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सोमवार, 2 मई 2011

सर्प – दंश


सच्चाई की झलक भी न हो जिसमें

मुझपे ऐसी तोहमत तो लगाया न करो।

सामने आती है सच्चाई थोड़ी देर से ही

पर सच को झूठ का आईना तो दिखाया न करो।

मैंने चाहा है सराहा है भरोसा भी किया तुम्हीं पर

मेरी चाहत पे यूं इल्जाम तो लगाया न करो।

शक वो मर्ज है जिसकी तो कोई दवा ही नहीं

गैर की बातों में आकर यूं तो बहका न करो।

हक है तुम्हें दिल की बात मुझसे तो कहो

पर सर्प सा दंश दे देकर मुझे यूं घायल तो न करो।

जलती हूं मोम की लौ की तरह गल गल कर

यूं शब्दों के तीर हर पल तो चलाया न करो।

वफ़ा तो वफ़ा से ही होती है बेवफ़ाई से नहीं

फ़िर मेरी मुहब्बत को यूं रुसवा तो सरे आम न करो।

मेरा दर्पण मेरा शृंगार मेरा जीवन हो तुम्हीं तुम

यूं मुझे ना समझ पाने की तो नासमझी न करो।

वो भी वक्त आएगा जब हकीकत से रूबरू होगे तुम

पर वक्त निकल जाये तो फ़िर पछताया न करो।

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पूनम