गुरुवार, 5 मार्च 2009

एक फूल


मैं एक फूल हूँ
जिसकी महक का एहसास
करते हो तुम
इन वादियों में
और जिसकी खुशबू से
सुगन्धित करते हो
तुम अपने मन को।

लेकिन क्या तुम
बन सकते हो फूल
क्योंकि तुम्हें भी मेरी तरह
अपने आंसुओं को
पीना पड़ेगा
और देना पड़ेगा अमृत
जो मैंने तुमको दिया है।
००००००००००
पूनम

5 टिप्‍पणियां:

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

लगता है -
अब सबको प्यार हो ही जाएगा!
फूलों की कलियों से,
कलियों की मुदिता से,
मुदिता की रचना से,
रचना की शुचिता से,
शुचिता के गुंजन से,
गुंजन की आभा से,
आभा के रंजन से,
रंजन की शोभा से ... ... .

विनय ने कहा…

वाह जी बहुत सुन्दर कविता है!

रश्मि प्रभा ने कहा…

क्या तुम
बन सकते हो फूल
क्योंकि तुम्हें भी मेरी तरह
अपने आंसुओं को
पीना पड़ेगा
और देना पड़ेगा अमृत
जो मैंने तुमको दिया है।
.... शानदार प्रश्न,मन खुश हो गया......

सुमित प्रताप सिंह ने कहा…

सादर ब्लॉगस्ते,
कृपया पधारें व 'एक पत्र फिज़ा चाची के नाम'पर अपनी टिप्पणी के रूप में अपने विचार प्रस्तुत करें।

आपकी प्रतीक्षा में...

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

सुमितजी ने मेरी एक रचना के लिए भी
हूबहू ऐसी ही टिप्पणी की है।
मतलब - कॉपी-पेस्ट करते चले जा रहे हैं
महाशय, बिना रचना पढ़े।
इन्हें मैने यह उत्तर दिया है -

सुमितजी,
बात कुछ जमी नहीं!
यह भी कोई सही तरीका है टिप्पणी करने का?
आप मुझसे टिप्पणी करने के लिए कह रहे हैं,
पर आपने क्या किया है?
मात्र अपने ब्लॉग का विज्ञापन!
कृपया, प्रतीक्षा न करें।
जिस तरह की टिप्पणी आपने की है,
इस तरह की टिप्पणी करना मुझे नहीं आता।
और हाँ, विनय से भी कुछ सीखिए।