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शनिवार, 6 मार्च 2010

संग छोड़ चले हम हिन्दी का


हालांकि यह विषय ऐसा नहीं है जिस पर गौर ना फ़रमाया गया हो। या पहले कभी इस विषय पर बात न हुयी हो। पर सोचने और लिखने का सबका अपना अपना नजरिया व अन्दाज होता है। हमारा ही यह देश है जिसमें हमें खुलकर कहने व लिखने की स्वतंत्रता है---हर सच्चाई और हर यथार्थ के लिये।

यहां एक अरब से ज्यादा की आबादी में विभिन्न भाषाओं और जाति धर्म के लोग भी मिल जुल कर रहते हैं। सबको अपनी अपनी भाषा में खुद को अभिव्यक्त करने की स्वतन्त्रता है। तो फ़िर बात आकर हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम के बीच में क्यों त्रिशंकु की तरह लटक जाती है? फ़िर वही चर्चाये आम होकर सब को खास लगती है। वैसे बात हम अंग्रेजी व हिन्दी भाषा की कर रहे हैं तो उसी पर आते हैं। हम सोचने पर मजबूर हो गये हैं कि क्या हम हिन्दी को खुद ही अपने से दूर नहीं कर रहे हैं। कहीं दूर न जाकर अपने को ही लेती हूं----।

हमारे जैसे हजारों परिवार ऐसे हैं जो बच्चे के जन्म के साथ ही उसे लेकर भविष्य का ताना बाना बुनने लगते हैं। वह बड़ा होकर क्या बनेगा-----हम उसे क्या बनायेंगे----किस माध्यम से पढ़ायेंगे? इत्यादि।

उस समय हम यह नहीं सोचते कि बच्चा जब बड़ा हो जायेगा तो उसे भी कुछ स्वाधिकार देने होंगे। जिससे वह अपने नजरिये से अपने आप को व दुनिया को देखे व समझे।

लेकिन नहीं जैसे ही बच्चा थोड़ा बड़ा होता है हम उसे मां पिता की जगह माम डैड का पाठ पढ़ाना शुरू कर देते हैं। बच्चा अभी तक शू शु का मतलब शायद समझ न पाया हो पर हम उससे टायलेट और पोटी की बातें करते हैं। क्योंकि आज के समय सबके सामने हिन्दी की आम भाषा बोलने में हमे खुद जो शरम आती है।

तो कहने का मतलब यहां पर यही है कि बच्चे को हम स्वयं ही शुरू से हिन्दी भाषा से दूर करने लगते हैं। अगर उसने किसी के प्रश्न का उत्तर अंग्रेजी में नहीं दिया तो हमे लगता है कि हमारे मुंह पर किसी ने थप्पड़ मार दिया हो। अपने आप को हम अपमानित महसूस करते हैं।

स्कूल भेजने के पहले हम उसे क ख ग से बाद में परिचित करवाते हैं। पहले ए बी सी डी और अंग्रेजी की पोएम्स सिखाने का अभ्यास करवाते हैं ।ताकि उसका एक अच्छे व बड़े नाम वाले अंग्रेजी स्कूल में दाखिला हो जाये।बच्चा हिन्दी बोलना भले ही न सीख पाये पर अंग्रेजी में हम उसे पारंगत बना देते हैं। अगर कहीं गलती से टीचर ने अंग्रेजी के बजाय हिन्दी में रंगों के नाम पूछ लिया तो बहुत हद तक संभव है कि बच्चे के साथ हम भी एक बार रंगों के नाम सोचने पर मजबूर हो जायं। तब हमें यह अफ़सोस भी होगा कि हमने तो अपने बच्चे को अंग्रेजी के चक्कर में हिन्दी नाम तो बताया ही नहीं ---यह सोचकर कि ये सब तो बच्चा बाद में आसानी से सीख लेगा।

फ़िर कहीं बच्चे का एडमिशन आपके चाहने के अनुसार उस स्कूल में नहीं हुआ तो फ़िर तो संभव है कि बच्चे की शामत ही आ जाय। और फ़िर हम यूं मायूस हो जाते हैं कि उस स्कूल में अगर एडमिशन नहीं हुआ तो जैसे बहुत बड़ा खजाना आपके हाथ से निकल गया हो। हालांकि ज्यादातर मां बाप इस मामले में अपनी भी गलती मानते हैं। हर जगह ही लोग बच्चे पर अपना गुस्सा उतारे ये समझदारी मां बाप पर आधारित होती है।

