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सोमवार, 16 मई 2016

गज़ल

कलम चल रही जरा धीरे धीरे
भाव बन रहे मगर धीरे धीरे।

उम्मीदों की जिद कायम है अब भी
शब्द बंध रहे हैं जरा धीरे धीरे।

कसक उठ रही मन में जरा धीरे धीरे
इक धुन बन रही है जरा धीरे धीरे।

सबने मिलकर तरन्नुम जो छेड़ा
कि गज़ल बन रही है जरा धीरे धीरे।

जिन्दगी के साज बज रहे धीरे धीरे
हुआ सफ़र का आगाज जरा धीरे धीरे।
000
पूनम श्रीवास्तव



शनिवार, 18 जनवरी 2014

जिन्दगी----।

कहते हैं जिसे जिन्दगी उस जिन्दगी को ढूंढते हैं।
पोंछते हैं अश्कों को जीने का बहाना ढूंढ़ते हैं॥

खामोश है जुबान पर दिल ये रोता है।
कांटों भरी डगर पर हंसने का बहाना ढूंढ़ते हैं।।

थाम ले कोई हाथ जिस राह से भी गुजरे हम।
हम सफ़र मिल जाय सफ़र का बहाना ढूंढ़ते हैं॥

चाहत हर किसी की होती नहीं पूरी फ़िर भी
कोशिश का बहाना,खुदा के पास ढूंढ़ते हैं।।
000
पूनम


शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

कह दो हर दिल से-----



कह दो दिलों से आज कि इक दिल ने आवाज दी है
बन जाओ सहारे उनके जो कि बेसहारा हैं।

गुलामी की वो जंजीरें जो टूटी नहीं हैं अब तलक
तोड़ दो उन पाबन्दियों को जिन पर हक़ तुम्हारा है।

बड़ी फ़ुरसत से वो इक शै बनाई है खुदा ने
वो तुम इंसान ही तो हो जिसे उसने संवारा है।

वक़्त कब किसका बना है आज तलक हम कदम
करो ना इन्तजार उसका जो कि नहीं तुम्हारा है।

करने से पहले नेकी का अंजाम ना सोचो
समझो कि हर बात में उसका ही इशारा है।
000
पूनम





शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

गज़ल


खाली बोतल जाम है खाली,बन्द पड़े सारे मयखाने
कष्ट बड़ा जीवन में है रब,टूट गये सारे पैमाने।

सबकी देहरी घूम के देखा,सबके अपने हैं अफ़साने
दुख की घड़ियां गिनता कोई,कोई बुनता नये ठिकाने।

तिनका तिनका जोड़ के इक दिन,पूरे हुये थे मेरे सपने
वक्त ने करवट ऐसी कुछ ली,अपने तिनके हुये बेगाने।

हवा यहां कुछ ऐसी बहकी,कोई अपने खून को ना पहचाने
जान चुका था मै भी तब तक,निकले ही थे वो उड़ जाने।

जैसे भटका हुआ मुसाफ़िर,लौट ही आता अपने ठिकाने
अपनी क़िस्मत कब बदलेगी,हम भी देते रब को ताने।
              000
पूनम

सोमवार, 25 जून 2012

इन्तहां प्यार की---



हद से गुजर जाती है जब इन्तहां प्यार की
इक आह सी निकली इस दिल के गरीब से।

नजरे अंदाज उनके कुछ इस कदर बदले
अनजाने से बन निकलते वो मेरे करीब से।

हाले दिल जो गैरों ने सुना वो लेते तफ़री
अपने भी देखते हमको बड़े अजीब से।

ये दिल दौलत की दुनिया होती जब तक पास
बन जाते हैं सब बड़े हम नसीब से।

ताउम्र  जीने की अब ललक हमको नहीं
बस एक मुलाकात हो जाए मेरी महजबीं से।
000
पूनम

रविवार, 3 जून 2012

रूठा चांद



चांद को देखा कुछ गुमसुम उदास है।
चांदनी भी शायद कुछ रूठी आज है॥

तभी बादलों में उसने मुंह छुपा लिया था॥
कर लिया क्यों उसने अंधेरी रात है॥

टिमटिमाते तारे भी लगे खोये खोये से।
चांद के बिना नहीं चांदनी साथ है॥

मैं भी उदास गुमसुम सी उसको निहारती रही।
वो शायद समझ गया मेरे दिल की बात है॥

दूर से ही सही वो मुझको तसल्ली दे रहा था।
यूं लगा कि कोई अपना अपने पास है॥
000
पूनम श्रीवास्तव

