
लफ़्ज आ आ के जुबां पे ठहर जाते हैं
कुछ कहने से पहले ही अश्क छलक जाते हैं।
जब भी करती हूं बात करने की कोशिश
या खुदा होंठ थरथरा के ही रह जाते हैं।
ऐसा होता है क्यों ये समझ पाती नहीं
धड़कनें भी दिल की धड़कते ही रह जाते हैं।
पहले खुद को आजमाती हूं ये कमी है क्या कोई
पर ये बातें तो अपने ही बता पाते हैं।
जब भी होगी मुलाकातें उनसे बातें तो होंगी हीं
बात दिल की वो मेरी नजरों से समझ जाते हैं।
बातें दो चार करके जब मैं उनसे लेती हूं रुखसत
कदम आगे न बढ़ के यूं पीछे को ही मुड़ जाते हैं।
पलटती हूं तो उनकी नजरें भी होती हैं इधर ही
शायद इसको ही दिल की लगी कहते हैं।
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पूनम