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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

पुस्तक समीक्षा


मौत के चंगुल में

लेखक
प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
प्रकाशक:
नेशनल बुक ट्रस्ट ‘इंडिया’,नई दिल्ली

   आज भले ही हिन्दी बाल साहित्य में उपन्यास लेखन हाशिये पर है परंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद छ्ठें,सातवें और आठवें दशक में बाल पाकेट बुक्स के तहत सैकड़ों बाल उपन्यास प्रकाशित हुये थे।सुनहरे हंस,फ़ुटपाथ से महल तक,आलसीराम का सपना,पोपटमल,होटल का रहस्य,मंदिर में चोरी,बहादुर भालू,गधे की हजामत,हाइजैकिंग,चुटकुलानगर,सुरखाब के पर,चित्तौड़ की महारानी जैसे अनेक उपन्यास उस काल में प्रकाशित होकर नन्हें पाठकों के गले का कंठहार बने थे।उसी दौर में बच्चों की सुप्रसिद्ध पत्रिका‘पराग’ में---बहत्तर साल का बच्चा:आबिद सुरती,चींटीपुरम के भूरेलाल:मुद्राराक्षस,भागे हुये  डैडी:के0पी0सक्सेना,नागराजवासुकी की मणि:देवराज दिनेश तथा शाबास श्यामू:डा0श्रीप्रसाद आदि धारावाहिक उपन्यास प्रकाशित हुये थे।
    उसी दौर में प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव द्वारा लिखे गए बाल उपन्यास“मौत के चंगुल में”को आधुनिक साज-सज्जा के साथ प्रकाशित करके नेशनल बुक ट्रस्ट ने न केवल बाल पाठकों को एक अनोखा उपहार दिया है अपितु रहस्य रोमांच और ऐतिहासिक यात्राओं में रुचि रखने वाले आम पाठकों को नेहरू बाल पुस्तकालय योजना की एक अमूल्य निधि सौंपी है।
        विकलांग,अपाहिज,अंधे-बहरे,लूले,लंगड़े और बदसूरत बच्चों को केन्द्र में रखकर लिखे गये इस उपन्यास की कथावस्तु अद्भुत है। इसे मिस्टर वाटसन की सनक कहा जाय या अपाहिज बच्चों के प्रति उनका असीमित स्नेह कि ऐसे बच्चों के प्रति उसने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। अपाहिज बच्चों की खुशी में अपनी खुशियां तलाशने वाले मि0 वाटसन का परिचय उपन्यासकार ने इन पंक्तियों में दिया है:--‘जाड़े की ठिठुरती रात हो या आग की तरह तपते गर्मी के दिन,वह(वटसन) इन बच्चों के लिये दौड़ता ही रहता। उसका कमरा एक छोटा-मोटा अस्पताल नज़र आता था।रात में दो-दो,तीन-तीन बार उठकर वह इन बच्चों के कमरों के चक्कर लगाता।किसी भी बच्चे की मामूली कराह सुनकर वह बेचैन हो जाता। जब तक उसे मीठी नींद में सुला नहीं देता,वह अपने बिस्तर पर नहीं लौटता।‘—(पृष्ठ—7)
             ऐसे धुनी और लगन के पक्के वाटसन ने जब इन अपाहिज बच्चों को दुनिया की सैर कराने का बीड़ा उठाया तो उसका सहयोग करने के लिये कई संपन्न लोग आगे आ गये। दुनिया के सभी बड़े देशों की सरकारों ने भी इस पुण्य काम में सहयोग करने का आश्वासन दिया। जहाज कम्पनी के मालिक हक्सले ने आसानी से ‘एटलस’ जहाज का प्रबन्ध कर दिया।
         यात्रा वह भी कई दिनों की,कई देशों की----खट्टे-मीठे अनुभवों की-----इस यात्रा को लेकर उन अपाहिज बच्चों में जितना उत्साह और रोमांच था उससे कहीं ज्यादा उत्साहित थे मि0वाटसन ---आखिर यह यात्रा उनके जीवन की प्रस्थान बिन्दु थी।न्युयार्क बंदरगाह से आरंभ होकर जार्जटाउन,साउथैम्प्टन, जिब्राल्टर,पोर्टसईद,मुम्बई,सिडनी,शंघाई तथा याकोहामा होते हुये सैन्फ़्रान्सिसको तक की यह यात्रा मि0वाटसन की सोची समझी रणनीती का हिस्सा थी।इस यात्रा के आरंभ में ही उपन्यासकार ने वाटसन के हवाले से एक बड़ा संदेश दिया है जिसमें पूरे संसार को एक परिवार बताया गया है:---“हमें अपने मन की आंखों को इस दूरबीन की तरह ही बना लेना चाहिये ताकि दुनिया के मनुष्य हमें अपने एकदम करीब दिखाई दें। यह समूचा संसार एक बहुत बड़ा परिवार है न।”-----(पृष्ठ—28)
                 विकलांग बच्चों को लेकर ‘एटलस’ भारत के मुम्बई बंदरगाह पर आया तो सरकार की ओर से न केवल उन बच्चों का स्वागत किया गया,बल्कि भारत के विकलांग बच्चों का एक दल उसमें शामिल करके भारतीय बच्चों को भी दूसरे देशों की यात्रा का आनन्द उठाने का अवसर प्रदान किया गया। उपन्यासकार ने भारत दर्शन के बहाने प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थानों का उल्लेख करके आधुनिक भारत का एक जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है।