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

आ जाओ ना-----


कई दिनों से ढूंढ़ रही हैं

मेरी नजरें उनको

और मन ही मन में

याद कर रही हैं

बहुत ज्यादा

पर वो हैं कि

नजर आते ही नहीं।

माना कि हमने भी

किया उनको

बहुत नजर अन्दाज़

इस बीच कई बार

उन्होंने कोशिश भी की

आने की

पर मैं आगे नहीं बढ़ पाई।

यूं तो कई बार

लगा कि उन्होंने

दिल के दरवाजे पर दस्तक दी और

जब तक

मैं उन्हें पुकारती

वो गायब हो जाते।

हद हैऐसी भी

निठुरता अच्छी नहीं

अब तो

वापस आ भी जाओ ना---

ओ मेरे शब्दों--------।

000000

पूनम

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

जिन्दगी के लिये


क्यों नहीं छोड़ देते

उसे एक बार

अपनी तरह जीने के लिये।

क्यों हमेशा

उसे मेंड़ की तरह

बांधने की करते हो

कोशिश

वो तो

इस धरती का

ही आज़ाद जीव है।

जो अपनी

स्वतन्त्रता का हक़

रखती है

फ़िर क्यूं

भारी भारी पत्थर की

शिला डाल कर

राह में उसके

आगे पैदा करते हो

अड़चनें।

हर वक़्त

उसके चारों ओर

बुनने की

करते हो कोशिश

एक मकड़जाल।

उसे

खुला छोड़ के

देखो तो सही

कैसे

आज़ाद पंछी की तरह

अपने पंख फ़ड़फ़ड़ा कर

जब वो बंधन से निकलेगी

बाहर तो

खुशी का इज़हार करते

तुमसे वो थकेगी नहीं।

क्योंकि जिन्दगी तो

जीने का नाम है

ज्यादा पाबंदियां

लगाने पर

वह भी

एक दिन घुट घुट कर

तोड़ देती है दम।

इससे तो

अच्छा है

खुली हवा में

सांस लेने की कोशिश

सारी चिंताओं से परे होकर

फ़िर देखो

यही ज़िंदगी

कितनी सुहानी लगेगी।

लगेगा तुम्हें

कितनी बड़ी गलती

कर रहे थे

तुम

अपने आप को

व्यर्थ के बंधनों में

जकड़कर।

क्योंकि ज़रूरत से ज़्यादा

अति तो ठीक नहीं

चाहे वो

किसी के लिये भी हो

यानि ---

ज़िंदगी के लिये।

000

पूनम

बुधवार, 7 सितंबर 2011

सिसकते शब्द



तन्हाई के आलम में रहते रहते

शब्द भी मेरे बिखर के रह गये।

सोच की धरा पर जो भावों के पुल बने मेरे

शब्द पानी पर नदी के उतराते जैसे रह गये।

दरवाजे पर दस्तक से दिल धड़क धड़क उठे

कौन हो सकता है बेवक्त बस लरज के रह गये।

इन्सान को सही इन्सां समझना है बड़ा मुश्किल

मन ही मन में इसका हल ढूंढ़ते रह गये।

भरोसा भी करें तो कैसे और किस पर हम

सफ़ेदपोश में छुपे चेहरे असल दंग हम रह गये।

उड़ान मारते आसमां में देखा जो परिन्दों को

पिंजरे में बन्द पंछी से फ़ड़फ़ड़ा के रह गये।

मत लगाओ बन्दिशें इतनी ज्यादा

हम गुजारिश पर गुजारिशें ही करते रह गये।

सच्चाई को दफ़न होते देखा है हमने

झूठ का डंका बजा पांव जमीं से खिसक गये।

सन्नाटा पसरा रहता सहमी रहती गली गली

हम झरोखे से अपने झांक के ही रह गये।

जल रहे हैं आशियाने हंस रहे हैं मयखाने

सियासती दांव पेंचों में शब्द सिसक के रह गये।

झिलमिलाते तारों संग जो आसमां पे पड़ी नजर

