गुरुवार, 10 मार्च 2011

खुशगवार उजाला


उजाले आजकल तुम

कहां खो गये हो

मुंह छुपा कर अपना

किन वादियों में सो गये हो।

दिल के आईने पर भी

है बुराइयों की धूल जम गयी

जो बार बार कोशिश करने

पर भी साफ़ होती नहीं।

आईने पर गर्द

इस तरह बैठ गयी

कि अब कुछ भी साफ़

नजर आता नहीं।

कभी गैर लगे अपने

कभी अपने ही लगते बेगाने

सच क्या है झूठ क्या

ये जानना अब आसां नहीं।

चेहरे पर जो नकाब लगाये

घूमते हैं लोग

उसकी ओट में क्या छुपा है

यह भी नजर आता नहीं।

अंधेरे के सन्नाटे में ही

किसी की चीख दबा दी गयी

यूं सरे आम भी कोई रोशनी

की सही राह देख पाता नहीं।

अब तो निकलो

अपने उजाले की किरणों से

अंधेरे में फ़ैल रही

इंसानियत की कालिमा

को खत्म करो।

आईने पर पड़ी हुयी

मन की गंदगी को

समाज में फ़ैल रही

अमानवीयता तथा

भ्रष्टाचार रूपी धूल की

परत को हटाओ।

दिल पर अपनी चमचमाती

खुशगवार व सुनहरी रंगत

से सबके मन में फ़ैल जाओ

ताकि धूल हटने के बाद

सभी की आंखें खुल सकें

और आईने में सब कुछ

हंसता मुस्कुराता नजर आये।

000

पूनम

25 टिप्‍पणियां:

Deepak Saini ने कहा…

achchi kavita
badhai

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आशान्वित करती सुन्दर रचना ..

Shekhar Suman ने कहा…

पूनम जी...
बहुत ही सुन्दर कविता..
अब तो निकलो अपने उजाले की किरणों से अंधेरे में फ़ैल रही इंसानियत की कालिमा को खत्म करो..
उर्जा संचार हुआ ये पढ़ कर....
*********************************
आप मेरे ब्लॉग पर आयीं अच्छा लगा , यूँ क्षमा मांग कर मुझे शर्मिंदा न करें... वैसे शायद आप मेरे ब्लॉग को फोलो नहीं कर रही हैं इसलिए समय से नयी पोस्ट का पता नहीं चल पा रहा....

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर पूनमजी ..... उजाला और अँधेरे के बिम्ब को इंसानियत से सुंदर ढंग से जोड़ दिया आपने.....

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

उजाला = उजाले ..

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति !!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय पूनम श्रीवास्तव जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

बहुत अच्छी रचना के लिए आभारी हूं ।
आईने में सब कुछ हंसता मुस्कुराता नजर आए
कितना शुभ चिंतन है … !
रंग बातें करे , और बातों से ख़ुशबू आए …:)

मैंने स्वमूल्यांकन का आह्वान करते हुए कभी लिखा कि
शायरों की सोच का सामान तो नहीं ?
आईनों में देखिए , हैवान तो नहीं ?


लेकिन आपको एक प्यारा-सा शे'र नज़्र करते हुए विदा लेता हूं -
अंदाज़ अपने देखते हैं आईने में वो
और ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो … :)


अच्छा , अब आपका स्वास्थ्य कैसा है ? आराम और दवा का ध्यान रखें , कृपया !

अंत में , आप नारी शक्ति को समर्पित तीन दिन पहले आ'कर गए
विश्व महिला दिवस की हार्दिक बधाई !
शुभकामनाएं !!
मंगलकामनाएं !!!

♥मां पत्नी बेटी बहन;देवियां हैं,चरणों पर शीश धरो!♥


- राजेन्द्र स्वर्णकार

Minoo Bhagia ने कहा…

bahut achha poonam ,

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

काश देश को अपना सही रूप दिखे, इस आईने में।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सच क्या है झूठ क्या
ये जानना अब आसां नहीं।
mukhaute itne ho gaye hain ki khali chehra nazar bhi to nahi aata

Urmi ने कहा…

मैं ज़रूरी काम में व्यस्त थी इसलिए पिछले कुछ महीनों से ब्लॉग पर नियमित रूप से नहीं आ सकी!
बहुत ख़ूबसूरत कविता लिखा है आपने ! उम्दा प्रस्तुती!

ashish ने कहा…

मन ही देवता मन ही इश्वर , मन से बड़ा ना कोई
मन उजियारा जब जब फैले , जग उजियारा होई
इस उजले दर्पण पर प्राणी , धूल ना जमने पाए
तोरा मन दर्पण कहलाये .

तमसों माँ ज्योतिर्गमय .

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत प्रेरक भाव...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

http://anusamvedna.blogspot.com ने कहा…

अच्छी और प्रेरक कविता...

सदा ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर भावों से सजी अनुपम प्रस्‍तुति ।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

अतयंत प्रेरक और सुंदर

रामराम.

Patali-The-Village ने कहा…

अच्छी और प्रेरक कविता| धन्यवाद|

विशाल ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना.
आईना और उजाला.
बहुत उम्दा.
सलाम

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

bahut prerna se bhari rachna. lekin dusro ka muh taakne ki bajaye khud hi kyu na pahal ki jaye.

Sunil Kumar ने कहा…

समाज में फ़ैल रही
अमानवीयता तथा
भ्रष्टाचार रूपी धूल की
परत को हटाओ।
बहुत खूब काश ! यह हो सके आशा का दीप जला कर रखना ,अच्छी लगी बधाई

Vijuy Ronjan ने कहा…

ujale aajkal munh chhipaye rahte hain,
ham hain ki andheron se roshni ki bheekh maangte.

nahut avcchi kavita hai aapki.badhayee.

amit kumar srivastava ने कहा…

kya baat hai.. bahut khoob..

संजय भास्‍कर ने कहा…

आदरणीय पूनम जी...
बहुत ही सुन्दर कविता..

संजय भास्‍कर ने कहा…

कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

shobha mishra ने कहा…

चेहरे पर जो नकाब लगाये
घूमते हैं लोग
उसकी ओट में क्या छुपा है
यह भी नजर आता नहीं।

बहुत सुन्दर रचना पूनम जी , बहुत शुभकामनायें आपको !!!