मंगलवार, 16 मार्च 2010

यकीन



तुम्हारे यकीं का इंतजार करते करते

अब थक चुकी हूं मैं

फ़िर भी तुम्हें आया नहीं यकीं

मुझ पर अब तक

उससे तुम नहीं

मेरा आत्म सम्मान टूटता है

और मैं तुम्हें यकीन दिला के

रहूंगी तब तलक

जब तलक सांस में सांस रहेगी।

अन्तिम सांस अंतिम क्षण तक

तुम्हारे इंतजार में जाने

मैंने कितने अफ़साने

अपने ऊपर लिख डाले

यहां तक कि अब

लिखते लिखते

जज्बात रूपी लफ़्जों की

स्याही भी खत्म होने को

चली है और अब तक

कागजों का इतना बड़ा पुलिंदा

बन चुका है जो कि

खुद ही घुट घुट कर

जल चुकी हुई आधी शमा को

पूरी तरह जलने में

तुम्हारा साथ देगी

और तब तुम्हें लगे

कि हां मैनें तुम्हारे

यकीन को हां में बदलने

में शायद

काफ़ी देर कर दी

पर फ़िर भी मुझे खुशी होगी

कि चलो कम से कम

तब तो तुम्हें यकीन आया

और ये सब किसी

और के लिये भी एक

सबक होगा।

0000

पूनम

40 टिप्‍पणियां:

dev ने कहा…

Bahut khoob.

Aap ki abhivyakti bahut saral or sshakt hai.

rashmi ravija ने कहा…

बहुत बढ़िया...सहज शब्दों में छुपे गहरे भाव...
सुन्दर अभिव्यक्ति

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

ये सब किसी और के लिये भी एक सबक होगा। ..गहरे भाव हैं इस में सुन्दर अभिव्यक्ति शुक्रिया

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत प्रेरक रचना है!

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

बढिया है।

राकेश कौशिक ने कहा…

इनती चाहत, समर्पण और
"ये सब किसी
और के लिये भी एक
सबक होगा।"
सब्र - अपने लिए फिर भी कुछ नहीं - आभार

sangeeta swarup ने कहा…

ये यकीं दिलाना भी कितना कठिन काम है ना....एक दर्द जो बयां करके भी बयां नहीं किया....बहुत खूब

राज भाटिय़ा ने कहा…

वाह....बहुत गहरे भाव लिये आप की कविता... इंतजार ओर इंतजार

Amitraghat ने कहा…

"सहज भावाभिव्यक्ति......."
प्रणव सक्सैना
amitraghat.blogspot.com

संजय भास्कर ने कहा…

वाह....बहुत गहरे भाव लिये आप की कविता... इंतजार ओर इंतजार

neha ने कहा…

sach hi hai....yakin dilana itna mushkil kyun hota hai..aksar..?

M VERMA ने कहा…

देर से आये पर दुरूस्त आये
सुन्दर

विजयप्रकाश ने कहा…

विरह क्या होता है, प्रतीक्षा की घुटन और निराशा की पराकाष्ठा सभी भावों को आपने इस कविता में सुंदरता से संजोया है.वाह...

मनोज कुमार ने कहा…

यहां अभिव्यक्ति की स्पषटता प्रमुख है।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत गहरी रचना...आनन्द आया.

शमीम ने कहा…

सबसे पहले आभार,
रचना बहुत अच्छी लगी.सरल भाषा में भावनाओं कि सुन्दर अभिव्यक्ति. शुभकामनायें.

knkayastha ने कहा…

अच्छा है... शिकायत करने का, उलाहना देने का और प्रेम प्रकट करने का तरीका बढ़िया है...
लेकिन जज्बात की स्याही कभी ख़त्म ना हो और हमें यह सब अलग-अलग रूपों में पढने को मिलता रहे...

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

एक बेहतरीन अभिव्यक्ति...सुंदर भाव से परिपूर्ण सुंदर कविता....धन्यवाद पूनम जी

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत खूब कहा है य़कीन दिलाना भी यकीनन बड़ा मुश्किल सा काम होता है

Arvind Mishra ने कहा…

जोरदार जज्बा और जज्बात -बनायें रखें इसे !

