शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

दीपावली


दीपावली के शुभ अवसर पर सभी पाठकों को मेरी हार्दिक मंगलकामनायें।

दीपावली


दीपों की अवली से सजी
दीवाली आई प्यारी
जगमग जगमग रोशन करती
घर आंगन और क्यारी।

दीपावली की तैयारी में
जुटे बड़े बूढ़े और बच्चे
खुशी से सबका मन भर दे
शुभ दीपावली न्यारी।

कहीं पे फ़ूटे बम बताशे
कहीं अनार कहीं फ़ुलझड़ी
उछल कूद कर नाचें बच्चे
जब नाचती घूम के चकरी।

चाहे छोटे हों या बड़े
या फ़िर गरीब अमीर
खुशियों से ये पर्व भरेगा
सबके मन की झोली।

चाहे झोपड़ी झुग्गी वाले
या फ़िर हों कोई किस्मत के मारे
खुशियों के दीप जले हर घर में
हे ईश यही है प्रार्थना मेरी।

सबको रोशनी देता दीपक
खुद उसके तले अंधेरा
एक दिये की बाती करती
दूर अमावस की रात घनेरी।

सच्चे मन से मांगू दुआ
खुशी खुशी त्यौहार मने
दीपों की माला से जुड़कर
हम देश के हर दुश्मन से लड़ें।
00000
पूनम

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

सिर्फ़ तुम्हारे लिए

दुनिया में जीवन मिलता नहीं बार बार
पर चाहती हूं जिन्दगी सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

लफ़्ज़ लबों तक आकर थिरकते रहे
पर सी लिया है उनको सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

लोग शब्दों से छलनी करते जिगर को
सीती हूं जख्मों को सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

हमदर्दी के मायने गलत लेते हैं लोग
इस दर्द को सहती हूं सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

जहां में होता नहीं हर कोई एक जैसा
समझाती हूं मन को सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

फ़ूलों के संग होते कांटे भी बहुत ही
बीनती हूं उनको सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

वक्त हर घाव को भरता नहीं
फ़िर भी मलहम लगाती हूं सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

राहों में आती हैं मुश्किलें बहुत सी
उनसे लड़ती हूं मैं बस तुम्हारे लिये।

अश्क आंखों से न गिरने पाये जमीं पे
समेटती हूं आंचल में पहले से ही सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

लहर गमों की जो आये तुम्हारी तरफ़
बन सागर समा लूंगी उन्हें सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

पीना पड़ेगा अगर ज़हर भी कभी
पी लूंगी अमृत समझ सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

रहेगी जब तलक जिन्दगानी मेरी
जीऊंगी मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारे लिये।
0000पूनम

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

प्यारी बेटी नेहा के जन्मदिन दो अक्टूबर पर आशीष

2 अक्टूबर को मेरी प्यारी बेटी नेहा शेफ़ाली का जन्म दिवस था।उस दिन मैनें यह कविता लिखी थी । परन्तु नेट की गड़बड़ी के कारण इसे पोस्ट नहीं कर पायी।इसे आज पोस्ट कर रही हूं।

होठों पे हंसी तेरी नजर में खुशी
का समन्दर हरदम लहराता रहे।

दिल में उमंग चेहरे की दमक
देख देख चांद भी शरमाता रहे।

श्रावणी बयार सी तू झूमे सदा
पुरवईया भी देख के लजाती रहे।

यूं गुनगुनाना तेरा खनखनाती हंसी
सुर संगम भी सुन के मचलता रहे।

चांद सूरज सी तू हो सितारों जैसी
जिससे आंगन तेरा झिलमिलाता रहे।

जो है तेरी खुशी वही मेरी खुशी
तेरा जीवन मधुबन सा खिलता रहे।

हो निश्छल सा प्यार मिले ढेरों दुलार
आशीष तुझे देवों का मिलता रहे।

है तेरे लिये मेरी ये ही दुआ
मेरी बेटी जहां भी रहे तू सलामत रहे।

नजर न लगे किसी की तुझे
तुझ पर हमेशा खुदा की इनायत रहे।

हर चाहत हो पूरी सदा ही तेरी
दुआ सबके दिल से निकले तेरे लिये।
****
पूनम

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

नया जमाना

सभी पाठकों को दुर्गा अष्टमी एवं
दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं

सादर प्रणाम चरण स्पर्श का
शायद जमाना बीत गया
हाय हैलो और जमाना
यार का अब आ गया।

अम्मा बाबू जी कहने में
जो मिठास होती थी
मम्मा डैडी जैसे शब्दों
के बीच कहीं खो गया।

