शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

हम जिंदा तो हैं


पंच तत्वों से मिलकर मानव का हुआ मानवीकरण,
मानवता तो खो रही फ़िर भी हम जिंदा तो हैं।

धड़कनें भी चल रही हैं नब्ज भी साथ दे रही,
पर दिल तो भावशून्य है फ़िर भी हम जिंदा तो हैं।

जमीर अपनी बेच दी आत्मा भी मर चुकी,
अपने को बड़े फ़ख्र से कहते फ़िर भी हम जिंदा तो हैं।

हर गली चौराहे पर मां बेटी बहन की बोली लगी है,
देख कर अनदेखे हुये फ़िर भी हम जिंदा तो हैं।

रक्षक ही भक्षक बन बैठे हम हाथ पर हाथ धरे रहे,
आंख का पानी भी मर चुका फ़िर भी हम जिंदा तो हैं।

रिश्तों के मतलब बदल रहे हर अखबार चीख रहा ,
शर्मसार हो रहे रिश्ते फ़िर भी हम जिंदा तो हैं।

हमारे संस्कारों की नींव अब तो डगमगा रही शायद,
गिरने से पहले इसे संभालें इसीलिये हम जिंदा तो हैं।
०००००००

पूनम

14 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

सुन्दर रचना है।बधाई।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मैं मानता हूँ अगर हम जुंडा रहे तो इन सब को दुबारा ठीक कर सकते हैं..... इस लिए जिन्दा तो हर हाल में रहना ही है,.... सुन्दर है रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

"हमारे संस्कारों की नींव,
अब तो डगमगा रही शायद,
गिरने से पहले इसे संभालें,
इसीलिये हम जिंदा तो हैं।"

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
बधाई।

vikram7 ने कहा…

अति सुन्दर बधाई

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

Achchha laga padh kar, laga hum zinda to hain.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

विचारप्रधान सामयिक रचना

sada ने कहा…

धड़कनें भी चल रही हैं नब्ज भी साथ दे रही,
पर दिल तो भावशून्य है फ़िर भी हम जिंदा तो हैं।

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

amazing poem ji , , man ko choo gayi hai aapki rachna ...

aabhar

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

ज्योति सिंह ने कहा…

sundar rachana saath hi satya bhi .

अल्पना वर्मा ने कहा…

'हमारे संस्कारों की नींव अब तो डगमगा रही शायद,
गिरने से पहले इसे संभालें इसीलिये हम जिंदा तो हैं।'

बहुत ही अच्छी samajik samayaon ke prashn uthaati रचना लिखी है पूनम जी.
अब तक की आप की सब से अच्छी रचनाओं में से एक है यह.

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

जमीर अपनी बेच दी आत्मा भी मर चुकी,
अपने को बड़े फ़ख्र से कहते फ़िर भी हम जिंदा तो हैं।

हमारे संस्कारों की नींव अब तो डगमगा रही शायद,
गिरने से पहले इसे संभालें इसीलिये हम जिंदा तो हैं।

ek aisi kavita
jiska shabd-shabd antarman
ko gahraayi se sparsh karta hai.

laajawaab..behatareen rachana

shubh kamnayen

आज की आवाज

Babli ने कहा…

अत्यन्त सुंदर और दिल को छू लेने वाली रचना लिखा है आपने! आपकी हर एक रचनाएँ मुझे बेहद पसंद है! लाजवाब रचना!

abdul hai ने कहा…

Nice written

रचना गौड़ ’भारती’ ने कहा…

आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
रचना गौड़ ‘भारती’