दिलीप कवठेकर ने कहा…

हम जब किसी की भावनात्मक अभिव्यक्ति से रू ब रू होते हैं, तो अपने जूतों से बाहर नहीं आ पाते, और उस एहसास को या तो दूर से ही छूने की कोशिश करते हैं, या अपने पूर्वग्रह या खुद के नज़रिये से उसे तौलते हैं.

यहां एक नारी की संवेदनायें , समर्पण , आशंकायें,विरह की घुटन, प्रतिक्षा की पीडा सभी इस एक कविता में परिलक्षित हो गयी.

एक पुरुष होने के कारण उतने अंतरंग की गहराई में नहीं जा पाया, मगर जब भी एक नारी के नज़रिये से जानने का प्रयास भर किया तो यह सब को अंशिक रूप से समझ पाया. वह इसलिये कि शायद हर पुरुष में कहीं एक नारी भी होती होगी.(& Vice versa)

BrijmohanShrivastava ने कहा…

क्या बात है यकीं का इन्तजार करते करते थक जाने पर भी तुम्हे यकीं न आया ,और यकीं दिलाती रहूँगी |यकीं शब्द की पुनराब्रत्ति (अलंकार )जज्वात रूपी शब्दों की स्याही (रूपक )
से सुसज्जित रचना ,बल्कि भावप्रधान रचना बहुत अच्छी लगी

रोली पाठक ने कहा…

सुन्दर-सरल, भावपूर्ण रचना...
किसी को यकीं दिलाना...किसी भी कीमत पर..
अपने जीवन के सारे शब्दों को ख़त्म करके भी..
पीड़ा,बेबसी अनेक भाव हैं कविता में....

Apanatva ने कहा…

bahut gahre samvedansheel bhav liye hai aapkee ye rachana .

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना प्रस्तुति ...

Mayur Malhar ने कहा…

बहुत अच्छी रचना हैं. बधाई
http://www.takeoneready.blogspot.com/

kumar zahid ने कहा…

eki aakriti ko uchhalte huye jo rekhankan hai oh kavita ka nichor hai...badhiya

अल्पना वर्मा ने कहा…

'लफ़्जों की स्याही भी खत्म होने को चली है'

कितने दर्द भरे अहसास हैं...यह कविता गहन भाव भरी है.
मन को छू गयी.
दिलिप जी और ब्रिज Sir ने इतने अच्छे से व्याख्या कर दी hai कविता और अधिक शस्क्त हो गयी.

देवेश प्रताप ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ......भाव पूर्ण रचना

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut saral sapat aur sunder abhivyakti.

kunwarji's ने कहा…

yakeen.....
ho jata hai ya krna pdta hai....?
hm aaj tak yahi nahi samajh paaye!

lekin aapki rachna bahoot achchhi lagi !

kunwar ji,

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut hi gahre bhav hai is rachna ke ,sundar abhivyakti.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

यकीं दिलाना कठिन तब और है जब सामने वाले का यकीं न हो ।

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

rachna bahut marmi hai..

lekin kya poonam ji yakin jb kisi ko na ho to use yakin jabardasti dilaya ja sakta hai ? shayed nahi...use dheel do...sochne do...waqt aane par khud-b-khud yakin aa jayega...warna jyada yakin dilane ka effect ulta b padta hai.

SR Bharti ने कहा…

Ati sunder,
sampoorn samerpan ki abhivyakti hai apki rachana
Badhai

manav vikash vigyan aur adytam ने कहा…

bahoot hee sundar

pragya ने कहा…

बहुत अच्छी पंक्तियाँ हैं..और इसका हम सभी को यकीन है..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

यकीन दिलाना बहुत ही कठिन है .... दिल के जज्बातों को अच्छे से पिरोया है ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (30-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

Rakesh Kumar ने कहा…

चर्चा मंच पर आपकी प्रस्तुति देख बहुत अच्छा लगा.

आखिर आपके कोशिश ने यकीन करा ही दिया.