
सच्चाई की झलक भी न हो जिसमें
मुझपे ऐसी तोहमत तो लगाया न करो।
सामने आती है सच्चाई थोड़ी देर से ही
पर सच को झूठ का आईना तो दिखाया न करो।
मैंने चाहा है सराहा है भरोसा भी किया तुम्हीं पर
मेरी चाहत पे यूं इल्जाम तो लगाया न करो।
शक वो मर्ज है जिसकी तो कोई दवा ही नहीं
गैर की बातों में आकर यूं तो बहका न करो।
हक है तुम्हें दिल की बात मुझसे तो कहो
पर सर्प सा दंश दे देकर मुझे यूं घायल तो न करो।
जलती हूं मोम की लौ की तरह गल गल कर
यूं शब्दों के तीर हर पल तो चलाया न करो।
वफ़ा तो वफ़ा से ही होती है बेवफ़ाई से नहीं
फ़िर मेरी मुहब्बत को यूं रुसवा तो सरे आम न करो।
मेरा दर्पण मेरा शृंगार मेरा जीवन हो तुम्हीं तुम
यूं मुझे ना समझ पाने की तो नासमझी न करो।
वो भी वक्त आएगा जब हकीकत से रूबरू होगे तुम
पर वक्त निकल जाये तो फ़िर पछताया न करो।
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पूनम