मंगलवार, 16 अगस्त 2011

तलाश


निकला था घर से मैं अमन चैन की खोज में,

पर देखा तो जहां भी अमन चैन खुद को ही तलाश रहा।

वारदातों पे वारदात हो रहे बमों के धमाके

चैन अब तो जेहन में किसी इन्सान के ना रहा।

दिल में है हलचल मची घबराये हैं चेहरे सभी,

सिलसिला खतम होगा कब तलक कुछ भी न सूझता।

बन रहे घर श्मशान लुट गये हैं आशियाने,

सबके दिलों का खौफ़ अब तो चेहरों पे दिख रहा।

सरकार कर रही है मुआवजों का झूठा वादा,

पर घाव बन रहे जो इसकी उसको फ़िकर कहां।

नजरें भी अपने लोगों के आने की राह देखतीं,

अबोध बच्चों के भी चेहरों से हंसी कोई छीन ले गया।

बढ़ रहा आतंक दिनों दिन पानी सर से गुजर रहा,

मन इनसे निपटने का कोई रास्ता ढूंढता ही रह गया।

दिलों में बस ये पैगाम भेज दे प्रेम के प्यारे,

बीज नफ़रत का न पनपे बने खुशियों का इक नया जहां।

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पूनम

28 टिप्‍पणियां:

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

दिलों में बस ये पैगाम भेज दे प्रेम के प्यारे, बीज नफ़रत का न पनपे बने खुशियों का इक नया जहां।
sunder asha...

: केवल राम : ने कहा…

बन रहे घर श्मशान लुट गये हैं आशियाने,
सबके दिलों का खौफ़ अब तो चेहरों पे दिख रहा।

वर्तमान हालातों को बखूबी अभिव्यक्त किया है आपने इन पंक्तियों के माध्यम से ....पूरी रचना एक नए भाव बोध के साथ रची गयी है ...आपका आभार

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

Bhut hi sunder aur vipta aur oje ka sandesh deti rachna

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रेम पूर्ण एक विश्व बने अब।

सतीश सक्सेना ने कहा…

बढ़िया अभिव्यक्ति ....आपकी कामना पूर्ण हो यही इच्छा है !

Sunil Kumar ने कहा…

ईश्वर आपकी कामना पूरी करें , रही हालात बदलने की बात वह तो शायद अभी मुश्किल है , सुंदर अभिव्यक्ति बधाई

रश्मि प्रभा... ने कहा…

निकला था घर से मैं अमन चैन की खोज में,

पर देखा तो जहां भी अमन चैन खुद को ही तलाश रहा।

yahi hai aaj ka sach

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सकारात्मक सोच ..अच्छी प्रस्तुति

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत ही खूबसूरती से आज के सच को कहा है आपने....

सदा ने कहा…

हर शब्‍द हकीकत बन के पंक्ति में ढल गया और यह रचना एक सच्‍चाई बयां कर गई ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

๑♥!!अक्षय-मन!!♥๑, ने कहा…

देखा तो जहां भी अमन चैन खुद को ही तलाश रहा
ohh kitni haqiqat hai bahut hi accha likha hai jitni tarif karuin utna kam hai bahut hi sarahniyee lekhan..

ईं.प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

Bahut Sundar rachna..

मेरे भी ब्लॉग में आयें |

मेरी कविता

दीर्घतमा ने कहा…

ब्यास्तता के कारन बहुत दिन बाद आपके ब्लॉग पर आया हु बहुत अच्छा लगा बर्तमान परिस्थितियों पर झकझोरने वाली कबिता . बन रहे घर समसान लुट गए है -----------
बहुत-बहुत धन्यवाद
सूबेदार सिंह

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बन रहे घर श्मशान लुट गये हैं आशियाने

बहुत बढ़िया रचना ... देश तो बस लुटता रहा देश वाशियों के हाथों ...

minoo bhagia ने कहा…

khushiyn ka ik naya jahan...kahan hai poonam ?

Dr Varsha Singh ने कहा…

मन को उद्वेलित करने वाली मार्मिक कविता....

NEELKAMAL VAISHNAW ने कहा…

नमस्कार....
बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें

मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में........

आपका ब्लागर मित्र
नीलकमल वैष्णव "अनिश"

इस लिंक के द्वारा आप मेरे ब्लाग तक पहुँच सकते हैं धन्यवाद्
वहा से मेरे अन्य ब्लाग लिखा है वह क्लिक करके दुसरे ब्लागों पर भी जा सकते है धन्यवाद्

MITRA-MADHUR: ज्ञान की कुंजी ......

vidhya ने कहा…

बढ़िया अभिव्यक्ति .

Maheshwari kaneri ने कहा…

सकारात्मक और सार्थक सोच.... बढ़िया अभिव्यक्ति .

सुमन'मीत' ने कहा…

aman ka paigam deti hui rachna..bahut sundar..

Babli ने कहा…

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ उम्दा रचना ! बेहतरीन प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

G.N.SHAW ने कहा…

बहुत ही सुन्दर ! अहिंषा के देश में हिंशा -बेचैन कर देता है !

mahendra srivastava ने कहा…

वाकई बहुत सुंदर रचना है,

निकला था घर से मैं अमन चैन की खोज में,

पर देखा तो जहां भी अमन चैन खुद को ही तलाश रहा.

Rachana ने कहा…

बढ़ रहा आतंक दिनों दिन पानी सर से गुजर रहा,

मन इनसे निपटने का कोई रास्ता ढूंढता ही रह गया।
bahut sunder
rachana

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

bahut acchhi prastuti.

ham b isi ummed me hain ki kab khushiyon ka jahan banega...is jiwan me ham dekh payenge use ya nahi.

sunder abhivyati.

mere is blog par bhi apka swagat hai.

http://anamka.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html

Pankaj Bairagi ने कहा…

बढ़िया सकारात्मक अभिव्यक्ति

Banka Ram Choudhary ने कहा…

''चैन अब तो जेहन में किसी इन्सान के ना रहा।''
इंसानियत और इन्सान शायद गुजरे ज़माने की बात हो गयी है. बहुत ही शानदार प्रस्तुति.

Human ने कहा…

बहुत ही अच्छी,सामयिक और भावपूर्ण रचना,बधाई!