रविवार, 22 मार्च 2009

कविता ----- जिन्दगी


कहते हैं जिसे जिन्दगी
उसे ढूँढती हूँ गली गली
क्या नाम है क्या उसका पता
पूछती हूँ गली गली।

आंख जबसे है खुली
मटमैली चादर सी धुली
दिन गुजरता फांकों में
रात कटे बदनाम गली।

मिल जाए गर मुझे जिन्दगी
पूछूंगी उससे कई सवाल
क्यों इंसानी रिश्तों में वह
दो पाटों के बीच ढली।

क्या अमीरों की शान जिन्दगी
या गरीबी की दास्तान जिन्दगी
क्यूं किसी को लगती अनमोल जिन्दगी
क्यों किसी को मौत जिन्दगी से लगती भली।

तू मुझे मिले या ना मिले
चलो कोई शिकवा नहीं
थक चुकी तुझे ढूंढ ढूंढ
अब तो शाम हो चली।

पर मेरा संदेश तेरे नाम है जिन्दगी
एक समय ऐसा आए
जब दिल के हर दरवाजे से निकले
प्रेम से भरी प्रेम गली।
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पूनम

8 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा ने कहा…

तू मुझे मिले या ना मिले
चलो कोई शिकवा नहीं
थक चुकी तुझे ढूंढ ढूंढ
अब तो शाम हो चली।.....bahut badhiyaa

विनय ने कहा…

इस कविता को पढ़कर तो आपसे मिलने की हसरत हो गयी है, बतायें कि आप लखनऊ में कहाँ है? मैं आपसे मिलना चाहता हूँ अगर आपको आपत्ति न हों!

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ज्ञान का अपरमपार भण्डार यही हैं!

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चाँद, बादल और शाम
गुलाबी कोंपलें

BrijmohanShrivastava ने कहा…

मेरा सन्देश तेरे नाम है जिंदगी
तूने रंजो-अलम के सिवा क्या दिया
आँख हमसे मिला ,बात कर जिंदगी

अल्पना वर्मा ने कहा…

Poonam ji,
'zindagi ki talaash mein nikali --zindagi se kayee sawaal karti 'yah kavita
achchee likhi hai.
पर मेरा संदेश तेरे नाम है जिन्दगी
एक समय ऐसा आए
जब दिल के हर दरवाजे से निकले
प्रेम से भरी प्रेम गली।
bahut sundar!

हरि ने कहा…

भावपूर्ण कविता। शुभकामनाएं।

हरि ने कहा…

भावपूर्ण कविता। शुभकामनाएं।

अनिल कान्त : ने कहा…

zindgi ko bahut hi behad sureele dhang se likha hai aapne ....kuchh gam kuchh khushi

sandhyagupta ने कहा…

Sundar aur bhavpurn abhivyakti.Badhai.