शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013
पुस्तक समीक्षा
बुधवार, 8 जून 2011
“बया आज उदास है”---दृष्टि भी और संभावनायें भी
समीक्ष्य पुस्तक---बया आज उदास है।(कविता संग्रह)
डा0 हेमन्त कुमार
प्रकाशक---अभिनव प्रकाशन,
52,शिव विहार,से0-आई
जानकीपुरम लखनऊ -226021
मूल्य—एक सौ पच्चीस रूपये।
“बया आज उदास है”---दृष्टि भी और संभावनायें भी
यद्यपि डा0 हेमन्त कुमार विगत तीन दशकों से हिन्दी साहित्य में अपनी सक्रियता निरंतर दर्ज कराये हुये हैं,पर अभी हाल में ही प्रकाशित अपनी पैंतालीस कविताओं के संग्रह ‘बया आज उदास है’ के माध्यम से उनके कवि रूप ने भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है। हेमन्त कुमार की इन कविताओं में मध्य वर्गीय दुनिया के दुःखों,कष्टों और संवेदनाओं के ऐसे जीते जागते चित्र हैं,जिनमें सामान्य जन की जिन्दगी अपनी सम्पूर्ण आस्थाओं,विश्वासों और मानवीय सम्बन्धों के साथ उभर कर सामने आई है। कवि ने इस जिन्दगी के बीच से पाई गयी अनुभूतियों,विचारों और सच्चाइयों की नींव पर एक ऐसे कविता संसार की रचना की है जो हमें मुग्ध भी करती है और झकझोरती भी है।
देश समाज और राजनीति में गिरते जीवन मूल्यों पर आज हर रचनाकार चिंतित नजर आता है। आतंकवाद की जड़ें दिन पर दिन गहरी होती जा रही हैं। ऐसे में इन सबके केन्द्र बिन्दु फ़ंसे छोटे बच्चों के बारे में बहुत ही कम सोचा और लिखा जा रहा है। इस दृष्टि से हेमन्त कुमार का यह कविता संग्रह कुछ और भी महत्वपूर्ण हो जाता है,क्योंकि इस संग्रह की करीब दस कविताओं के केन्द्र में देश के बच्चे ही हैं।
यह अनायास ही नहीं है। हेमन्त कुमार एक लम्बे समय से बाल साहित्य,बच्चों की शैक्षणिक फ़िल्मों और बाल कल्याण की अन्य गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़े हुये हैं। अभावग्रस्त बच्चों का एक चित्र ‘बाजू वाले प्लाट पर’ कविता में देखा जा सकता है—
उनका किचेन
दूसरा कोना बेडरूम/तीसरा ड्राइंग रूम
बाहर का मैदान है उनका ओपेन टायलेट
जहां वे हगते मूतते
और नाक छिनकते हैं।
** ** ** **
लम्बी लम्बी सड़कों पर भागता ट्रैफ़िक
गली के नुक्कड़ पर कूड़े का ढेर
शहर की ऊंची बिल्डिंगों का हुजूम
सिनेमा के बड़े बड़े पोस्टर
मल्लिका की देह,ऐश्वर्या के उभार
चाय की चुस्की,बीडी का सुट्टा यही सब है
इन बच्चों का ओपेन स्कूल।
इन कविताओं में जहां एक ओर बेहतर जीवन की तलाश के लिये निरन्तर संघर्ष कर रहे लोगों का निश्छल जन जीवन है,वहीं दूसरी ओर भारतीय लोक चेतना के प्रति अगाध चिन्तायें भी हैं। आज हिन्दी कविता की सबसे बड़ी जरूरत है कि वह भाषा के चोचलों और शिल्प के बखेड़ों से अलग हटकर लोक परम्पराओं,मुहावरों और देशज शब्दों के साथ एक आत्मीय नाता जोड़े। यह लोक और देश हेमन्त कुमार की इन कविताओं में अपनी पूरी पहचान के साथ उभरा है। वह ‘बेचारा बुधुआ’ भी हो सकता है जिसके चेहरे पर हर रोज एक नई झुर्री बढ़ जाती है--- अब धीरे धीरे बुधुआ के चेहरे पर
झुर्रियों का हुजूम
बढ़ता जा रहा है
और बुधुआ
इन झुर्रियों के हुजूम के बीच
अपने बुधुआपन की पहचान खोकर
पगले कुत्ते सा बौराया खड़ा है
पता नहीं भौंकने के लिये
या किसी को काटने के लिये।
इस लोक और देश को पूज्य पिता जी से किये गये चन्द सवालों में भी देखा जा सकता है।----- मैंने जब भी कोशिश की तुम्हारे चेहरे पर
