
उड़ते फ़िरते पक्षी सारे
ज्यों घूमा करते बंजारे
घूम घूम कर डाली डाली
ढूंढ़ रहे अपने घर सारे।
प्रेम की भाषा इनमें इतनी
काश कि इन्सानों में दिखती
इनमें आपस में विश्वास बड़ा
तभी तो रहते घर को संवारे।
देख रहे सूनी आंखों से
अपने संवरे घर को उजड़ते
सोच रहे मन ही मन में
रहें कहां अब हम बेचारे।
बिन इनके तो जंगल सूना
बगिया सूनी सूनी दिखती
चहका करती थी जो घर में
उनकी आवाज को तरसते सारे।
रोज बाग में आती थी गौरैया
इक इक दाना चुगती थी
दाने अपने मुख में भरकर
बच्चों का पेट वो भरती सारे।
अब गौरैया बैठी दीवारों पर
ले बच्चों को बिलख रही
जाऊं तो जाऊं कहां
छोड़ के बच्चे प्यारे प्यारे।
कोयल की कूक भी अब देखो
सुनने को कम ही मिलती है
ठौर ठिकाने ढूंढने में
भूल गयी वो भी सुर सारे।
तिनका तिनका ढूंढ के ये
मेहनत से अपना घर बार बनाते
पर बेदर्द मतलबी इन्सानों ने
इनके घर संसार उजाड़े।
पशु पक्षी से भी प्यार करो
इनसे प्यार के बदले मिलता प्यार
आओ इनका घर फ़िर से संवारें
गौरैया दिवस के अवसर पर आज।
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पूनम