कालेज में आने पर वही बच्चे के भविष्य का सबसे बड़ा चुनाव केन्द्र होता है। उसको खुद का आत्मविश्वास और उसकी मेहनत चाहे वह हिन्दी मीडियम में पढ़ा हो अंग्रेजी माध्यम से।

अगर हम अंग्रेजी को एक विषय के रूप में रखकर बाकी सारे विषयों को हिन्दी में पढ़ायें बजाय हिन्दी को एक आम विषय समझ कर बाकी सभी विषयों को अंग्रेजी भाषा में पढ़ायें तो शायद हमारी हिन्दी भाषा फ़िर धीरे धीरे हमारी अपनी होती जायेगी।

हम यह नहीं कहते कि अंग्रेजी पढना गलत है,बिल्कुल गलत नहीं है क्योंकि आज का जो समय बदल गया है उससे ज्यादातर देशों में अंग्रेजी का बोलबाला है। और हिन्दी का कम्। क्योंकि हमारा भारत देश ही एक ऐसा देश है जहां हर भाषा जाति, धर्म ,सम्प्रदाय के लोग रहते हैं। और जिन्हें अपनी अपनी भाषा बोलने की पूर्ण स्वतन्त्रता है।

ऐसे में भी यदि कोई हिन्दी भाषी बाहर नौकरी के लिये जाना चाहता है तो उसे थोड़ी हिचकिचाहट महसूस होती है क्योंकि ज्यादातर राज्यों में अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होने से काफ़ी सहूलियत होती है। क्योंकि महाराष्ट्र,आंध्र प्रदेश आदि जैसे कई ऐसे प्रदेश हैं जहां आप अगर जरा भी अंग्रेजी जानते हैं तो आपकी परेशानी थोड़ी कम होगी । औरों की भाषा को न समझ कर अपनी बात को अंग्रेजी के टूटे फ़ूटे शब्दों में भी समझ सकते हैं।

समय परिस्थितियां और बदलाव आज के युग की सबसे बड़ी जरूरत है। जिसके अनुसार हमें कहीं न कहीं समझौता करना पड़ता है और दूसरों को भी।

लेकिन हम अगर अंग्रेजी के साथ साथ अपनी हिन्दी भाषा को भी साथ लेकर चलें तो ज्यादा बेहतर होगा। ऐसा नहीं कि हिन्दी बोलकर हम या आप अपमानित होंगे। बल्कि इससे और भी भाषाओं का ज्ञान बढ़ेगा हिन्दी के साथ साथ।

तो क्यों न हम सब मिलकर आगे बढ़ें और अपने राज्य को गले लगाते हुये दूसरी भाषा से भी उतना ही प्यार करें। पर अपनी हिन्दी भाषा का बहिष्कार करके नहीं। अपितु बड़े गर्व के साथ कहें कि हां हम हिन्दी भाषी हैं। और अपनी भाषा कहीं भी हम बोलने को स्वतन्त्र हैं।

जो राज्य भाषा हमारी मातृ भाषा भी हो तो हम अपनी मां को अपमानित कैसे कर सकते हैं? उनके साथ नाइंसाफ़ी को हम कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? जैसे हमारी मां कभी हमें नहीं सिखाती कि फ़लां आदमी बुरा है तो उसका साथ छोड़ दें------बल्कि यह कहती हैं कि अगर तुम उसकी सच्ची दोस्त हो तो उसकी बुराइयों को मत देखो । उसे दूर करने की कोशिश करो। उसकी अच्छाइयों को दिल से अपनाओ।

वैसे ही हमारा भी मानना है कि हर भाषा का अपना मान सम्मान है। सभी अपनी अपनी जगह पर ठीक हैं। पर जैसे हमें वक्त पर अंगरेजी बोलना है तो हम बोलेंगे । यदि उसके बिना काम नहीं चलता है (जैसे कि आज का समय चाहता है)।पर बाकी वक्त हमें अपनी ही भाषा का प्रयोग करना चाहिये जो कि उचित है और अपनी मांग भी।

अतः हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हमारी भाषा पहले हिन्दी है फ़िर अंग्रेजी या और। यूं ही अपनी भाषा को विदेशी नहीं बना सकते।

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पूनम