कुछ कहना चाहती हूं
पर कह नहीं पाती
कुछ लिखना चाहती हूं
पर लिख नहीं पाती
या शायद थोड़े में बहुत कुछ
कहना चाहती हूं।
क्योंकि मैं भी हूं
इसी समाज का एक अंग
जो कि समय समय पर
नियम कानून को करते रहते हैं भंग
जिससे समूची
मानवता के नाम पर
छिड़ी है जंग
जिसे देख कर
इंसानियत भी है दंग।
जरूरत है
कदम से कदम
मिलाकर चलने को संग
तभी तो छाएगा जीवन में
एक नया रंग
और आयेगी आवाज एक संग
जय जन गण मन।
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पूनम