                 उपन्यासकार ने यात्रा के इसी क्रम में एक भारतीय सन्यासी का प्रवेश कराकर कथासूत्र को ऐसा मोड़ दिया है जिसमें न केवल भारत की परंपरा के दर्शन होते हैं अपितु ईश्वर के प्रति हमारी आस्था का रंग और गहरा हो जाता है। सन्यासी की भविष्यवाणी वाटसन को दी गयी एक सलाह है:--“तुम लोगों को रास्ते में एक भयानक संकट का सामना करना पड़ेगा।लेकिन भगवान को मत भूलना,वह सबकी रक्षा करेगा।’(पृष्ठ--36)
            उपन्यास के बीच में साहस और रोमांच के कई पड़ाव आए हैं जिसमें बंगाल के जंगल में एक भयंकर सांप द्वारा रोज़ी को लिपटाना तथा कमांडर जयकुमार मुखर्जी द्वारा सांप को मारकर रोज़ी को बचाना के महत्वपूर्ण घटना है। बदला लेने की नीयत से क्रोधी स्वभाव वाले शरारती जेम्स ने किटी को समुद्र में धकेल दिया था परंतु हवा और समुद्र की लहरों के  संयोग से वह जीवित बच गया। उपन्यासकार ने इस घटना का ताना-बाना इतने सलीके से बुना है कि यह घटना संयोग कम ईश्वरीय कृपा अधिक लगती है। घटना के बाद उदार किटी का जेम्स के प्रति व्यवहार सच्ची इंसानियत का एक जीता-जागता नमूना है:---“बोलो जेम्स—कहीं इस तरह की शरारत भी की जाती है कि किसी की जान ही चली जाए।मुझे समाप्त कर देने से तुम्हें क्या मिलता—तुम्हारे साथियों  में आज एक कम हो जाता।---------------------उसी दिन से जेम्स की सारी शरारतें छूट गयीं। वह दया और प्रेम का जीता-जागता पुतला बन गया।”---(पृष्ठ--49)
      आगे चलकर भारतीय सन्यासी की भविष्यवाणी सच हुयी और ‘एटलस’ भयंकर तूफ़ान में फ़ंस गया। जब ‘एटलस’ का संपर्क दुनिया के देशों से टूट गया तो उसे खोजने के लिये सिडनी बंदरगाह से ‘ग्लोब’ तथा हांगकांग से ‘एशिया’ नामक जहाज निकल पड़े।भारतीय जहाज ‘सन आफ़ इंडिया’ भी कैप्टन यशवन्त सिंह के नेतृत्व में ‘एटलस’ की खोज में निकल पड़ा।धीरे-धीरे तूफ़ान का रुख बदला परंतु ‘एटलस’ पर अभी भी संकट के बादल मंडरा रहे थे।काफ़ी जद्दोजहद के बाद ‘एटलस’की खोज में निकले तीनों जहाजों का ‘एटलस’ से संपर्क हो पाया।
   दरअसल ‘एटलस’ पर छाए खतरे के बादलों का प्रकोप सही अर्थों में चूहे बिल्ली का खेल था।स्थिति यहां तक पहुंच गयी कि समुद्र की तेज लहरों में फ़ंसा ‘एटलस’किसी भी समय डूब सकता था। संकट की इस घड़ी में कैप्टन यशवंत सिंह ने अपने साहस,लगन और धैर्य से सात सौ अपंग बच्चों को समुद्र की बेरहम लहरों से उबारा तेजी से डूब रहे। ‘एटलस’से बच्चों को बचाकर डेक के खुले हिस्से पर स्थानान्तरित कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में जिस तरह से बच्चे मौत के तांडव से बचे,उसे देखकर विलियम का ईश्वर के प्रति विश्वास और बढ़ गया:--“हमने मौत को पूरी तरह मात दे दी है। सच बात तो यह है कि इन बच्चों का शरीर गढ़ने में विधाता ने भले ही भूल की हो मगर इनका भाग्य लिखते समय वह बेहद खुश थे।“---(पृष्ठ--77)
                प्रस्तुत उपन्यास का समापन सुखांत है।दुनिया के सात सौ अपंग बच्चों की यह खट्टी-मीठी यात्रा उत्साह और उमंग का समन्वय है। इस यात्रा को जय कुमार मुखर्जी और यशवंत सिंह के साहस और विवेक से लिये गये निर्णय ने और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। उपन्यास का शीर्षक “मौत के चंगुल में” बड़ा ही उपयुक्त है।क्योंकि सामने खड़ी मौत की जिस त्रासदी को अपंग बच्चों ने झेला था वह अपने आप में दिल दहला देने वाली थी।यह ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है कि बच्चे इस त्रासदी से बाल-बाल बच गये।
         यह समाज की विडंबना है कि विकलांग बच्चों को प्रायः आदर की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। आम बच्चों से भी उनकी दूरी बनाकर रखी जाती है। उपन्यासकार ने अपाहिज और अनाथ बच्चों को केन्द्र में रखकर समाज की इस विडंबना को बदलने का प्रयास किया है। पूरे उपन्यास में जगह-जगह भाई-चारे जा अप्रत्यक्ष संदेश इस उपन्यास की एक और विशेषता है।
           उपन्यास की भाषा-शैली इतनी सरल और रोचक है कि पूरा उपन्यास एक ही बैठक में पढ़ा जा सकता है।बिखरे हुये कथासूत्र की तारतम्यता पाठकों का ध्यान बरबस अपनी ओर आकृष्ट करती है। मजे हुए चित्रकार पार्थसेन गुप्ता के बहुरंगी चित्रों का भी अपना आकर्षण है।मुखपृष्ठ तो साहस और चुनौती का पूरा जीता-जागता उदाहरण है।
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इस उपन्यास के समीक्षक डा0सुरेन्द्र विक्रम, क्रिश्चियन पोस्टग्रेजुएट कालेज लखनऊ में हिन्दी के एशोशिएट प्रोफ़ेसर एवंविभागाध्यक्ष हैं।आप प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार एवं बाल साहित्य आलोचक हैं।

