavita rach raha hai aur ham hain ki poore Lucknow ko janane ka mugalta paale huye hain :)

अभिषेक प्रसाद 'अवि' ने कहा…

is sard mausam mein achhi rachna di hai aapne... maja aagaya... adbhutaas..

Harsh ने कहा…

bahut achchi post lagi.........