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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

ख्वाब सुनहरे


जुगनू सी चमकती आँखों में
कई ख्वाब सुनहरे सजने लगे
अमर बेल से मन के अन्दर
धीरे धीरे पनपने लगे।

फ़िर चाहत पूरा करने की
उमंगें भी उडानें भरने लगीं
एक समय ऐसा आया
जब सच को हम भी समझने लगे।

सपने जो संजोये आँखों ने
वो बनने और बिखरने लगे
सपने और हकीकत में
अन्तर को बयां वो करने लगे।

ठानी हमने भी अपनी
किस्मत को अजमाने की
मेरा जुनूँ ज्यों बढ़ता गया
हकीकत में सपने बदलने लगे।

सपने तो सपने होते हैं
इस सच को हम झुठलाने लगे
पूरे होते हैं ख्वाब तभी
जब रंग मेहनत के भरने लगें।
०००००००००
पूनम

सोमवार, 19 जनवरी 2009

सपने


बंद आँखों में हैं सपने
खुली आँखों में हैं सपने
कभी लगते हैं बेगाने
कभी लगते हैं ये अपने।

कभी वर्षों गुजर जाते
कभी पल में पूरे हो जाते
न जाने कैसे कैसे खेल
खिलाते हैं ये सपने।

कभी कलियों से खिल उठते
कभी बुझते हैं दीपक से
कभी मृग मरीचिका बन कर
हमें चिढाते हैं ये सपने।

तेरे सपने मेरे सपने
पीछे मुडे तो बीते सपने
आगे बढे तो दिखते सपने
काश कभी वो दिन भी आए
पूरे हों जब सबके सपने।
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पूनम