मोबाइल--09450355390 
   

बुधवार, 8 जून 2011

“बया आज उदास है”---दृष्टि भी और संभावनायें भी

पुस्तक समीक्षा

समीक्ष्य पुस्तक---बया आज उदास है।(कविता संग्रह)

डा0 हेमन्त कुमार

प्रकाशक---अभिनव प्रकाशन,

52,शिव विहार,से0-आई

जानकीपुरम लखनऊ -226021

मूल्य—एक सौ पच्चीस रूपये।

“बया आज उदास है”---दृष्टि भी और संभावनायें भी

यद्यपि डा0 हेमन्त कुमार विगत तीन दशकों से हिन्दी साहित्य में अपनी सक्रियता निरंतर दर्ज कराये हुये हैं,पर अभी हाल में ही प्रकाशित अपनी पैंतालीस कविताओं के संग्रह ‘बया आज उदास है’ के माध्यम से उनके कवि रूप ने भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है। हेमन्त कुमार की इन कविताओं में मध्य वर्गीय दुनिया के दुःखों,कष्टों और संवेदनाओं के ऐसे जीते जागते चित्र हैं,जिनमें सामान्य जन की जिन्दगी अपनी सम्पूर्ण आस्थाओं,विश्वासों और मानवीय सम्बन्धों के साथ उभर कर सामने आई है। कवि ने इस जिन्दगी के बीच से पाई गयी अनुभूतियों,विचारों और सच्चाइयों की नींव पर एक ऐसे कविता संसार की रचना की है जो हमें मुग्ध भी करती है और झकझोरती भी है।

