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शनिवार, 18 जनवरी 2014

जिन्दगी----।

कहते हैं जिसे जिन्दगी उस जिन्दगी को ढूंढते हैं।
पोंछते हैं अश्कों को जीने का बहाना ढूंढ़ते हैं॥

खामोश है जुबान पर दिल ये रोता है।
कांटों भरी डगर पर हंसने का बहाना ढूंढ़ते हैं।।

थाम ले कोई हाथ जिस राह से भी गुजरे हम।
हम सफ़र मिल जाय सफ़र का बहाना ढूंढ़ते हैं॥

चाहत हर किसी की होती नहीं पूरी फ़िर भी
कोशिश का बहाना,खुदा के पास ढूंढ़ते हैं।।
000
पूनम


शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

कुछ लघु कवितायें


(एक)

वह मशक्कत कर रहा

था जी तोड़

सिर्फ़ दो जून की रोटी

के लिए

बदले में पाता था

वह कम पैसे और

ज्यादा मांगने पर

गालियां बेशुमार।

000

(दो)

वो बेशर्म हो के

निकली आज

अपने घर से

कल तक जिसे हम

हया रूप कहते थे।

000

(तीन)

उसकी पेशानी पर

पड़ रही थी

धूप की रुपहली

किरणें जिन्हें वह

अपनी मुटठियों में बंद करने की

कोशिश कर रहा था

भान नहीं था उसे कि

वह एक छालावा है।

000

(चार)

खेल खेल रहा था

वो आग से

मौत का कुआं

जिसमें वह कूद रहा था

अपनी जिन्दगी को

दांव पर लगाकर

अपने परिवार की

पेट की आग

बुझाने के लिये

पर वाह री तकदीर

आग उसकी जिन्दगी से खेल गई।

000

(पांच)

रात के गहन सन्नाटे में

मैं सोते से

जाग पड़ी किसी की

सुनकर चीख

पर वो अंधेरे

में ही

दबा दी गई।

000

(छः)

देख आसमानी

फ़िजाओं को तेरी

याद आती है बहुत

जाने कब ये अपना

रुख बदल दे

जल्दी से आ

जाओ ना।

000

पूनम