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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

नन्हें सपने



गोबर से सने हाथों से

वो

फ़र्श को हैं लीपते

बड़ी तल्लीनता के साथ

नन्हें नन्हें हाथो को

वो चलाते

पर बीच बीच में

बेचैन हो उठते

पास के स्कूल से आती

बच्चों की आवाजें

घूमती हसरत भरी निगाहों से

उधर को वह देखते।

मन में नन्हें विचार पनपते

पर वह मन मसोस रह जाते

मन के सपनों मन में दबाये

फ़िर से अपने

काम में जुट जाते।

मां की आवाज पे दौड़े चले आते

मां की डांट

आंखों में आंसू है लाते

पर वो जुबान से न कुछ कह पाते

नन्हीं उंगलियों से फ़र्श को कुरेदते

मां की डांट कानों में पड़ती

पर उनके कानों में और

ही आवाजें हैं घूमती।

जो थीं बच्चों के पढ़ने की आवाजें

और फ़िर मन में

बस वो यही सोचते

क्या वह दिन कभी

उनके जीवन में आयेगा

जिससे वो अपने सपने साकार करेंगे।

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पूनम