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बुधवार, 30 मार्च 2022

गुफ्तगू

 

गुफ्तगू

(फोटो-हेमन्त कुमार)


चलो आज हम कुछ गुफ्तगूं कर लें
कुछ अपनी कहें तुम्हारी भी सुन लें।
वो भोला सा बचपन निश्छल सी बातें
चलो वक़्त रहते कुछ अब भी बचा लें।
ना जाती दीवारें ना मज़हब की मीनारें
चलो आज हम ये लकीरें मिटा लें।
ना हो रंजो-रंजिश न तीर व कटारें
चलो प्रेम की हम पींगे चढा लें।
जो तुम्हारी आबरू वो हमारी भी इज़्ज़त
चलो रुसवा होने से उसको बचा लें।
दें भूखों को रोटी व प्यासे को पानी
इंसानियत की दौलत सबमें लुटा लें।
000000
पूनम श्रीवास्तव

रविवार, 15 सितंबर 2019

यात्राएं

फोटो क्रेडिट:हेमंत कुमार 

यात्राएं
ये यात्राएं भी
कितनी अजीब होती हैं।

जैसे हम गुजरते हुए
टेढ़े मेढे रास्तों से
नदी नालों पहाड़ों के
सौन्दर्य को देखते
सराहते,आश्चर्यचकित होते
अपने पीछे छोड़ते हुए
आगे बढ़ते जाते हैं
अपनी अपनी मंजिल की ओर।

ठीक वैसे ही
हमारी जिन्दगी का सफ़र भी
कभी आसान तो कभी कठिन
और दुरूह होता जाता है।

पर ये यात्राएं हमारी
बहुत मददगार होती हैं
जहाँ सफ़र में
हम एक दूसरे को
धकियाते ठेलते झगड़ते
अपनी अपनी जगह पर
कब्ज़ा करने में
जूझते रहते हैं
पर अपने स्वार्थवश
ये नहीं सोचते कि
हमारी इन हरकतों की वजह से
दूसरों को तकलीफ हो सकती है।
तो क्यों न हम सब
इन्हीं टेढ़े मेढे
रास्तों की तरह
जाने अनजानों को अपनाते
गले लगाते
एक दूसरे की मदद करते
अपने सुख दुःख को
एक दूसरे से बाटते
अपनी अपनी समस्याओं
को भी झेलते
हंसते हंसाते इसी तरह
अपनी जिंदगी का
सफ़र पूरा करें।
०००
पूनम श्रीवास्तव


शनिवार, 13 मई 2017

माँ तुझे प्रणाम




माँ तुझे प्रणाम
शत शत नमन कोटि प्रणाम
माँ तुझे प्रणाम ।

जब मैं  तेरी कोख में आई
तूने स्पर्श से बताया था
ममता का कोई मोल नहीं
तूने ही सिखलाया था ।
माँ तुझे प्रणाम ।

थाम के मेरी उंगली तूने
इस दुनिया से मिलवाया था
सूरज चाँद और धरती तारे
सबके गीत सुनाया था 
माँ तुझे प्रणाम ।

कदम लडखडाये जो मेरे
तूने भी कदम बढाया था
सही गलत की राह भी
तो तूने ही सिखलाया था ।
माँ तुझे प्रणाम ।

ज्यों ज्यों ही बढ़े चले हम
ऊंच नीच की आई समझ
हम सबसे पहले हैं इंसान
तूने हो समझाया था ।
माँ तुझे प्रणाम ।

कभी किसी भी पल में यदि
कोई मुसीबत हम पे आई
अडिग बन चट्टान सी तूने
हर मुश्किल से लड़ना सिखलाया।
माँ तुझे प्रणाम ।

अर्पण है माँ तुझको हरदम
श्रद्धा के शब्द अबोल ये माँ
ममता त्याग धैर्य समर्पण
माँ तुझसे ही सब पाया है।
माँ तुझे प्रणाम ।

सारी दुनिया तुझमें  समाई
सच में तेरा मोल नहीं
तू सबसे अनमोल है माँ  
माँ तुझे प्रणाम ।
००००
पूनम श्रीवास्तव





गुरुवार, 30 जून 2016

बरसो बदरवा

घनन घनन अब बरसो बदरवा
धरती का हियरा तड़पत है
खेतिहर की अंखियां हरदम
अंसुअन से अब भीगत हैं।

राह निहारे पंख पसारे
पाखी एकटक देखत हैं
अब बरसोगे तब बरसोगे
मन में आस लगावत हैं।

बिन पानी सब सूना सूना
जीव सभी अब भटकत हैं
दिखे पानी की एक बूंद
सब पूरी जान लगावत हैं।

बड़ी बेर भई बादल राजा
सावन सब कहां निहारत हैं
नैनन में अंसुअन भर भर के
सब अपनहि देह भिगोवत हैं।
0000
पूनम श्रीवास्तव


