निकला था घर से मैं अमन चैन की खोज में,
पर देखा तो जहां भी अमन चैन खुद को ही तलाश रहा।
वारदातों पे वारदात हो रहे बमों के धमाके
चैन अब तो जेहन में किसी इन्सान के ना रहा।
दिल में है हलचल मची घबराये हैं चेहरे सभी,
सिलसिला खतम होगा कब तलक कुछ भी न सूझता।
बन रहे घर श्मशान लुट गये हैं आशियाने,
सबके दिलों का खौफ़ अब तो चेहरों पे दिख रहा।
सरकार कर रही है मुआवजों का झूठा वादा,
पर घाव बन रहे जो इसकी उसको फ़िकर कहां।
नजरें भी अपने लोगों के आने की राह देखतीं,
अबोध बच्चों के भी चेहरों से हंसी कोई छीन ले गया।
बढ़ रहा आतंक दिनों दिन पानी सर से गुजर रहा,
मन इनसे निपटने का कोई रास्ता ढूंढता ही रह गया।
दिलों में बस ये पैगाम भेज दे प्रेम के प्यारे,
बीज नफ़रत का न पनपे बने खुशियों का इक नया जहां।
000
पूनम