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बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

उम्मीदें


दिल में तूफ़ानों का सैलाब है मगर
फ़िर भी होठों पर हसीं-मुस्कान लिये हैं।

नाव मझधार में फ़ंसी है मगर
फ़िर भी उम्मीदों की पतवार लिये हैं।

शरीर थक रहा है धीरे धीरे मगर
फ़िर भी अरमानों का आगाज लिये हैं।

भीगी भीगी आंखों से देख रही राह मगर
फ़िर भी वो आएगा या नहीं इंतजार लिये हैं।
000
पूनम





बुधवार, 23 जनवरी 2013

उड़ान


कुछ परिन्दों का दीदार कर लूं तो चलूं
सपनों को थोड़ा उड़ान दे दूं तो चलूं।

उड़ने से पहले ही पर कट न जाय कहीं
उनको कटने से बचा लूं तो चलूं।

झुग्गी झोपड़ियों में बहती है नीर की धारा
उनके आंसुओं को जरा पोंछ लूं चलूं।

उम्मीदों के दीप जो जलाए हैं हमने
उन्हें औरों तक पहुंचा दूं जरा तो चलूं।

कुछ पुण्य किये हैं तो पाप भी बहुत हमने
खुदा की इबादत कर लूं जरा तो चलूं।
000
पूनम



शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

कह दो हर दिल से-----



कह दो दिलों से आज कि इक दिल ने आवाज दी है
बन जाओ सहारे उनके जो कि बेसहारा हैं।

गुलामी की वो जंजीरें जो टूटी नहीं हैं अब तलक
तोड़ दो उन पाबन्दियों को जिन पर हक़ तुम्हारा है।

बड़ी फ़ुरसत से वो इक शै बनाई है खुदा ने
वो तुम इंसान ही तो हो जिसे उसने संवारा है।

वक़्त कब किसका बना है आज तलक हम कदम
करो ना इन्तजार उसका जो कि नहीं तुम्हारा है।

करने से पहले नेकी का अंजाम ना सोचो
समझो कि हर बात में उसका ही इशारा है।
000
पूनम





शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

गज़ल


खाली बोतल जाम है खाली,बन्द पड़े सारे मयखाने
कष्ट बड़ा जीवन में है रब,टूट गये सारे पैमाने।

सबकी देहरी घूम के देखा,सबके अपने हैं अफ़साने
दुख की घड़ियां गिनता कोई,कोई बुनता नये ठिकाने।

तिनका तिनका जोड़ के इक दिन,पूरे हुये थे मेरे सपने
वक्त ने करवट ऐसी कुछ ली,अपने तिनके हुये बेगाने।

हवा यहां कुछ ऐसी बहकी,कोई अपने खून को ना पहचाने
जान चुका था मै भी तब तक,निकले ही थे वो उड़ जाने।

जैसे भटका हुआ मुसाफ़िर,लौट ही आता अपने ठिकाने
अपनी क़िस्मत कब बदलेगी,हम भी देते रब को ताने।
              000
पूनम

शनिवार, 4 अगस्त 2012

गज़ल


आज अपने ही शहर में
बन के मेहमां हम खड़े हैं
देख के हालत ये अपनी
बेकसी से रो पड़े हैं।

हंस के जो मिलते थे पहले
आज परदे में छुपे हैं
एक सिक्के के दो पहलू
सामने मेरे पड़े हैं।

सूर्य के रथ की धुरी सी
चल रही थी ज़िन्दगी
राहु बन कर के वो मेरा
रास्ता रोके खड़े हैं।

पहचान की हर सरहदों को
काट कर मीठी छुरी से
देखते हैं वो तमाशा
किस डगर पर हम खड़े हैं।

आज अपने ही-----।
0000

पूनम

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

सीख

जला जला कर खुद को,खाक करते हो क्यूं।
ज़िन्दगी अनमोल खजाना,जीना तो सीख लो।

देख कर औरों की खुशियां कुढ़ते हो क्यूं
गैरों की खुशी में भी,हंसना तो सीख लो।

रास्ते मंजिलों के,आसान ढूंढ़ते हो क्यूं
मुश्किलों का सामना,करना तो सीख लो।

छूने को आसमान की हद,कोशिश करो जरूर
पहले पांव को जमीं पर,जमाना तो सीख लो।

अपने को गैरों से,ऊंचा समझते हो क्यूं
एक बार खुद को भी कभी,आंकना तो सीख लो।

तक़दीर को ही हर कदम पर,कोसते हो क्यूं
रह गई कमी कहां पे है,जानना तो सीख लो।

कर के भरोसा दूसरों पे,पछताते हो क्यूं
बस हौसला बुलंद करना,खुद का तो सीख लो।

बात सिर्फ़ इतनी सी है,जीवन फ़कत पाना ही क्यूं,
खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लो।
 000
पूनम