घनी होती नागफ़नियों को
जड़ से काट देने की
तुम्हारे खुरदुरे और गट्ठे पड़े
हाथों को
हल की मुठिया पर से हटाकर
उनमें रामायण पकड़ाने की
तुमने पकड़ा दी मेरे हाथों में
एक लम्बी फ़ेहरिस्त
उन रिश्तेदारों के नामों की
जिनके यहां मुझे
बरही तेरही बियाह गौने में
न्योतहरी के लिये जाना है
मेरे पूज्य पिता
ऐसा तुमने क्यों किया।
इस संग्रह में एक गीत भी है।संग्रह में केवल एक ही गीत होने का कारण तो स्पष्ट नहीं है, पर यह जरूर है कि यह गीत हमें हिन्दी काव्य में गीतों की एक समृद्ध परम्परा की याद दिलाता है। लयात्मक अभिव्यक्ति और विशिष्ट प्रतीक विधानों के कारण इस गीत को चाव से पढ़ने और गुनगुनाने का मन करता है--- माझी तू गीत छेड़,आज एक ऐसा
नदियों के सूने तट,गूंज उठें फ़िर से
पनघट पर छाया,ये सूनापन कैसा
विरहन की आंखों में सपनों के जैसा।
वे आगे लिखते हैं----- चुप हुई आज क्यों पायल की रुन झुन
पत्तों के बीच छिपे सुग्गों की सुनगुन
चौरे की नीम तले कैसी ये सिहरन
चौपालों में आज नहीं कोई है धड़कन। दृष्टि और सम्भावनाओं से भरी पूरी ये कवितायें आज की सम्पूर्ण लोक चेतना,खण्डित होते सपनों और आदमीपन की तलाश के साथ साथ इस बात का भी सबूत हैं कि लोक और आंचल से जुड़ा साहित्य ही पाठक को साथ लेकर चल सकता है।इन कविताओं को गम्भीरता से लिये जाने का एक कारण और भी है कि हेमन्त कुमार के पास ग्राम्य पीड़ा को समझने की भरपूर क्षमतायें हैं,संवेदना को ठीक से पहचान सकने वाली खुली खुली आंखें हैं और साथ में कविता के व्याकरण का एक मजबूत आधार भी है। सही मायनों में इन कविताओं को पढ़ना एक आत्मीय रिश्ते जैसी गर्माहट को महसूस करने जैसा है। ===
समीक्षक--- कौशल पाण्डेय हिन्दी अधिकारी
रविवार, 13 जून 2010
कहानी तोते राजा की : मनोरंजन भी और सन्देश भी

नाटककार: हेमन्त कुमार
प्रकाशक : काव्य प्रकाशन रेवती कुंज ,हापुड़ –245101
फ़ोन(मो—09368461660
पृष्ठ संख्या: 146 मूल्य:दो सौ रूपये।
नाटक एवं रंगमंच एक ऐसा ही माध्यम है,जिसके द्वारा जटिल से जटिल बात भी बच्चों को आसानी से समझाई जा सकती है।दृश्य एवं श्रव्य---दोनों ही माध्यमों से जुड़ा होने के कारण बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में नाटकों की भूमिका अत्यन्त ही महत्वपूर्ण होती है। नाटकों का जो असर बच्चों पर पड़ता है, वह स्थाई होता है। इस सन्दर्भ में हम महात्मा गांधी का उदाहरण ले सकते हैं। बचपन में ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ नाटक को देखने के बाद उनके मन पर सच बोलने का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने आजीवन सत्यव्रत का पालन किया।
बच्चों के रंगमंच के साथ जुड़ी कुछ दिक्कतों में से एक दिक्कत यह भी है कि अच्छे नाट्य आलेख होते हुये भी,प्रचार-प्रसार के अभाव में उनकी जानकारी बच्चों तक नहीं पहुंच पाती है। बच्चों के अभिभावक तथा शिक्षक भी इस ओर प्रायः कम ही जागरूक रहते हैं।
इन गर्मी की छुट्टियों में नाटक में रुचि रखने वाले बच्चे और संस्थायें हाल ही में प्रकाशित हेमन्त कुमार के बाल रग नाटकों के संग्रह ‘कहानी तोते राजा की’ के नाटकों का उपयोग अपनी रंगमंचीय रुचियों को साकार करने के लिये कर सकते हैं। ये नाटक मुख्यतः मंचीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही लिखे गये।