देश समाज और राजनीति में गिरते जीवन मूल्यों पर आज हर रचनाकार चिंतित नजर आता है। आतंकवाद की जड़ें दिन पर दिन गहरी होती जा रही हैं। ऐसे में इन सबके केन्द्र बिन्दु फ़ंसे छोटे बच्चों के बारे में बहुत ही कम सोचा और लिखा जा रहा है। इस दृष्टि से हेमन्त कुमार का यह कविता संग्रह कुछ और भी महत्वपूर्ण हो जाता है,क्योंकि इस संग्रह की करीब दस कविताओं के केन्द्र में देश के बच्चे ही हैं।

यह अनायास ही नहीं है। हेमन्त कुमार एक लम्बे समय से बाल साहित्य,बच्चों की शैक्षणिक फ़िल्मों और बाल कल्याण की अन्य गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़े हुये हैं। अभावग्रस्त बच्चों का एक चित्र ‘बाजू वाले प्लाट पर’ कविता में देखा जा सकता है—

झोपड़ी के एक कोने में है

उनका किचेन

दूसरा कोना बेडरूम/तीसरा ड्राइंग रूम

बाहर का मैदान है उनका ओपेन टायलेट

जहां वे हगते मूतते

और नाक छिनकते हैं।

** ** ** **

लम्बी लम्बी सड़कों पर भागता ट्रैफ़िक

गली के नुक्कड़ पर कूड़े का ढेर

शहर की ऊंची बिल्डिंगों का हुजूम

सिनेमा के बड़े बड़े पोस्टर

मल्लिका की देह,ऐश्वर्या के उभार

चाय की चुस्की,बीडी का सुट्टा यही सब है

इन बच्चों का ओपेन स्कूल।

इन कविताओं में जहां एक ओर बेहतर जीवन की तलाश के लिये निरन्तर संघर्ष कर रहे लोगों का निश्छल जन जीवन है,वहीं दूसरी ओर भारतीय लोक चेतना के प्रति अगाध चिन्तायें भी हैं। आज हिन्दी कविता की सबसे बड़ी जरूरत है कि वह भाषा के चोचलों और शिल्प के बखेड़ों से अलग हटकर लोक परम्पराओं,मुहावरों और देशज शब्दों के साथ एक आत्मीय नाता जोड़े। यह लोक और देश हेमन्त कुमार की इन कविताओं में अपनी पूरी पहचान के साथ उभरा है। वह ‘बेचारा बुधुआ’ भी हो सकता है जिसके चेहरे पर हर रोज एक नई झुर्री बढ़ जाती है--- अब धीरे धीरे बुधुआ के चेहरे पर

झुर्रियों का हुजूम

बढ़ता जा रहा है

और बुधुआ

इन झुर्रियों के हुजूम के बीच

अपने बुधुआपन की पहचान खोकर

पगले कुत्ते सा बौराया खड़ा है

पता नहीं भौंकने के लिये

या किसी को काटने के लिये।

इस लोक और देश को पूज्य पिता जी से किये गये चन्द सवालों में भी देखा जा सकता है।----- मैंने जब भी कोशिश की तुम्हारे चेहरे पर

घनी होती नागफ़नियों को

जड़ से काट देने की

तुम्हारे खुरदुरे और गट्ठे पड़े

हाथों को

हल की मुठिया पर से हटाकर

उनमें रामायण पकड़ाने की

तुमने पकड़ा दी मेरे हाथों में

एक लम्बी फ़ेहरिस्त

उन रिश्तेदारों के नामों की

जिनके यहां मुझे

बरही तेरही बियाह गौने में

न्योतहरी के लिये जाना है

मेरे पूज्य पिता

ऐसा तुमने क्यों किया।

इस संग्रह में एक गीत भी है।संग्रह में केवल एक ही गीत होने का कारण तो स्पष्ट नहीं है, पर यह जरूर है कि यह गीत हमें हिन्दी काव्य में गीतों की एक समृद्ध परम्परा की याद दिलाता है। लयात्मक अभिव्यक्ति और विशिष्ट प्रतीक विधानों के कारण इस गीत को चाव से पढ़ने और गुनगुनाने का मन करता है--- माझी तू गीत छेड़,आज एक ऐसा

