
उजाले आजकल तुम
कहां खो गये हो
मुंह छुपा कर अपना
किन वादियों में सो गये हो।
दिल के आईने पर भी
है बुराइयों की धूल जम गयी
जो बार बार कोशिश करने
पर भी साफ़ होती नहीं।
आईने पर गर्द
इस तरह बैठ गयी
कि अब कुछ भी साफ़
नजर आता नहीं।
कभी गैर लगे अपने
कभी अपने ही लगते बेगाने
सच क्या है झूठ क्या
ये जानना अब आसां नहीं।
चेहरे पर जो नकाब लगाये
घूमते हैं लोग
उसकी ओट में क्या छुपा है
यह भी नजर आता नहीं।
अंधेरे के सन्नाटे में ही
किसी की चीख दबा दी गयी
यूं सरे आम भी कोई रोशनी
की सही राह देख पाता नहीं।
अब तो निकलो
अपने उजाले की किरणों से
अंधेरे में फ़ैल रही
इंसानियत की कालिमा
को खत्म करो।
आईने पर पड़ी हुयी
मन की गंदगी को
समाज में फ़ैल रही
अमानवीयता तथा
भ्रष्टाचार रूपी धूल की
परत को हटाओ।
दिल पर अपनी चमचमाती
खुशगवार व सुनहरी रंगत
से सबके मन में फ़ैल जाओ
ताकि धूल हटने के बाद
सभी की आंखें खुल सकें
और आईने में सब कुछ
हंसता मुस्कुराता नजर आये।
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पूनम