इस संग्रह में कुल पांच बाल नाटक हैं। लम्बे बाल नाटक ‘कहानी तोते राजा की’ के माध्यम से उन तामाम समस्याओं पर करारा व्यंग्य किया गया है,जो आज हमारे बच्चों की शिक्षा व्यवस्था के सामने सवालिया निशान बनकर खड़ी हैं। इस नाटक के माध्यम से आजादी के बाद शैक्षिक सुधारों के नाम पर चलाये गये तमाम अभियानों की न केवल निरर्थकता नजर आती है,बल्कि इन अभियानों के नाम पर मिलने वाला धन अंततः किन जेबों में जाता है,उनकी ओर भी इशारा किया गया है। इस बंदर बांट के बीच ठगे से रह जाते हैं केवल बच्चे। नाटक के अंत में जब बच्चे आकर कहते हैं कि यह तो एक झलक भर है,असली कहानी तो तब पूरी होगी जब हमें हमारे अधिकार मिलेंगे,हमारे बस्ते हल्के होंगे,हमारे स्कूल बदलेंगे और जब हम एक साथ पढ़ेंगे लिखेंगे। तो लगता है कि आज के बच्चे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और सजग हैं। यही इस नाटक की सार्थकता है। आज जब कि ‘शिक्षा का अधिकार’ अधिनियम देश में लागू हो चुका है,ऐसे में शैक्षिक वातावरण बदले बिना यह कितना कारगर होगा,इसका अनुमान इस नाटक से लगाया जा सकता है।
इस संग्रह का दूसरा नाटक ‘पोलमपुर का उल्टा पुल्टा’ भी पहले जैसा व्यंग्य आधारित बाल नाटक है। जिसमें महारानी पोम्पाबाई के उल्टे पुल्टे फ़रमानों के कारण पैदा हुयी अव्यवस्था को बहुत ही प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
अगले तीन नाटक अपेक्षाकृत छोते नाटक हैं। ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ जंगल की न्याय व्यवस्था पर केन्द्रित है,जिसमें जंगल की व्यवस्था को न मानने वाले धूर्त भेड़िये को कोड़ों की सजा दी जाती है। नाटक ‘मछुआ और काना बैल’ त्ब्बत की एक लोक कथा पर आधारित है। इसमें पर्यावरण तथा जल और जीवों के संरक्षण को रेखांकित किया गया है। अंतिम नाटक ‘गुरू घंटाल चेला चंडाल’ गावों में अशिक्षा, अज्ञानता तथा अंधविश्वास के चलते होने वाली दिक्कतों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है। इसमें इन बातों को दिखाया गया है कि अशिक्षा और अज्ञानता ही हमारी प्रगति और विकास की राह की सबसे बड़ी बाधायें हैं।
इन नाटकों की सबसे खास बात यह है कि इन्हें बहुत ही आसानी से मंचित किया जा सकता है। इनके लिये कोई भव्य सेट तथा विशेष मंच सामग्री की जरूरत नहीं है। संवाद प्रायः छोटे छोटे हैं और कई जगह काव्यात्मक भी हैं। जिन्हें आसानी से याद किया जा सकता है। नट - नटी या फ़िर सूत्रधार के माध्यम से नाटक की कथावस्तु कविताओं के द्वारा प्रस्तुत की गयी है,जो नाटक मे रोचकता पैदा करती है। और कहीं कहीं गम्भीर संदेश भी देती है-----आप सभी विद्वान जनों से
मेरे भी हैं चंद सवाल।
आजादी को बीत चुके हैं
अब तो पूरे तिरसठ साल ॥
इर क्यों लुट जाती है नारी
बीच सड़क पर देश में आज।
थोड़े से पैसों के पीछे
जल जाती क्यों नारी आज॥
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बेटा हो तो बजें नगाड़े
बेटी क्यों मनहूस है आज।
अखबारों की हर सुर्खी में
सिसक रही क्यों लड़की आज॥अच्छी साज-सज्जा वाली इस पुस्तक के सभी बाल नाटक मंचन योग्य तो हैं ही,साथ ही पठनीय भी कम नहीं हैं।
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कौशल पाण्डेयहिन्दी अधिकारी
आकाशवाणी ,पुणे ।
मोबाइल न0-:09823198116
पूनम द्वारा प्रकाशित
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