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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

दो क्षणिकाएं


दो क्षणिकाएं

एक बूंद


बारिश की एक बूंद

गिरी टप

गुलमेहंदी के

फ़ुल पर

स्थिर हुई कुछ

चमकी

सागर के मोती सी

हवा चली

फ़ूल हिला

बूंद फ़िर गिरी

टप

प्यासी सी भूमि पर।

000

जिन्दगी और मौत


जिन्दगी

एक सोया हुआ आदमी

मौत

कच्चे सूत सी लटकती

कटार

कब टूटे

कब गिर पड़े

किसे पता।

000

पूनम