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शनिवार, 16 जून 2012

गज़ल


तुम्हारी याद मे आंसू आंखों से छलकते हैं,
सावन के बारिश ज्यूं मेघों से बरसते हैं।

तुम जो गये तो बस दिल ही टूट गया,
वो जिगर कहाँ से लाऊँ जो पत्थर के होते हैं।

चौबीस पहर तस्वीर तेरी इन आंखों में बसती हैं,
मिटाऊँ कैसे उनको जो नज़रों से ओझल नही होते हैं।

दिलासा देते तो जाते हो की जल्दी ही आऊँगा,
और हम इन्तज़ार में पल-पल फ़िर गिनने लगते हैं।

बिन तुम्हारे ज़िंदगी अधूरी सी लगती है,
अब के आकर ना जाना वादा इक तुमसे लेते हैं।

आयेगा खत का जवाब यही ख्वाब देखते हैं,
इसी उम्मीद को दामन से लिये हम तो जीते हैं।
000
पूनम

रविवार, 27 मार्च 2011

रुसवाई


जमाने ने रुसवा किया है मगर

हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है।

बद अच्छा बदनाम बुरा

ये जुमला उन्हीं की अमानत रही है।

कदम दर कदम हमें धोखा दिया

ये हमेशा से उनकी फ़ितरत रही है।

न समझा जमाने ने मुझको जरा भी

न ही समझने कि उसे फ़ुर्सत रही है।

जहां में अकेले हमीं तो नहीं

जिसे दर्द सहने की आदत नहीं है।

शिकवा करे किसी से भी क्यों

जब खुदा की ही हम पर इनायत नहीं है।

000

पूनम

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

मुस्कुराहट


किसी की बेबसी पर मत हंसो इतना

कि बेबसी को भी इक दिन तूम पर न तरस आये।

गम के आंसुओं में मत डुबाओ किसी को इस कदर

कहीं इक दिन तुम्हारा भी दामन न उसमें तर जाये।

मत खोदो मौत के गड्ढे किसी के लिये भी तुम

कहीं खुद तुम्हारे ही पांव न उसमें धंस जायें।

किसी के प्यार का सिला इतनी नफ़रत से न दो

कहीं वो अंजाम तुम्हारे ही साथ न हो जाये।

बस प्यार भरा दिल रख ज़रा देख लो इतना

तुम्हारी मुस्कुराहट से ही किसी की ज़िन्दगी संवर जाये।

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पूनम

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

खोया अतीत


लोगों की भीड़ में खो गया है जो कहीं

आज भी मैं ढूँढता हूँ अपने उस मकान को।

अरसे पहले जिसे छोड़ कर चला गया था

आज देखता हूँ मैं शहर में बदले अपने गाँव को।

कुछ निशानियाँ थीं मशहूर जो मेरे घर की

उनकी जगहों पर पाता हूँ लम्बी लम्बी इमारतों को।

पुरवैया बहती थी जो मेरे घर के सामने

ढूँढ रहीं नज़रें मेरी उस नीम की ठंडी छांव को।

गप्प लड़ाया करते थे जहाँ खड़े खड़े यार सभी

आज आ गये आँख में आँसू याद कर उन शामों को।

चच्चा के नाम से थे मशहूर जो मेरे घर के दाहिने

खोजती हैं नज़रें उनकी पान की दुकान को।

देखते ही देखते मानो सब कुछ बदल गया

खड़ा हूँ अचम्भे से देख दुनिया के बदलते रंग को।

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पूनम

शनिवार, 18 सितंबर 2010

दिल की लगी

लफ़्ज आ आ के जुबां पे ठहर जाते हैं

कुछ कहने से पहले ही अश्क छलक जाते हैं।

जब भी करती हूं बात करने की कोशिश

या खुदा होंठ थरथरा के ही रह जाते हैं।

ऐसा होता है क्यों ये समझ पाती नहीं

धड़कनें भी दिल की धड़कते ही रह जाते हैं।

पहले खुद को आजमाती हूं ये कमी है क्या कोई

पर ये बातें तो अपने ही बता पाते हैं।

जब भी होगी मुलाकातें उनसे बातें तो होंगी हीं

बात दिल की वो मेरी नजरों से समझ जाते हैं।

बातें दो चार करके जब मैं उनसे लेती हूं रुखसत

कदम आगे न बढ़ के यूं पीछे को ही मुड़ जाते हैं।

पलटती हूं तो उनकी नजरें भी होती हैं इधर ही

शायद इसको ही दिल की लगी कहते हैं।

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पूनम