मां के हाथ की रोटियों का
स्वाद भी शायद भूल गया
मजबूरी में या वैसे भी
जमाना होटलों का हो गया।

घर के छप्पन व्यंजन भी
खिलाने में शर्म है लगती
अब तो पिज्जा बर्गर और
चिली चिकन का जमाना आ गया।

महाभारत रामायण जैसी
पौराणिक कथायें खो रही
अब तो कार्टून मिक बीन
पोगो का जमाना आ गया।

आजादी हमें कैसे मिली
अब भी बहुत लोग नहीं जानते
अब तो खुद ही आजाद
होने का जमाना आ गया।

बच्चों को समझाने की
कोशिश तो करके देखिये
शायद जवाब ऐसा ही मिले
जमाना आपका चला गया।

ताल में ताल मिला के
हम भी संग जमाने के चले
फ़र्क आया नजर बुराई वक्त में नहीं
सोचों में अन्तर आ गया।

अब दौर है नये जमाने का
तो आप भी ढल जाइये
मिल के संग इनके हम भी कहें
कि अब नया जमाना आ गया
००००
पूनम

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

गज़ल-जमीं से आसमा तक


आज हम छूने चले हैं आसमां को
पर सहारा तो जमीं का चाहिये।

लाख मोड़ लें रुख चाहे जिधर भी
पर अन्त में किनारा तो नदी को चाहिये।

चाहे कितने भी बड़े हो जायें हम फ़िर भी
लोरी सुनने के लिये इक गोद मां की चाहिये।

कुछ भी पाने के लिये सोच ऊंची है जरूरी
मिल जाये कितनी शोहरत मन न बढ़ना चाहिये।

हमें मिले जो संस्कार हैं बुजुर्गों की निशानी
गर पड़ें कमजोर तो सम्बल इन्हीं का चाहिये।

है बहुत आसान कीचड़ उछालना दूसरों पर
पर पहले खुद पे भी एक नजर डाल लेना चाहिये।
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पूनम

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

गीत---अजनबी शहर में


इस शहर में हम अजनबी हैं
जाने पहचाने से चेहरे हैं फ़िर भी
हर पल में लगता ये और ही कोई है।
इस शहर में-----------------।

बेमतलब यहां पे तो कुछ भी नहीं है
ऐसा हो शायद ही इन्सान कोई
यहां जो मतलबी नहीं है
इस शहर में-------------------।

है खून का रिश्ता जिससे भी जिसका
वक्त पड़ने पे देखा
बदल रक्त की रंगत ही गई है।
इस शहर में ----------------।

दुश्मनी होती नहीं किससे किसीकी
खुरच दे उसे जिल्द पुरानी समझ के
फ़िर चढ़ा दे कवर दोस्ती की नई सी।
इस शहर में ---------------------।

जाना पहचाना या हो वो बेगाना
पहले हम इन्सां हैं
फ़िर हम कोई हैं
इस शहर में -------------------।

कभी झांक कर देखो औरों के दिल में
उनमें जो है वो हमारे में भी
क्या लगता है फ़र्क थोड़ा भी कोई है
इस शहर में ---------------।

रंजो सितम से ये दुनिया भरी है
है जीना इसी में और मरना यहीं है
आपस में फ़िर क्यूं यूं ही ठनी है
इस शहर में ---------------।

शहर में ही जब अपने हम अजनबी हैं
तो दुनिया तो फ़िर भी बहुत ही बड़ी है
फ़िर भी हम क्यों अजनबी हैं।
इस शहर में ---------------।
00000000
पूनम



शनिवार, 5 सितंबर 2009

ख्वाब देखो जरूर-----


ख्वाब देखो तो जरूर पर इतना देखो
तुम्हारे पांवों को ढंक सके चादर इतना तो देखो।

अपने से ऊपर देखो तो जरूर पर इतना देखो
तुमसे नीचे भी कोई है इतना तो देखो।

एक चींटी भी कोशिश से चढ़ती है पहाड़ इतना देखो
कुछ पाने के लिये हिम्मत है जरूरी इतना तो देखो।

अच्छा बीज ही बनता बेहतर पौधा इतना देखो
अच्छे कर्मों से ही होता है बड़ा इन्सां इतना तो देखो।

यदि चाहत है तो उंचाई तक पहुंचोगे जरूर इतना तो देखो
पांव टिके हैं जमीं पर कितने इतना तो देखो।

एक माचिस की लौ भी दूर करती है अंधेरा इतना तो देखो
बन के देश के दीपक रौशनी दे सकते सबको इतना तो देखो।
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पूनम