हो खूबसूरत ये जहां भी चाहत लिये ही रह गये।

00000

पूनम

सोमवार, 22 अगस्त 2011

ओ रे कन्हैया


उद्धव जाये कहियो कान्हा से सब हाल

राधे संग सखियन बेहाल

जानत रहियो जब जावन तुमको

काहे बढ़ायो मोह का जाल।

नज़रें इत उत डोलत हैं

मन कान्हा-कान्हा बोलत है

थकि थकि गये हम टेरत

टेरत नैना बाट जोहत हैं।

तुम तो बिसरा गयो हमको

पर हम तो अब भी तिहारी हैं

प्रीति की डोर ना टूट सके

ये रीति बनाई भी तुम्हरी है।

बचपन मा हम संग संग बाढ़े

मिलके रास रचायो खूब

बालापन में गोपियन संग

तूने नटखटपन दिखलायो खूब।

सुनने की तान मुरलिया की

तरसे बरसों हमरे कान

अब भी आ के सुर बिखराओ

हे नटवर नागर,हे घनश्याम।

होठों पे तेरे सजे बँसुरिया

अब मोहे तनिक भी भावे ना

वो तो पहिले थी ही वैरन

अब तो सौतन सी लागे न।

पर राधा तो तुम्हरी दीवानी

जो तुझको वो हमको भावे

जिया ना लागे मोरा तुझ बिन

तनिक ना पल कोई रास आवे।

यादों में तुम हमरी बसे

जिया में हूक उठत है श्याम

तुम सारे जग रे पियारे

पर मनवा हमरे बसे तिहारो नाम।

बड़ी देर भई तेरी राह निहारे

अब भी दया दिखावत नाहि

हमरी नगरिया फ़िर कब अइहो

बतला दो अब भी निरमोही कन्हाई।

000

पूनम

बुधवार, 3 अगस्त 2011

मिडिल क्लास लड़की


राह चलते एक मुलाकात हुई

वो फ़िर वो चलते चलते

दोस्ती में बदल गई।

पता नहीं तुमने मुझमें

क्या देखा

जो अचानक ही मेरा हाथ

पकड़ लिया

और मैं भी तुम्हारा हाथ

थाम कर आगे

मंजिल की तरफ़

बढ़ने लगी।

पर

एक दिन हाई सोसायटी

गर्ल से हुयी

तुम्हारी मुलाकात से

न जाने क्यों तुम

मुझसे कतराने लगे

मेरी खूबियां जो तुम्हें

बहुत भाती थीं

वो तुम्हारी नजर

में कमियां नजर आने लगीं।

तुम्हारी नजरों में मैं

अब पुराने संस्कारों के

बंधन में जकड़ी

परंपराओं से जुड़ने वाली

लड़की नहीं

एक मिडिल क्लास की

लड़की लगने लगी

जो तुम्हारे साथ

बियर बार में बैठकर

हाथ में बियर ग्लास लेकर

चियर्स नही कर सकती थी।

न क्लबों में गैरों की

कमर में हाथ डाले

फ़्लोर पर डांस

कर सकती थी

और न ही

देर रात डिनर पर

तुम्हारे दोस्तों के

अश्लील मजाकों का

लुत्फ़ उठा सकती थी।

फ़िर तुमने बीच राह

में ही छोड़ दिया मेरा हाथ

अच्छा ही किया

क्योंकि मैं अपने बुजुर्गों के

संस्कारों में पली बढ़ी

स्वाभिमानी लड़की थी

जो वो सब नहीं कर सकती थी

जैसा तुम चाहते थे।

पर तुमने मुझे

मेरी भावनाओं को

तनिक भी

समझने की कोशिश नहीं की

संस्कारों में पली लड़की

अपने पुराने संस्कारों के

साथ चलते हुये भी

नये जमाने की

विषम परिस्थितियों को

भी बखूबी अपने अनुरूप

ढाल सकती थी।

क्योंकि ये संस्कार ही

हमें आगे परिस्थितियों से

जूझना और आगे बढ़ने की

हिम्मत देते हैं।

मैं भी आगे बढ़ूंगी

जरूर पर अपना आत्मसम्मान

स्वाभिमान बेच कर नहीं

क्योंकि मैं एक

मिडिल क्लास लड़की हूं।

0000

पूनम