नदियों के सूने तट,गूंज उठें फ़िर से

पनघट पर छाया,ये सूनापन कैसा

विरहन की आंखों में सपनों के जैसा।

वे आगे लिखते हैं----- चुप हुई आज क्यों पायल की रुन झुन

पत्तों के बीच छिपे सुग्गों की सुनगुन

चौरे की नीम तले कैसी ये सिहरन

चौपालों में आज नहीं कोई है धड़कन। दृष्टि और सम्भावनाओं से भरी पूरी ये कवितायें आज की सम्पूर्ण लोक चेतना,खण्डित होते सपनों और आदमीपन की तलाश के साथ साथ इस बात का भी सबूत हैं कि लोक और आंचल से जुड़ा साहित्य ही पाठक को साथ लेकर चल सकता है।इन कविताओं को गम्भीरता से लिये जाने का एक कारण और भी है कि हेमन्त कुमार के पास ग्राम्य पीड़ा को समझने की भरपूर क्षमतायें हैं,संवेदना को ठीक से पहचान सकने वाली खुली खुली आंखें हैं और साथ में कविता के व्याकरण का एक मजबूत आधार भी है। सही मायनों में इन कविताओं को पढ़ना एक आत्मीय रिश्ते जैसी गर्माहट को महसूस करने जैसा है। ===

समीक्षक--- कौशल पाण्डेय हिन्दी अधिकारी
आकाशवाणी,पुणे(महाराष्ट्र)
मोबाईल न0:०९८२३१९८११६

