
गोबर से सने हाथों से
वो
फ़र्श को हैं लीपते
बड़ी तल्लीनता के साथ
नन्हें नन्हें हाथो को
वो चलाते
पर बीच बीच में
बेचैन हो उठते
पास के स्कूल से आती
बच्चों की आवाजें
घूमती हसरत भरी निगाहों से
उधर को वह देखते।
मन में नन्हें विचार पनपते
पर वह मन मसोस रह जाते
मन के सपनों मन में दबाये
फ़िर से अपने
काम में जुट जाते।
मां की आवाज पे दौड़े चले आते
मां की डांट
आंखों में आंसू है लाते
पर वो जुबान से न कुछ कह पाते
नन्हीं उंगलियों से फ़र्श को कुरेदते
मां की डांट कानों में पड़ती
पर उनके कानों में और
ही आवाजें हैं घूमती।
जो थीं बच्चों के पढ़ने की आवाजें
और फ़िर मन में
बस वो यही सोचते
क्या वह दिन कभी
उनके जीवन में आयेगा
जिससे वो अपने सपने साकार करेंगे।
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पूनम