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रविवार, 26 दिसंबर 2010

नया साथी


मन ने कहा

चलो एक साथी नया बनायें

किसी से वक्त बांटें,बातें करें

कुछ उसकी सुनें कुछ अपनी कहें।

एक तो श्रीमान जी

सुबह गये ढले शाम घर आये

फ़िर दिन का लेखा जोखा

क्यों सुनें और सुनायें

है आज भी मेरा एक साथी

जो मेरा साथ देने को

हरदम तैयार

लेकिन उसकी मजबूरियां हैं

क्योंकि वो भी

है किसी के अधीन।

पर मैंने उससे विनती की

रोज नहीं तो दो चार

दिन पर ही आ जाया करो

थोड़ा मन बहलेगा।

वो भी मूक दर्शक की तरह

मेरी बातें सुनता रहता है

लेकिन हमने उससे ये भी कहा

कि देखो दगाबाजी मत करना

ऐसे लोग मुझे पसन्द नहीं।

फ़िर भी वो आया

करीब एक सप्ताह के बाद

मुझे पहले तो उस पर

बहुत ही गुस्सा आया

बहुत झुंझलाई

पर वो एक निरीह पशु

के समान चुपचाप

सिर झुकाये मेरी बात

सुनता रहा।

फ़िर मुझे लगा शायद

मैं कुछ ज्यादा ही बोल गयी

काम बिगड़ जायेगा

मैंने उसको प्यार से समझाया

और कहा देखो तुम अपना भी

ध्यान नहीं रख पाते

इसीलिये तुम्हें भी एक साथी की जरूरत है।

मैंने बड़े प्यार से उसके

कपड़ों को झाड़ा

बड़े ही मन से उसकी

उंगलियां सहलायीं

और अपने हाथों ही

उसके चेहरे को साफ़ किया

मेरे इतना करने भर से ही

उसका चेहरा झिलमिला उठा।

पता नहीं उसको

मेरा स्नेह अच्छा लगा या नहीं

पर फ़िर भी

उसकी मुस्कुराहट देखते ही

बनती थी।

मैंने फ़िर उससे बातचीत

करने का सिलसिला शुरू किया

और वो भी मेरा साथ देने के लिये

खुशी खुशी तैयार हो गया।

कुछ मैंने अपने मन की कही

उसकी भी ध्यान से सुनी

और खुशी खुशी जवाब दिया

फ़िर उसने कहा साफ़ साफ़

शब्दों में देखो दोस्ती में

विश्वास का पुट होना चाहिये

मैं रोज का वादा तो नहीं

कर सकता

वो तुम जानती हो

फ़िर भी दगाबाज कहने में

नहीं चूकती हो

हां इतना वादा है जरूर साथ तुम्हारा

दूंगा हमेशा जब तक तुम चाहोगी।

पर अभी वक्त क्यों खराब

कर रही हो

जो कहना है कह डालो

जल्दी जल्दी

पर एक अनुनय है

अपना विश्वास मुझ पर

कायम रखना।

(अरे---- अरे------ जनाब, कहां चल दिये आप।पूरी पोस्ट तो पढ़ते जाइये। ये नये साथी मेरे कोई और नहीं मेरे कम्प्युटर और इन्टरनेट महोदय हैं। जो अक्सर ही आजकल धोखा दे जाते हैं। और मैं उनके आने का इन्तजार करती रहती हूं।क्यों आश्चर्य में पड़ गये न आप………JJ)

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पूनम