रविवार, 12 जून 2016

खोज

जिसे तुम खोज रहे हो
वो मिला नहीं
अब तक शायद
वक्त आगे निकल गया
और फ़िर तुम पीछे रह गये
तुम वक्त का इन्तजार
कर रहे थे
पर वक्त किसी का
इन्तजार नहीं करता
वो निरन्तर हर पल
आगे ही आगे चलता
रहता है।
लाख वक्त को पकड़ने
की कोशिश कर लें
पर वो तो यूं फ़िसल जाता है
हथेली से ज्यूं
बंद मुट्ठी से रेत।
000
पूनम श्रीवास्तव


5 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (13-06-2016) को "वक्त आगे निकल गया" (चर्चा अंक-2372) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

राकेश कौशिक ने कहा…

सत्य और सार्थक

Asha Joglekar ने कहा…

बहुत सुंदर। हमारे एक प्रोफेसर कहा करते थे, वक्त को आगे से पकडो पीछे से वह गंजा है।

महेश कुशवंश ने कहा…

वक्त रुकता नहीं , बहुत सुंदर

Digamber Naswa ने कहा…

वक़्त को पकड़ा नहीं उसके साथ साथ चला जाता है ... और जो नहीं चल पाता पीछे रह जाता है ... खाली मुट्ठी की तरह ...
भावपूर्ण रचना है ....