रविवार, 19 जून 2016

पिता हो गये मां

पितृ दिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। आज में आपको पढ़वा रही हूं प्रदीप सौरभ की एक बहुत भावनात्मक कविता।


पिता हो गये मां

पिता दहा्ड़ते
मेरा विद्रोह कांप जाता
मां शेरनी की तरह गुत्थमगुत्था करती
बच्चों को बचाती
दुलराती
पुचकारती
मां की मृत्यु के बाद
पिता मां हो गये।

पिता मर गये और मां ने नया अवतार ले लिया
सौ साल पार कर चुकने के बाद भी
वे खड़े रहते
अड़े रहते
वाकर पर चलते
फ़ुदक फ़ुदक
सहारे पर उन्हें गुस्सा आता
वे लाचारगी से डरते।

कभी-कभी अपने विद्रोह पर खिसियाता मैं
क्षमाप्रार्थी के तौर पर प्रस्तुत होता
पिता बस मुस्कुरा देते
अश्रुधारा बह उठती
पिता मां की तरह सहलाते।

फ़िर एक दिन वे मां के पास चले गये
उनके अनगिनत पुत्र पैदा हो गये
कंधा देने की बारी की प्रतीक्षा ही करता रहा मैं
और वे मिट्टी में समा गये।

अक्सर स्मृतियों के झोंके आते
गाहे-बगाहे रात-रात सोने न देते
विद्रोह और पितृत्व की मुठभेड़ में
पितृत्व बार बार जीतता
निरर्थक विद्रोह भ्रम है और पितृत्व सत्य।

पिता मैं भी बना
दो बेटियों का
पिता क्या होते हैं तब यह मैंने जाना।

पिता बरगद होते हैं
पिता पहाड़ होते हैं
पिता नदी होते हैं
पिता झरने होते हैं
पिता जंगल होते हैं
पिता मंगल होते हैं
पिता कलरव होते हैं
पिता किलकारी होते हैं
पिता धूप और छांव होते हैं
पिता बारिश में छत होते हैं
पिता दहाड़ते हैं तो शेर होते हैं।
000


प्रदीप सौरभ:

हिन्दी के चर्चित कवि,पत्रकार और लेखक। मुन्नी मोबाइल उपन्यास काफ़ी चर्चित।“तीसरी ताली”,” “देश भीतर देश” तथा “और बस तितली” उपन्यासों के साथ 2014 में नेशनल बुक ट्रस्ट से विज्ञापन और इलेक्ट्रानिक माधयमों पर केन्द्रित पुस्तक  भारत में विज्ञापन।कानपुर में  जन्म।परन्तु साहित्यिक यात्रा की शुरुआत इलाहाबाद से। कलम के साथ ही कैमरे की नजर से भी देश दुनिया को अक्सर देखते हैं।पिछले 35 सालों में कलम और कैमरे की यही जुगलबन्दी उन्हें खास बनाती है।गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत। लेखन के साथ ही कई धारावाहिकों के मीडिया सलाहकार।




रविवार, 12 जून 2016

खोज

जिसे तुम खोज रहे हो
वो मिला नहीं
अब तक शायद
वक्त आगे निकल गया
और फ़िर तुम पीछे रह गये
तुम वक्त का इन्तजार
कर रहे थे
पर वक्त किसी का
इन्तजार नहीं करता
वो निरन्तर हर पल
आगे ही आगे चलता
रहता है।
लाख वक्त को पकड़ने
की कोशिश कर लें
पर वो तो यूं फ़िसल जाता है
हथेली से ज्यूं
बंद मुट्ठी से रेत।
000
पूनम श्रीवास्तव


रविवार, 29 मई 2016

जिन्दगी

जिन्दगी इक बोझ सी
लगने लगती है जब
जिन्दगी का रुख अपनी
तरफ़ नहीं होता
व्यर्थ और निरर्थक
पर तभी अचानक से
रुख पलट जाता है
खुशियों के कुछ
संकेतों से
और फ़िर
हम जिन्दगी से
प्रेम करने लगते हैं
और चल पड़ती है
जिन्दगी
खुशियों का निमन्त्रण पाकर
आगे मंजिल की तरफ़
एक अन्तहीन यात्रा पर
उल्लास से भरी।
  000
पूनम श्रीवास्तव


बुधवार, 25 मई 2016

गीत

खिल रही कली कली
महक रही गली गली
चमन भी है खिला खिला
फ़िजा भी है महक रही।

दिल से दिल को जोड़ दो
सुरीली तान छेड़ दो
प्रेम से गले मिलो
हर जुबां ये कह रही।

कौन जाने कल कहां
हम यहां और तुम वहां
पल को इस समेट लो
वक्त मिलेगा फ़िर कहां।

मिलेगी सबको मंजिलें
नया बनेगा आशियां
कदम कदम से मिल रहे
कारवां भी चल पड़ा।
000

पूनम श्रीवास्तव

बुधवार, 2 सितंबर 2015

दर्पण

दर्पण जो आज देखा वो मुंह चिढ़ा रहा था
चेहरे की झुर्रियों से बीती उम्र बता रहा था।

