
तुम्हारे यकीं का इंतजार करते करते
अब थक चुकी हूं मैं
फ़िर भी तुम्हें आया नहीं यकीं
मुझ पर अब तक
उससे तुम नहीं
मेरा आत्म सम्मान टूटता है
और मैं तुम्हें यकीन दिला के
रहूंगी तब तलक
जब तलक सांस में सांस रहेगी।
अन्तिम सांस अंतिम क्षण तक
तुम्हारे इंतजार में जाने
मैंने कितने अफ़साने
अपने ऊपर लिख डाले
यहां तक कि अब
लिखते लिखते
जज्बात रूपी लफ़्जों की
स्याही भी खत्म होने को
चली है और अब तक
कागजों का इतना बड़ा पुलिंदा
बन चुका है जो कि
खुद ही घुट घुट कर
जल चुकी हुई आधी शमा को
पूरी तरह जलने में
तुम्हारा साथ देगी
और तब तुम्हें लगे
कि हां मैनें तुम्हारे
यकीन को हां में बदलने
में शायद
काफ़ी देर कर दी
पर फ़िर भी मुझे खुशी होगी
कि चलो कम से कम
तब तो तुम्हें यकीन आया
और ये सब किसी
और के लिये भी एक
सबक होगा।
0000
पूनम