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शनिवार, 29 मार्च 2014

ये भी तो कुछ कहते हैं-----

पड़ते कुल्हाड़े पेड़ों पर जब
उनके भी  आंसू बहते हैं
सोचो जरा इक बात तो आखिर
क्या वो भी हमसे कुछ कहते हैं?

जो हैं हमारे जीवन रक्षक
क्यूं हम उनके भक्षक बन जायें
जो जीवन को देने वाले हैं
उनके ही दुश्मन कहलायें।

काटने पर हम तुले हैं जिसको
शहर शहर और गांव गांव
आने वाले समय में फ़िर तो
मिलेगी न हमको उनकी छांव।

जो धरती का आंचल लहराये
पर्यावरण को सदा बचाए
धूप ठंढ बारिश को बचा के
मानव जीवन को हरसाए।

प्रकृति है जिससे हरी भरी
जो बादल से बारिश ले आते
जिनके कारण ही तो हम
नव जीवन हैं अपनाते।

आओ हम सब बच्चे मिल जाएं
फ़िर एक पेड़ न कटने पाये
जगह जगह पर पेड़ लगा कर
हरियाली वसुन्धरा पर लायें।
0000

पूनम

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

धरती की सैर


चाँद ने बैठे बैठे सोचा,
चलो धरती की सैर कर आयें
थोड़ा मन बहलायें।

चाँद उतरा जमीन पर
पहुँचा एक पेड़ के पास
और बोला
दोस्त चलो हम दोनों
मिल कर धूम मचाएं
झूमें नाचें और गायें।

पेड़ ने दुखी होकर चाँद को देखा
निहारा और फ़िर कराहा
दोस्त तुम ग़लत जगह आए हो
कहाँ की हरियाली
कहाँ की खुशहाली
अब तो बात गुजरने वाली।

यहाँ तो इन्सान
इन्सान को काट रहा है
ज्यादा पाने की लालच में
सब कुछ मिटा रहा है
हमारी जड़ें खोद कर
अपने लिए कब्र बना रहा है।

सुन कर चाँद आहत हुआ
मानो उसको कोई भ्रम हुआ
फ़िर घूमते घामते पहुँचा नदी के पास
कल कल करते नदी झरने तालाब।

वह देखकर हुआ बड़ा प्रसन्न
और बोला
तुम्हारी दुनिया कितनी सुंदर है
झरने तालाब कितने निर्मल हैं।

नदी ने सुनकर
अपना सर उठाया
आँखों से आंसू टपकाया
और बोली ……
तुम्हारी बातें थोथा हैं
ये सिर्फ़ नजरों का धोखा है।

यहाँ तो मनुष्य ने
फ़िर अपना जाल बिछाया
हमारी प्राकृतिक सुन्दरता को
नष्ट कराया
अपने सपनों को साकार
करने के लिए
बहुमंजिली इमारतें और
कारखाने बनवाया
बढ़ती आबादी के लिए
जंगल को सूना करवाया
हरियाली को श्मशान बनाया
सारा जग प्रदूषित करके
अपना ही जीवन नर्क बनाया।

चाँद से रहा न गया
वह बोला —
अच्छा दोस्त चलते हैं
तुम्हारी दुनिया से तो
मेरी दुनिया अच्छी है
जहाँ मनुष्य नहीं है।
००००००००००००
पूनम