बुधवार, 7 जनवरी 2009

रिहाई


नींद यूँ उडी ज्यों हवा हो गयी
जैसे पिंजरे से चिडिया रिहा हो गयी ।

चाहर दीवारी के अंदर हुई जो बात
आज हर जुबान-ए दास्ताँ बन गयी ।

होंठ जो खुले फ़िर बंद हो गये
आंख हर हाल -ए -दिल को बयाँ कर गयी ।

दुश्मनी का पैगाम जहाँ भेजते थे रोज़
आज वहीं दोस्ती अजीब बन गयी ।

नफरत की आग जब खत्म हुई दिल से
दूरियां भी आज करीब बन गईं ।

शब्द शब्द जोड़ कर लिखते थे कई
आज वो इक मोटी किताब बन गयी।
पूनम

5 टिप्‍पणियां:

sangeeta ने कहा…

bahut khoob dil ke jazbaat likh diye hain .badhai

रश्मि प्रभा ने कहा…

भावनाओं को कितनी सरलता से बताया है,
आम ज़िन्दगी को चितरी कर दिया....सुन्दर

मेनका ने कहा…

aapko bhi naye varsh ki bahut bahut badhaiyee aour meri subhkaamnaaye.
aapki blog bahut hi sunder aour bhav purn hai.

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बहुत अच्छी अभिव्यक्ति !

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

wah ji , kya baat kahi hai aapne , nafrat ki aag khatma hui to dooriyan bhi nazdikhiyan ban gayi hai ...

poori gazal ,bhavnao ka mishran hai ..

badhai ..


vijay
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