शनिवार, 13 दिसंबर 2008

वह गुडिया


छोटी सी उम्र में कमाने लग जाती है,
वो नन्हीं सी गुडिया सयानी बन जाती है।

नन्हीं सी जुबान है पर बातें हैं बड़ी बड़ी,
वो नन्हीं सी गुडिया बतियाने लग जाती है।

औरों की उतरन पहन कर भी खुश,
वो नन्हीं सी गुडिया इतराने लग जाती है।

तरेरती हुई आँखों से थोड़ा सा सहम जाती,
वो नन्हीं सी गुडिया फ़िर काम पर लग जाती है।

हाथों में लाडलों के बैग व किताब देख के,
वो नन्हीं सी गुडिया पढाना सीख जाती है।

काम को करते हुए बातें की इधर उधर,
वो नन्हीं सी गुडिया सबकी मुखबिर बन जाती है।

लोगों के देख के रंग ढंग और संग,
वो नन्हीं सी गुडिया सपने सजाने लग जाती है।

खेलने की उम्र में ही सीखने की उम्र में ही ,
वो नन्हीं सी गुडिया दादी अम्मा बन जाती है।
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पूनम


एक कौर


माँ प्यार से बच्चे को
फुसला रही है
बस एक कौर और ये कह कर
खिला रही है.

पास ही हम उम्र बच्चा
झाडू लगाता जाता
मां बेटे के खेल को
अचम्भे से निहारता.

क्योंकि उसे तो याद नहीं आता
कभी उसकी मां ने भी उसे
खिलाया हो ऐसे खाना.

उसे तो याद रहता है हरदम
मां ने एक रोटी को
छः टुकडों में बांटा
और मांगने पर देती है एक चांटा.

और कहती है बस
पेट को ज्यादा न बढ़ा
लगी है पेट में इतनी ही आग
तो जा एक घर और काम पकड़.
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पूनम

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

भूख


भूख ऐसी ही तो होती है,
जो आव देखती है न ताव,


बस झपट ही तो पड़ती है,
कभी गन्दगी के ढेर में


तो कभी छप्पन भोगों की थाल में
तो कभी बाजारों व कोठों की रौनकों में


फर्क सिर्फ़ इतना है भूख मिटने पर कोई कहता है वाह!!!
तो किसी के दिल से निकलती है आह!!!
००००००००००
पूनम

सोचा न था


हम तो तेरे दिल से उतर जाएँगे ऐसे,
जैसे जिल्द पुरानी किताबों से उतर जाती है,
ये तो सोचा ही न था.

थाम के हाथ हम तो चले सीधी डगर,
राह में नागफनियाँ भी बहुत होती हैं,
ये तो सोचा ही न था.

आंख से आंसू जो टपके तो बने मोती,
ऐसी बातें तो ख्वाबों में ही होती हैं हकीकत में नहीं,
ये तो सोचा ही न था.

कल था क्या और आज हुआ क्या है,
पल ही पल में तकदीर बदल जाती है,
ये तो सोचा ही न था.
०००००००००
पूनम

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

आग


हर तरफ़ लगी है
ये कैसी आग
जाने इस आग में
क्या है बात.

जो चारों तरफ़ अपना
मुंह लपलपा रही है
हर गली हर नुक्कड़
और हर चौराहे पर
यह अपना विकराल रूप
दिखला रही है
यहाँ तक कि समाज के
पूरे अस्तित्व को ही यह आग
एक फन काढे
भयानक नाग की तरह
अपने अंतहीन पेट में
लीलती ही चली जा रही है.

चाहे पेट में
आग लगाने की आग हो
चाहे पेट की आग
बुझाने की आग हो
चाहे रिश्तों में
नफरत बढ़ाने की आग हो
चाहे इन्सान द्वारा
इन्सान को जलाने की आग हो

आग तो बस आग है
जो सिर्फ़ जलना और जलाना ही जानती है.
००००००

पूनम





मौत के साए में


मौत के साये में
जिंदगी कर रही सफर
जी रही है जिंदगी
हर वक्त डर डर कर.

पल में जाने क्या हो जाए
किसको है ख़बर
गूँज धमाकों की
उठी भी तो सहमकर
कहीं बरसती गोलियां
जवानों पे गरज कर.

जर्रा जर्रा देश का
कांपता थर थर
दहशत से फैलीं ऑंखें
देख ये मंजर.

साँस लेती जिंदगी
बस एक आस पर
ख़त्म होगा इंतजार
जीत होगी मौत पर.

फ़िर चल पड़ेगा कारवां
एक जुट होकर
सपने सजेंगे आंखों में
मुस्कराहट होठों पर.
०००००००००००
पूनम


बुधवार, 3 दिसंबर 2008

तूफानों को .....


समुन्दर में तूफानों को उठते हुए देखा,
नदी तालों को भी उफनाते हुए देखा,
अश्क से दामन को भिगोते हुए देखा,
पर उस पर लगे दाग को मिटते नहीं देखा.

जिंदगी को जिन्दादिली से जीते देखा,
मौत को भी हंस कर गले लगाते देखा,
जिंदगी से मौत की टकराहट देखा,
पर जिंदगी व मौत को साथ निभाते नहीं देखा.

दोस्त को दुश्मन के गले लगते देखा,
पीठ में छुरा उन्हें भोंकते देखा,
गम के अंधेरों में दोनों को सिसकते देखा,
नदी के दो पाटों की तरह दिल को मिलते नहीं देखा.

चाँद तारों को जमीन पर उतरते देखा,
पंख परवाजों को आसमान को छूते देखा ,
धरती में ही स्वर्ग कहीं बनते हुए देखा,
अम्बर को धारा से मिलते नहीं देखा.

हमने बचपन भी देखा पचपन भी देखा,
बीती हुयी जिंदगानी देखा,
बहती हुयी रवानी देखा,
पर कहते हैं जिसे किस्मत उसको ही नहीं देखा.
……………….
पूनम