शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

गजल


मत दिखाओ मुझे वो आईना जिससे हो गई नफ़रत मुझे

जिसमे अपना ही अक्स अब बदला नजर आता है।

सोचती हूं खोती जा रही हूं अपनी ही पहचान

मगर नहीं ,यहां तो हर शख्स ही गंदला नजर आता है।

बेखुदी में जाने क्या कह गये हम उसे

हैरान सा खड़ा उसे मुझमें पगला नज़र आता है।

किससे करुं सवाल और किससे मांगू जवाब

यहां तो हर शख्स ही मुंह छुपाये निकला नज़र आता है।

किसी मंज़िल तक पहुंचने की जब जब करती हूं कोशिश

क्या करुं वहां भी मुझसे खड़ा कोई पहला नज़र आता है।

कभी फुर्सत में बैठ के करती हूं बीते वक्त का हिसाब

पर वो कल का वक्त भी धुंधला नज़र आता है।

लगी हुई बाज़ी को जीतती गई बार बार

पर हर बार इनाम की पंक्ति में कोई अगला नज़र आता है।

जारी हैं कोशिशें फ़िर भी, चलता रहेगा ये कारवां

पर जो आप मुस्कुराएं,तो सब कुछ खिला नजर आता है।

0000

पूनम

22 टिप्‍पणियां:

sangeeta swarup ने कहा…

वाह , पूनम जी,

बहुत सही आईना दिखाया है....बहुत खूब

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर लगी आप की यह रचना

Udan Tashtari ने कहा…

कभी फुर्सत में बैठ के करती हूं बीते वक्त का हिसाब

पर वो कल का वक्त भी धुंधला नज़र आता है।


-बहुत बढ़िया.

sanjeev ने कहा…

सोचती हूं खोती जा रही हूं अपनी ही पहचान...
bahrupiyon ki is duniya me apni pahchan bachaye rakhna wastav me ek chunauti hai.

bahut hi marmsparsi rachna.

RaniVishal ने कहा…

Bhavnao se sarabor dil ko chhuti rachana hai....!!

Apanatva ने कहा…

sunder abhivyktee!

ह्रदय पुष्प ने कहा…

पर हर बार इनाम की पंक्ति में कोई अगला नज़र आता है।
बेशक कोई दो राय नहीं - लेकिन कब तक मुहं छुपायेंगे और हमें भी खेल तो खेलना ही होगा बाजी जीतने की कोशिश तो करती रहनी होगी - बेहद सटीक और सार्थक मनोभावों से संजोयी रचना के लिए हार्दिक बधाई.

KAVITA RAWAT ने कहा…

किससे करुं सवाल और किससे मांगू जवाब
यहां तो हर शख्स ही मुंह छुपाये निकला नज़र आता है।
aur
कभी फुर्सत में बैठ के करती हूं बीते वक्त का हिसाब
पर वो कल का वक्त भी धुंधला नज़र आता है।
isi dhundhlake se bahar nikalne ka naam jadodayat hai...
Bahut achhi gajal.
Badhai

अपूर्व ने कहा…

क्या करुं वहां भी मुझसे खड़ा कोई पहला नज़र आता है।
क्या बात है..आगे भी हताशा!

अनिल कान्त : ने कहा…

bahut achchhi gazal padhne ko mili

मनोज कुमार ने कहा…

लगी हुई बाज़ी को जीतती गई बार बार

पर हर बार इनाम की पंक्ति में कोई अगला नज़र आता है।
सच। ... ऐसा ही होता है।

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

bahut badhiya koshish hai poonam ji. badhayi.

निर्मला कपिला ने कहा…

कभी फुरसत मे ----- पँक्तियाँ बहुत अच्छी लगी। शुभकामनायें

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सोचती हूं खोती जा रही हूं अपनी ही पहचान
मगर नहीं ,यहां तो हर शख्स ही गंदला नजर आता है ....

सच कहा कुछ ऐसा ही आई आज का माहॉल .......... समाज का यथार्थ की धरातल पर किया चित्रन .....

Amitraghat ने कहा…

ये नकारात्मक्ता आपकी अगली रचना मे समाप्त हो उसके इंतजार मे ।
प्रणव सक्सेना
amitraghat.blogspot.com

Babli ने कहा…

बेखुदी में जाने क्या कह गये हम उसे
हैरान सा खड़ा उसे मुझमें पगला नज़र आता है।
किससे करुं सवाल और किससे मांगू जवाब
यहां तो हर शख्स ही मुंह छुपाये निकला नज़र आता है।
वाह बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ दिल को छू गयी! इस उम्दा रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

आइना की कोई गलती नही , चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो आइना झूंठ बोलता ही नही ,यह मै नही कहरहा यह कहा था श्री क्रष्ण बिहारी नूर ने ""।हैरान सा खड़ा उसे मुझमें पगला नज़र आता है।"" लाइन पर पुनर्विचार करने का कष्ट करे

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut dino se link dhoondh rahi thi aane ko yahan aaj kisi blog se mil gaya ,vande maatram .
hridyasparshi rachna komal bhav liye .

अजय कुमार ने कहा…

आपने आइना देखा नही , दिखाया है समाज को

Babli ने कहा…

कैसे हैं आप? काफी दिन हो गए आप मेरे ब्लॉग पर नहीं आये! वक़्त मिलने से मेरी नयी कविता और शायरी ज़रूर पढ़िएगा!

sandhyagupta ने कहा…

कभी फुर्सत में बैठ के करती हूं बीते वक्त का हिसाब

पर वो कल का वक्त भी धुंधला नज़र आता है।

In panktion ne dil chu liya.shubkamnayen.