रविवार, 13 जून 2010

कहानी तोते राजा की : मनोरंजन भी और सन्देश भी

नई किताब

शीर्षक : कहानी तोते राजा की(पांच बाल रंग नाटक)
नाटककार:
हेमन्त कुमार
प्रकाशक : काव्य प्रकाशन रेवती कुंज ,हापुड़ –245101
फ़ोन(मो—09368461660
पृष्ठ संख्या: 146 मूल्य:दो सौ रूपये।
स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही अभिभावकों को यह चिन्ता सताने लगती है कि आखिर बच्चे इन छुट्टियों में क्या करें। मनोरंजन के तमाम साधन खोजे जाने लगते हैं,पर आज के इस प्रतिस्पर्धात्मक समय में केवल मनोरंजन ही काफ़ी नहीं है। आउटडोर खेलों की सुविधा भी हर जगह नहीं मिल पाती है। पढ़ाई से ऊबे हुये बच्चों को दरअसल एक ऐसा माध्यम चाहिये जो मनोरंजक भी हो और शिक्षाप्रद भी।
नाटक एवं रंगमंच एक ऐसा ही माध्यम है,जिसके द्वारा जटिल से जटिल बात भी बच्चों को आसानी से समझाई जा सकती है।दृश्य एवं श्रव्य---दोनों ही माध्यमों से जुड़ा होने के कारण बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में नाटकों की भूमिका अत्यन्त ही महत्वपूर्ण होती है। नाटकों का जो असर बच्चों पर पड़ता है, वह स्थाई होता है। इस सन्दर्भ में हम महात्मा गांधी का उदाहरण ले सकते हैं। बचपन में ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ नाटक को देखने के बाद उनके मन पर सच बोलने का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने आजीवन सत्यव्रत का पालन किया।
बच्चों के रंगमंच के साथ जुड़ी कुछ दिक्कतों में से एक दिक्कत यह भी है कि अच्छे नाट्य आलेख होते हुये भी,प्रचार-प्रसार के अभाव में उनकी जानकारी बच्चों तक नहीं पहुंच पाती है। बच्चों के अभिभावक तथा शिक्षक भी इस ओर प्रायः कम ही जागरूक रहते हैं।
इन गर्मी की छुट्टियों में नाटक में रुचि रखने वाले बच्चे और संस्थायें हाल ही में प्रकाशित हेमन्त कुमार के बाल रग नाटकों के संग्रह ‘कहानी तोते राजा की’ के नाटकों का उपयोग अपनी रंगमंचीय रुचियों को साकार करने के लिये कर सकते हैं। ये नाटक मुख्यतः मंचीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही लिखे गये।
इस संग्रह में कुल पांच बाल नाटक हैं। लम्बे बाल नाटक ‘कहानी तोते राजा की’ के माध्यम से उन तामाम समस्याओं पर करारा व्यंग्य किया गया है,जो आज हमारे बच्चों की शिक्षा व्यवस्था के सामने सवालिया निशान बनकर खड़ी हैं। इस नाटक के माध्यम से आजादी के बाद शैक्षिक सुधारों के नाम पर चलाये गये तमाम अभियानों की न केवल निरर्थकता नजर आती है,बल्कि इन अभियानों के नाम पर मिलने वाला धन अंततः किन जेबों में जाता है,उनकी ओर भी इशारा किया गया है। इस बंदर बांट के बीच ठगे से रह जाते हैं केवल बच्चे। नाटक के अंत में जब बच्चे आकर कहते हैं कि यह तो एक झलक भर है,असली कहानी तो तब पूरी होगी जब हमें हमारे अधिकार मिलेंगे,हमारे बस्ते हल्के होंगे,हमारे स्कूल बदलेंगे और जब हम एक साथ पढ़ेंगे लिखेंगे। तो लगता है कि आज के बच्चे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और सजग हैं। यही इस नाटक की सार्थकता है। आज जब कि ‘शिक्षा का अधिकार’ अधिनियम देश में लागू हो चुका है,ऐसे में शैक्षिक वातावरण बदले बिना यह कितना कारगर होगा,इसका अनुमान इस नाटक से लगाया जा सकता है।
इस संग्रह का दूसरा नाटक ‘पोलमपुर का उल्टा पुल्टा’ भी पहले जैसा व्यंग्य आधारित बाल नाटक है। जिसमें महारानी पोम्पाबाई के उल्टे पुल्टे फ़रमानों के कारण पैदा हुयी अव्यवस्था को बहुत ही प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
अगले तीन नाटक अपेक्षाकृत छोते नाटक हैं। ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ जंगल की न्याय व्यवस्था पर केन्द्रित है,जिसमें जंगल की व्यवस्था को न मानने वाले धूर्त भेड़िये को कोड़ों की सजा दी जाती है। नाटक ‘मछुआ और काना बैल’ त्ब्बत की एक लोक कथा पर आधारित है। इसमें पर्यावरण तथा जल और जीवों के संरक्षण को रेखांकित किया गया है। अंतिम नाटक ‘गुरू घंटाल चेला चंडाल’ गावों में अशिक्षा, अज्ञानता तथा अंधविश्वास के चलते होने वाली दिक्कतों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है। इसमें इन बातों को दिखाया गया है कि अशिक्षा और अज्ञानता ही हमारी प्रगति और विकास की राह की सबसे बड़ी बाधायें हैं।
इन नाटकों की सबसे खास बात यह है कि इन्हें बहुत ही आसानी से मंचित किया जा सकता है। इनके लिये कोई भव्य सेट तथा विशेष मंच सामग्री की जरूरत नहीं है। संवाद प्रायः छोटे छोटे हैं और कई जगह काव्यात्मक भी हैं। जिन्हें आसानी से याद किया जा सकता है। नट - नटी या फ़िर सूत्रधार के माध्यम से नाटक की कथावस्तु कविताओं के द्वारा प्रस्तुत की गयी है,जो नाटक मे रोचकता पैदा करती है। और कहीं कहीं गम्भीर संदेश भी देती है-----
आप सभी विद्वान जनों से
मेरे भी हैं चंद सवाल।
आजादी को बीत चुके हैं
अब तो पूरे तिरसठ साल ॥
इर क्यों लुट जाती है नारी
बीच सड़क पर देश में आज।
थोड़े से पैसों के पीछे
जल जाती क्यों नारी आज॥
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बेटा हो तो बजें नगाड़े
बेटी क्यों मनहूस है आज।
अखबारों की हर सुर्खी में
सिसक रही क्यों लड़की आज॥
अच्छी साज-सज्जा वाली इस पुस्तक के सभी बाल नाटक मंचन योग्य तो हैं ही,साथ ही पठनीय भी कम नहीं हैं।
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कौशल पाण्डेय
हिन्दी अधिकारी
आकाशवाणी ,पुणे ।
मोबाइल न0-:09823198116

पूनम द्वारा प्रकाशित