चांद
को देखा कुछ गुमसुम उदास है।
चांदनी
भी शायद कुछ रूठी आज है॥
तभी
बादलों में उसने मुंह छुपा लिया था॥
कर
लिया क्यों उसने अंधेरी रात है॥
टिमटिमाते
तारे भी लगे खोये खोये से।
चांद
के बिना नहीं चांदनी साथ है॥
मैं
भी उदास गुमसुम सी उसको निहारती रही।
वो शायद समझ गया मेरे दिल की बात है॥
दूर
से ही सही वो मुझको तसल्ली दे रहा था।
यूं
लगा कि कोई अपना अपने पास है॥
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पूनम
श्रीवास्तव
