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सोमवार, 7 सितंबर 2015

लाला जी की पगड़ी

लाला जी की पगड़ी गोल
पगड़ी के अंदर था खोल
पगड़ी में से निकला देखो
रूपया एक पचास पैसा।

हंसने लगे सभी बच्चे
बजा-बजा के ताली
लाला जी की पगड़ी
रहती खाली-खाली।


लाला जी शरम से
हो गये पानी-पानी
कंजूसी की उनकी
खुल गई थी कहानी।
0000000000
पूनम श्रीवास्तव


शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

बंदर जी की शादी


चल पड़े बाराती लेकर
अपने बंदर मामा
शेरवानी पहनी थी ऊपर
नीचे था पाजामा।

आगे आगे चले बाराती
पीछे मामा जी की कार
धूम धड़ाका बैण्ड बाजा
बजता रहता बार बार।

नाचते गाते चली बारात
पहुंची बंदरिया के द्वार
स्वागत हुआ सभी लोगों का
पूरा हुआ उनका व्यवहार।


जब आई जयमाल की बारी
बंदरिया थी छोटी गोरी
सोचे कैसे माला डालूं
लाल हुये थे गाल।

मामा ने देखा मामी को
चिंता से थी बेहाल
लगा जम्प बंदर मामा ने
डाल दिया वरमाल।
000

पूनम श्रीवास्तव

रविवार, 9 अगस्त 2015

चंदा मामा

चंदा मामा दिन बहुत हुए
बात न तुमसे होती है
आज और कल करते करते
मुलाकात न तुमसे होती है।


मां भी रोज बुलाती तुमको
दूध और भात खिलाने को
लुका छिपी खेलो बदली संग
पर नाम न लेते आने का।

रूठे रूठे क्यों लगते मुझसे
इतना तो बतला ही दो
हो गई हो गर गलती कोई
तो माफ़ी मुझको दे ही दो।

हंस कर बोले चंदा मामा
है सूरज के घर मेरी दावत
साथ साथ खेलेंगे कल हम
धमा चौकड़ी खूब करेंगे।

चंदा मामा दिन बहुत हुए
बात न तुमसे होती है।
000
पूनम श्रीवास्तव


गुरुवार, 13 नवंबर 2014

फ़रियाद

काली कोट में लाल गुलाब,
चाचा तुमको करते याद,
बाल दिवस हम संग मनायें,
बस इतनी सुन लो फ़रियाद।

बचपन क्यों अब रूठा रहता,
हर बच्चा क्यों रोता रहता,
आओ चाचा नेहरू आओ,
सारे जहां को तुम बतलाओ।

खेल खिलौने साथ छीन कर,
क्यूं सब हमें रुलाते हैं,
भारी बस्तों और किताबों,
में हमको उलझाते हैं।

क्या हमने कुछ गलत किया है,
जिसकी हमको सजा मिली है,
प्यारे थे सब बच्चे तुमको,
सुन लो इनकी ये फ़रियाद।

आओ चाचा नेहरू आओ,
जन्म दिवस हम संग मनाओ।
000

पूनम श्रीवास्तव

शुक्रवार, 2 मई 2014

मौसी की चालाकी

बिल्ली ने ये मन में ठाना
चूहों को है सबक सिखाना
खेल चुके घण्टी का खेल
अब मुझको है शंख बजाना।

बहुत विचार किया मौसी ने
शुरू किया फ़िर गाना गाना
जंगल के सारे जीवों को
लगी सिखाने ढोल बजाना।

चूहों को भी शौक लगा फ़िर
क्यूं ना सीखें हम भी गाना
भूल गये मौसी का गुस्सा
लगे सीखने ढोल बजाना।

मौसी मन ही मन मुस्काई
चूहों पर खुब प्यार लुटाई
जितने चूहे आते जाते
मौसी खाके गाती गाना।
0000
पूनम श्रीवास्तव


शनिवार, 29 मार्च 2014

ये भी तो कुछ कहते हैं-----

पड़ते कुल्हाड़े पेड़ों पर जब
उनके भी  आंसू बहते हैं
सोचो जरा इक बात तो आखिर
क्या वो भी हमसे कुछ कहते हैं?

