सोमवार, 16 मई 2016
गज़ल
शनिवार, 18 जनवरी 2014
जिन्दगी----।
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012
कह दो हर दिल से-----
शुक्रवार, 14 सितंबर 2012
गज़ल
सोमवार, 25 जून 2012
इन्तहां प्यार की---
रविवार, 3 जून 2012
रूठा चांद
बुधवार, 1 फ़रवरी 2012
आ जाओ ना-----

कई दिनों से ढूंढ़ रही हैं
मेरी नजरें उनको
और मन ही मन में
याद कर रही हैं
बहुत ज्यादा
पर वो हैं कि
नजर आते ही नहीं।
माना कि हमने भी
किया उनको
बहुत नजर अन्दाज़
इस बीच कई बार
उन्होंने कोशिश भी की
आने की
पर मैं आगे नहीं बढ़ पाई।
यूं तो कई बार
लगा कि उन्होंने
दिल के दरवाजे पर दस्तक दी और
जब तक
मैं उन्हें पुकारती
वो गायब हो जाते।
हद है—ऐसी भी
निठुरता अच्छी नहीं
अब तो
वापस आ भी जाओ ना---
ओ मेरे शब्दों--------।
000000
पूनम
शनिवार, 10 दिसंबर 2011
जिन्दगी के लिये

क्यों नहीं छोड़ देते
उसे एक बार
अपनी तरह जीने के लिये।
क्यों हमेशा
उसे मेंड़ की तरह
बांधने की करते हो
कोशिश
वो तो
इस धरती का
ही आज़ाद जीव है।
जो अपनी
स्वतन्त्रता का हक़
रखती है
फ़िर क्यूं
भारी भारी पत्थर की
शिला डाल कर
राह में उसके
आगे पैदा करते हो
अड़चनें।
हर वक़्त
उसके चारों ओर
बुनने की
करते हो कोशिश
एक मकड़जाल।
उसे
खुला छोड़ के
देखो तो सही
कैसे
आज़ाद पंछी की तरह
अपने पंख फ़ड़फ़ड़ा कर
जब वो बंधन से निकलेगी
बाहर तो
खुशी का इज़हार करते
तुमसे वो थकेगी नहीं।
क्योंकि जिन्दगी तो
जीने का नाम है
ज्यादा पाबंदियां
लगाने पर
वह भी
एक दिन घुट घुट कर
तोड़ देती है दम।
इससे तो
अच्छा है
खुली हवा में
सांस लेने की कोशिश
सारी चिंताओं से परे होकर
फ़िर देखो
यही ज़िंदगी
कितनी सुहानी लगेगी।
लगेगा तुम्हें
कितनी बड़ी गलती
कर रहे थे
तुम
अपने आप को
व्यर्थ के बंधनों में
जकड़कर।
क्योंकि ज़रूरत से ज़्यादा
अति तो ठीक नहीं
चाहे वो
किसी के लिये भी हो
यानि ---
ज़िंदगी के लिये।
000
पूनम
बुधवार, 7 सितंबर 2011
सिसकते शब्द

शब्द भी मेरे बिखर के रह गये।
सोच की धरा पर जो भावों के पुल बने मेरे
शब्द पानी पर नदी के उतराते जैसे रह गये।
दरवाजे पर दस्तक से दिल धड़क धड़क उठे
कौन हो सकता है बेवक्त बस लरज के रह गये।
इन्सान को सही इन्सां समझना है बड़ा मुश्किल
मन ही मन में इसका हल ढूंढ़ते रह गये।
भरोसा भी करें तो कैसे और किस पर हम
सफ़ेदपोश में छुपे चेहरे असल दंग हम रह गये।
उड़ान मारते आसमां में देखा जो परिन्दों को
पिंजरे में बन्द पंछी से फ़ड़फ़ड़ा के रह गये।
मत लगाओ बन्दिशें इतनी ज्यादा
हम गुजारिश पर गुजारिशें ही करते रह गये।
सच्चाई को दफ़न होते देखा है हमने
झूठ का डंका बजा पांव जमीं से खिसक गये।
सन्नाटा पसरा रहता सहमी रहती गली गली
हम झरोखे से अपने झांक के ही रह गये।
जल रहे हैं आशियाने हंस रहे हैं मयखाने
सियासती दांव पेंचों में शब्द सिसक के रह गये।
झिलमिलाते तारों संग जो आसमां पे पड़ी नजर
हो खूबसूरत ये जहां भी चाहत लिये ही रह गये।
00000
पूनम
सोमवार, 22 अगस्त 2011
ओ रे कन्हैया