कब कैसे कैसे वक्त सारा निकल गया था
कुछ याद कर रहा था मैं कुछ वो दिला रहा था।

नटखट भोला भाला बचपन कितना अच्छा होता था
जब बाहों में मां के झूले झूला करता था।

धमा चौकड़ी संग अल्हड़पन कब पीछे छूट गया था
इस आपाधापी के जीवन में वो भी बिसर गया था।

कब उड़ान भरी हमने कब सपना मीठा देखा था
सच में सब कुछ वो बहुत रुला रहा था।

कब हंसे कब रोया हमने क्या कैसे पाया था
गिनती वो सारी की सारी करा रहा था।

मैं रो रहा था और वो मुझ पर हंस रहा था
क्यों नहीं हमने सबको रक्खा सहेजे था।

पछता के अब क्या वो ये जता रहा था
जो बीता वो ना लौटे वो यही समझा रहा था।

अब समझ रहा था मैं जो वो कहना चाह रहा था
आने वाले पल के लिये वो तैयार करा रहा था।
000
पूनम




गुरुवार, 16 जुलाई 2015

ज़िन्दगी

तुम धीरे-धीरे आना
तुम चुपके चुपके
तुम छइयां छइयां आना
ना धूप लगे डर जाना ।

तुम बन के चंचल हिरनी
वन वन में कुलांचे भरना
मत अंखिया तुम बंद करना
शिकारी बन कर रहना ।

कुछ पांव तले गड़ जाये
ना फ़िकर कोई तुम करना
तुम आगे- आगे चलना
ना पीछे मुड़ते रहना।

तुम अपना पँख फैलाना
बन आजाद परिन्दा
चूमोगी नील गगन को
इक दिन तुम ये तय करना।

खुश रहना तुम हर पल
ना गम के साये में रहना
फूलों के संग संग कांटे
होते फूलों का गहना।
---

पूनम श्रीवास्तव

शुक्रवार, 1 मई 2015

अरे ओ मजदूर

(फ़ोटो-गूगल से साभार)
अरे मजदूर, अरे मजदूर
तुम्हीं से है दुनिया का नूर
फ़िर क्यों तुम इतने मजबूर।

अपने हाथों के गट्ठों से
रचते तुम हो सबका बसेरा
पर हाय तुम्हें सोने को तो बस
मिला एक है खुला आसमां
अरे मजदूर, अरे मजदूर।
तुम हो क्यों इतने मजबू्र।

बारिश,धूप कड़ी सर्दी में
तन पर वही पुरानी कथरी
बुन बुन कर दूजों के कपड़े
बुझती है नयनों की ज्योति
अरे मजदूर, अरे मजदूर।
तुम हो क्यों इतने मजबू्र।

अनाज भरे बोरे ढो ढो कर
भरते जाने कितने गोदाम
फ़िर भी दोनो वक्त की रोटी
तुम्हीं को क्यूं ना होती नसीब
अरे मजदूर,अरे मजदूर।
तुम हो क्यों इतने मजबू्र।
0000
पूनम श्रीवास्तव



बुधवार, 1 मई 2013

कैक्टस के जंगल

(फोटो--गूगल से साभार)

ज्यों ज्यों उम्र उसकी
चढ़ रही थी परवान पे
त्यों त्यों पल रहे थे
सपने उसकी आंखों में।

घर आंगन की लाडली
नन्हीं सी कली खिली खिली
नहीं मालूम था एक दिन
मुरझायेगी वो किस गली।

पूरे घर की आंखों की पुतली
जान निसार थी जिस पर सबकी
अपने ख्वाबों के संग संग
जिसने देखे थे सपने बापू व मां के।

कदम बढ़ा रही थी धीरे धीरे
खोल रही थी पर अपने
धर दबोचा उसको पीछे से
कुछ नापाक हाथों ने।

छटपटाई रोई चिल्लायी
भाई होने की दी दुहाई
पर जिसको दया न आनी थी
वो हुआ कब किसका भाई।

बहुत लड़ी हिम्मत न हारी
पर अंततः लाचार हुई
बड़ी ही बेदर्दी से वो
हैवानियत का शिकार हुई।

बिखर गये सारे सपने
जिस्म के टुकड़े टुकड़े हो कर
चढ़ गयी फ़िर एक बेटी की बलि
शैतानों के हाथों पड़कर।

ना जाने कितनी बेटियां
ऐसी बलि होती रहेंगी
क्या सचमुच ये धरती मां
बेटियों से सूनी हो जायेगी।
000

पूनम