जो हैं हमारे जीवन रक्षक
क्यूं हम उनके भक्षक बन जायें
जो जीवन को देने वाले हैं
उनके ही दुश्मन कहलायें।

काटने पर हम तुले हैं जिसको
शहर शहर और गांव गांव
आने वाले समय में फ़िर तो
मिलेगी न हमको उनकी छांव।

जो धरती का आंचल लहराये
पर्यावरण को सदा बचाए
धूप ठंढ बारिश को बचा के
मानव जीवन को हरसाए।

प्रकृति है जिससे हरी भरी
जो बादल से बारिश ले आते
जिनके कारण ही तो हम
नव जीवन हैं अपनाते।

आओ हम सब बच्चे मिल जाएं
फ़िर एक पेड़ न कटने पाये
जगह जगह पर पेड़ लगा कर
हरियाली वसुन्धरा पर लायें।
0000

पूनम

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

छुक छुक गाड़ी-----।

छुक छुक चलती रेलगाड़ी
पटरी पे दौड़े रेलगाड़ी।

दुनिया भर की सैर कराती
गांव बगीचे खेत दिखाती
धरती के हर रंग दिखाती
कड़ी धूप बारिश या ठण्ढक
कभी न रुकती रेलगाड़ी।

छुक छुक चलती रेलगाड़ी
पटरी पे दौड़े रेलगाड़ी।।

बच्चों को भाती रेलगाड़ी
सैर कराती रेलगाड़ी
अम्मा,बाबू,दीदी,भैया
गांव शहर के हर तबके का
वजन उठाती रेलगाड़ी।

छुक छुक चलती रेलगाड़ी
पटरी पे दौड़े रेलगाड़ी।।

गर्मी की छुट्टी में सबको
नानी दादी तक ले जाती
देश के हर कोने में दौड़े
नदिया पर्वत पीछे छोड़े
सीटी बजाती रेलगाड़ी।

छुक छुक चलती रेलगाड़ी
पटरी पे दौड़े रेलगाड़ी।।
000

पूनम

शनिवार, 5 मार्च 2011

चींटी की कोशिश






चींटी
चढ़ी पहाड़ पर


फ़िसलती गिरती बार-बार

जितना ही वो कोशिश करती

आ गिरती नीचे धाड़-धाड़ ।


दूर से देख रहा था बंदर

बैठा बैठा डाल पर

देख को चींटी को बेहाल

तरसा उसके हाल पर।


बोला ज़ोर से-ओ नन्हीं चींटी

क्यों करती कोशिश खाली पीली

गिर गयी जो तू नीचे

बचेगी ना फ़िर हड्डी पसली।


चढ़ना छोड़ पहाड़ पे तू

ये तेरे बस की बात नहीं

पहाड़ पे यूँ ही चढ़ जाना

इतना है आसान नहीं।


चींटी बोली –“बंदर भैया

क्यों मेरी हिम्मत गिराते हो?

कोशिश से ही मिलती मंज़िल

क्या तुम ये नहीं जानते हो?


बंदर बोला-कर लो कर लो

कोशिश चाहे लाखों बार

हाथ ना आयेगी मंज़िल

चाहे आज़मा लो फ़िर एक बार।


सुन चींटी को आया जोश

बोली अब तो ज़रूर चढ़ूँगी

चाहे जां चली ही जाये

चढ़ कर ही मैं दम लूँगी।


आखिर कोशिश दम लाई

चींटी खुशी से चिल्लाई

चढ़ी पहाड़,मैं जीत गयी

देख लिया बंदर भाई!


बंदर ने खुश हो दी बधाई

बात पते की तूने बताई

कोशिश नहीं जाती बेकार

समझ में मेरे अब आयी।

पूनम

सोमवार, 10 अगस्त 2009

बालगीत


आज मैं अपना एक बालगीत प्रकाशित कर रही हूं।

वैसे आप लोग मेरे अन्य बालगीत फ़ुलबगिया ब्लाग

पर पढ़ सकते हैं।

नाना जी की मूँछ

नाना जी की मूँछ
जैसे गिलहरी जी की पूंछ
अकड़ी रहती हरदम ऐसे
जैसे कोई रस्सी गयी हो सूख।
नाना जी मूँछों पर अपनी
हरदम देते ताव
पहलवान जी जैसे कोई
जीत गए हों दाँव।
कभी दाई मूँछ तो कभी बांई फ़ड़कती
कभी ऊपर उठती कभी नीचे गिरती
दरोगा की मूँछ भी
उनके आगे पानी भरती ।
नाना जी की मूँछ हरदम
ऐंठन में ही रहती
शान न गिरने पाए कभी
हरदम कोशिश करती ।
नाना जी की मूँछ की
गली गाँव में पूछ
फ़ेल हो गई उनके आगे
नत्थू राम की मूँछ ।
0000
पूनम