रविवार, 3 जून 2012

रूठा चांद



चांद को देखा कुछ गुमसुम उदास है।
चांदनी भी शायद कुछ रूठी आज है॥

तभी बादलों में उसने मुंह छुपा लिया था॥
कर लिया क्यों उसने अंधेरी रात है॥

टिमटिमाते तारे भी लगे खोये खोये से।
चांद के बिना नहीं चांदनी साथ है॥

मैं भी उदास गुमसुम सी उसको निहारती रही।
वो शायद समझ गया मेरे दिल की बात है॥

दूर से ही सही वो मुझको तसल्ली दे रहा था।
यूं लगा कि कोई अपना अपने पास है॥
000
पूनम श्रीवास्तव

गुरुवार, 3 मई 2012

सफ़र


जिंदगी का सफ़र आसान है मगर,
मुश्किलों की भी कोई कमी तो नहीं।

फ़ूलों से भरी ये डगर है मगर,
कांटों की भी कोई कमी तो नहीं।

पंख देना अरमानों को आसान है मगर,
पर कतरने वालों की भी कमी तो नहीं।

मंजिल को पाना आसान है मगर,
हौसलों में हो गर कोई कमी तो नहीं।

ख्वाब पूरे हो जायें यूं जिंदगी के अगर,
मौत भी आ जाए तो कोई गम तो नहीं।
000
पूनम

बुधवार, 21 मार्च 2012

गज़ल


ज़मीं पे सितारे बहुत से दोस्तों

मगर कोई कोई ही बनता आफ़ताब दोस्तों।

सवालों से जूझते हैं बहुत ही मगर

हर सवाल का मिलता नहीं जवाब दोस्तों।

मयखाने में मिलती है मय ही मगर

हर महफ़िल में आता नहीं शबाब दोस्तों।

दिल का लगाना यूं तो आसान काम है

निभाने को हर कोई नहीं बेताब दोस्तों।

मुहब्बतों का सिलसिला तो चलता ही रहेगा

गिनती करूं कितनी है बेहिसाब दोस्तों।

तारीफ़ होती है उसी की जो आता है नज़र

नज़रों से हट के देखे वो है लाजवाब दोस्तों।

पुराने दोस्तों का अब भी होता है जिकर

आंखों से बहते अश्कों के सैलाब दोस्तों।

चाहती हूं बस तबस्सुम सभी के लबों पर

दोस्तों की दोस्ती को आदाब दोस्तों।

----

पूनम

बुधवार, 7 सितंबर 2011

सिसकते शब्द



तन्हाई के आलम में रहते रहते

शब्द भी मेरे बिखर के रह गये।

सोच की धरा पर जो भावों के पुल बने मेरे

शब्द पानी पर नदी के उतराते जैसे रह गये।

दरवाजे पर दस्तक से दिल धड़क धड़क उठे

कौन हो सकता है बेवक्त बस लरज के रह गये।

इन्सान को सही इन्सां समझना है बड़ा मुश्किल

मन ही मन में इसका हल ढूंढ़ते रह गये।

भरोसा भी करें तो कैसे और किस पर हम

सफ़ेदपोश में छुपे चेहरे असल दंग हम रह गये।

उड़ान मारते आसमां में देखा जो परिन्दों को

पिंजरे में बन्द पंछी से फ़ड़फ़ड़ा के रह गये।

मत लगाओ बन्दिशें इतनी ज्यादा

हम गुजारिश पर गुजारिशें ही करते रह गये।

सच्चाई को दफ़न होते देखा है हमने

झूठ का डंका बजा पांव जमीं से खिसक गये।

सन्नाटा पसरा रहता सहमी रहती गली गली

हम झरोखे से अपने झांक के ही रह गये।

जल रहे हैं आशियाने हंस रहे हैं मयखाने

सियासती दांव पेंचों में शब्द सिसक के रह गये।

झिलमिलाते तारों संग जो आसमां पे पड़ी नजर

हो खूबसूरत ये जहां भी चाहत लिये ही रह गये।

00000

पूनम

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

सीख


जला जला कर खुद को,खाक करते हैं क्यों

ज़िन्दगी अनमोल खज़ाना,जीना तो सीख लें।

देख कर औरों की खुशियाँ,कुढ़ते हैं क्यों

गैरों की खुशी में भी, हँसना तो सीख ले॥

रास्ते मंज़िलों के आसान ढ़ूँढ़ते हैं क्यों

मुश्किलों का सामना करना तो सीख लें।

छूने को ऊँचाई आकाश की कोशिश तो करें ज़रूर

पर पहले पाँव को ज़मीं पे जमाना तो सीख लें।

अपने को गैरों से ऊँचा समझते हैं क्यों

एक बार खुद को भी आँकना तो सीख लें।

तकदीर को ही हर कदम पर कोसते हैं क्यों

रह गई कमी कहाँ जानना तो सीख लें।

करके भरोसा दूसरों पर पछताते हैं क्यों

बस हौसला बुलंद करना खुद का तो सीख लें।

ज़िन्दगी का नाम सिर्फ़ पाना ही क्यों

खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लें।

000

पूनम

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

बन जाओ अफ़साना


तुम गीत गज़ल बन करके

मेरे सपनों में आना

मैं शब्द शब्द बन जाऊंगी

तुम बनना नया तराना।

मैं सुर संगम बन जाऊंगी

तुम तान सुरीली गाना

मैं मधुर कण्ठ से गाऊंगी

तुम लयबद्ध हो जाना।

मैं प्रेम मग्न हो जाऊंगी

तुम भी साथ निभाना

मैं बनूंगी मीरा राधा

तुम कृष्ण मेरे बन जाना।

मैं बनूंगी शृंगार का प्याला

तुम उसमें डूब जाना

मैं बनूंगी तुम्हारी शमा

तुम बन जाना परवाना।

मैं नहीं बनूंगी ऐसी शमा

अकेले ही जल जाऊं

वादा है इक तुमसे

तुम मेरे संग जल जाना।

तब देखेगी ये दुनिया

जोड़ी ये गीत गज़ल की

हम भी बन जायेंगे फ़िर

एक नया अफ़साना।

000

पूनम

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

हाशिये पर जिन्दगी


अपने अरमानों की अर्थी

खुद ही लिये फ़िरते हैं

कौन है जो अब

कांधा देने को मिले।

कोई मौत खुदी होती है

कोई बेमौत मारा जाता है

बाकी है कौन,किसी को

जो कफ़न ओढ़ाने को मिले।

पल दो पल का साथ

यारा हंस के बिता ले

जाने मिलने का क़्त

फ़िर मिले ना मिले॥

अपने मिलते हैं गले

प्यार से अपने बन के

निकले जो बोल मधुर मुख से

पीठ पे चाहे छुरी ही मिले।

चन्द लम्हों की ये जिन्दगी

जो खुदा की दी अमानत है

कर ले थोडी बन्दगी,क्या पता

कौन सी गोली दिल चीर के निकले

अपना किसको कहें अब

ये दुनिया वालों

जब हाशिये पर ही है जिन्दगी

जाने कब किसको छले।

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पूनम

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

आंसुओं के नाम


इन आंसुओं को नाम क्या दूं दोस्तों
जिन्होंने धोखा हर बार दिया है
वक्त को पल में बदल देते हैं जो
इन्होंने अपना रूप हजार किया है।

अछूता नहीं कोई इनसे जहां में
सभी का इनसे पड़ता है वास्ता
कहीं खुशी के इजहार में छलके आंसू
तो कभी गम में भी बरसात किया है।

तराजू के पलड़ों पर
इनका भार इतना ज्यादा
कि सच और झूठ में अन्तर क्या
सभी को इसने भरमा दिया है।

कहीं झूठ को चीर कर आंसुओं ने
सचाई को सामने ला दिया है
कहीं पर नकाब ओढ़कर झूठ का
सचाई को ही धोखे में डाल दिया है ।

कभी तो आंसुओं में इतनी ताकत
कि पत्थर को मोम बना दिया है
और कभी आंसू ही बन के पत्थर
घावों से दिलों को भर दिया है

लाख तूफ़ां को सहते हुये भी जिसने
खुशी का ही सागर छलकाया है
कभी बन के प्रेम का दरिया ये
कहीं नफ़रत का बीज भी बोया है।

है आंसू खुद में इतनी बड़ी हस्ती
जो मिटा सके पल में सारी ही बस्ती
अपने इसी बल पर तो ही इसने
कितने दिलों पर राज किया है।

वक्त बेवक्त बह कर इन आंसुओं ने
नाम खुदा के भी फ़रेब किया हैं
इसीलिये लोगों ने शायद इन्हें
घड़ियाली आंसू का नाम दिया है।
00000
पूनम

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

गज़ल-जमीं से आसमा तक


आज हम छूने चले हैं आसमां को
पर सहारा तो जमीं का चाहिये।

लाख मोड़ लें रुख चाहे जिधर भी
पर अन्त में किनारा तो नदी को चाहिये।

चाहे कितने भी बड़े हो जायें हम फ़िर भी
लोरी सुनने के लिये इक गोद मां की चाहिये।

कुछ भी पाने के लिये सोच ऊंची है जरूरी
मिल जाये कितनी शोहरत मन न बढ़ना चाहिये।

हमें मिले जो संस्कार हैं बुजुर्गों की निशानी
गर पड़ें कमजोर तो सम्बल इन्हीं का चाहिये।

है बहुत आसान कीचड़ उछालना दूसरों पर
पर पहले खुद पे भी एक नजर डाल लेना चाहिये।
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पूनम