उद्धव जाये कहियो कान्हा से सब हाल
राधे संग सखियन बेहाल
जानत रहियो जब जावन तुमको
काहे बढ़ायो मोह का जाल।
नज़रें इत उत डोलत हैं
मन कान्हा-कान्हा बोलत है
थकि थकि गये हम टेरत
टेरत नैना बाट जोहत हैं।
तुम तो बिसरा गयो हमको
पर हम तो अब भी तिहारी हैं
प्रीति की डोर ना टूट सके
ये रीति बनाई भी तुम्हरी है।
बचपन मा हम संग संग बाढ़े
मिलके रास रचायो खूब
बालापन में गोपियन संग
तूने नटखटपन दिखलायो खूब।
सुनने की तान मुरलिया की
तरसे बरसों हमरे कान
अब भी आ के सुर बिखराओ
हे नटवर नागर,हे घनश्याम।
होठों पे तेरे सजे बँसुरिया
अब मोहे तनिक भी भावे ना
वो तो पहिले थी ही वैरन
अब तो सौतन सी लागे न।
पर राधा तो तुम्हरी दीवानी
जो तुझको वो हमको भावे
जिया ना लागे मोरा तुझ बिन
तनिक ना पल कोई रास आवे।
यादों में तुम हमरी बसे
जिया में हूक उठत है श्याम
तुम सारे जग रे पियारे
पर मनवा हमरे बसे तिहारो नाम।
बड़ी देर भई तेरी राह निहारे
अब भी दया दिखावत नाहि
हमरी नगरिया फ़िर कब अइहो
बतला दो अब भी निरमोही कन्हाई।
000
पूनम
बुधवार, 3 अगस्त 2011
मिडिल क्लास लड़की

राह चलते एक मुलाकात हुई
वो फ़िर वो चलते चलते
दोस्ती में बदल गई।
पता नहीं तुमने मुझमें
क्या देखा
जो अचानक ही मेरा हाथ
पकड़ लिया
और मैं भी तुम्हारा हाथ
थाम कर आगे
मंजिल की तरफ़
बढ़ने लगी।
पर
एक दिन हाई सोसायटी
गर्ल से हुयी
तुम्हारी मुलाकात से
न जाने क्यों तुम
मुझसे कतराने लगे
मेरी खूबियां जो तुम्हें
बहुत भाती थीं
वो तुम्हारी नजर
में कमियां नजर आने लगीं।
तुम्हारी नजरों में मैं
अब पुराने संस्कारों के
बंधन में जकड़ी
परंपराओं से जुड़ने वाली
लड़की नहीं
एक मिडिल क्लास की
लड़की लगने लगी
जो तुम्हारे साथ
बियर बार में बैठकर
हाथ में बियर ग्लास लेकर
चियर्स नही कर सकती थी।
न क्लबों में गैरों की
कमर में हाथ डाले
फ़्लोर पर डांस
कर सकती थी
और न ही
देर रात डिनर पर
तुम्हारे दोस्तों के
अश्लील मजाकों का
लुत्फ़ उठा सकती थी।
फ़िर तुमने बीच राह
में ही छोड़ दिया मेरा हाथ
अच्छा ही किया
क्योंकि मैं अपने बुजुर्गों के
संस्कारों में पली बढ़ी
स्वाभिमानी लड़की थी
जो वो सब नहीं कर सकती थी
जैसा तुम चाहते थे।
पर तुमने मुझे
मेरी भावनाओं को
तनिक भी
समझने की कोशिश नहीं की
संस्कारों में पली लड़की
अपने पुराने संस्कारों के
साथ चलते हुये भी
नये जमाने की
विषम परिस्थितियों को
भी बखूबी अपने अनुरूप
ढाल सकती थी।
क्योंकि ये संस्कार ही
हमें आगे परिस्थितियों से
जूझना और आगे बढ़ने की
हिम्मत देते हैं।
मैं भी आगे बढ़ूंगी
जरूर पर अपना आत्मसम्मान
स्वाभिमान बेच कर नहीं
क्योंकि मैं एक
मिडिल क्लास लड़की हूं।
0000
पूनम