बुधवार, 20 फ़रवरी 2013
बुधवार, 23 जनवरी 2013
उड़ान
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012
कह दो हर दिल से-----
शुक्रवार, 14 सितंबर 2012
गज़ल
शनिवार, 4 अगस्त 2012
गज़ल
मंगलवार, 17 जुलाई 2012
सीख
रविवार, 3 जून 2012
रूठा चांद
गुरुवार, 3 मई 2012
सफ़र
बुधवार, 21 मार्च 2012
गज़ल

ज़मीं पे सितारे बहुत से दोस्तों
मगर कोई कोई ही बनता आफ़ताब दोस्तों।
सवालों से जूझते हैं बहुत ही मगर
हर सवाल का मिलता नहीं जवाब दोस्तों।
मयखाने में मिलती है मय ही मगर
हर महफ़िल में आता नहीं शबाब दोस्तों।
दिल का लगाना यूं तो आसान काम है
निभाने को हर कोई नहीं बेताब दोस्तों।
मुहब्बतों का सिलसिला तो चलता ही रहेगा
गिनती करूं कितनी है बेहिसाब दोस्तों।
तारीफ़ होती है उसी की जो आता है नज़र
नज़रों से हट के देखे वो है लाजवाब दोस्तों।
पुराने दोस्तों का अब भी होता है जिकर
आंखों से बहते अश्कों के सैलाब दोस्तों।
चाहती हूं बस तबस्सुम सभी के लबों पर
दोस्तों की दोस्ती को आदाब दोस्तों।
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पूनम
बुधवार, 7 सितंबर 2011
सिसकते शब्द

शब्द भी मेरे बिखर के रह गये।
सोच की धरा पर जो भावों के पुल बने मेरे
शब्द पानी पर नदी के उतराते जैसे रह गये।
दरवाजे पर दस्तक से दिल धड़क धड़क उठे
कौन हो सकता है बेवक्त बस लरज के रह गये।
इन्सान को सही इन्सां समझना है बड़ा मुश्किल
मन ही मन में इसका हल ढूंढ़ते रह गये।
भरोसा भी करें तो कैसे और किस पर हम
सफ़ेदपोश में छुपे चेहरे असल दंग हम रह गये।
उड़ान मारते आसमां में देखा जो परिन्दों को
पिंजरे में बन्द पंछी से फ़ड़फ़ड़ा के रह गये।
मत लगाओ बन्दिशें इतनी ज्यादा
हम गुजारिश पर गुजारिशें ही करते रह गये।
सच्चाई को दफ़न होते देखा है हमने
झूठ का डंका बजा पांव जमीं से खिसक गये।
सन्नाटा पसरा रहता सहमी रहती गली गली
हम झरोखे से अपने झांक के ही रह गये।
जल रहे हैं आशियाने हंस रहे हैं मयखाने
सियासती दांव पेंचों में शब्द सिसक के रह गये।
झिलमिलाते तारों संग जो आसमां पे पड़ी नजर
हो खूबसूरत ये जहां भी चाहत लिये ही रह गये।
00000
पूनम
रविवार, 10 अक्टूबर 2010
सीख

जला जला कर खुद को,खाक करते हैं क्यों
ज़िन्दगी अनमोल खज़ाना,जीना तो सीख लें।
देख कर औरों की खुशियाँ,कुढ़ते हैं क्यों
गैरों की खुशी में भी, हँसना तो सीख ले॥
रास्ते मंज़िलों के आसान ढ़ूँढ़ते हैं क्यों
मुश्किलों का सामना करना तो सीख लें।
छूने को ऊँचाई आकाश की कोशिश तो करें ज़रूर
पर पहले पाँव को ज़मीं पे जमाना तो सीख लें।
अपने को गैरों से ऊँचा समझते हैं क्यों
एक बार खुद को भी आँकना तो सीख लें।
तकदीर को ही हर कदम पर कोसते हैं क्यों
रह गई कमी कहाँ जानना तो सीख लें।
करके भरोसा दूसरों पर पछताते हैं क्यों
बस हौसला बुलंद करना खुद का तो सीख लें।
ज़िन्दगी का नाम सिर्फ़ पाना ही क्यों
खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लें।
000
पूनम
बुधवार, 6 अक्टूबर 2010
बन जाओ अफ़साना

तुम गीत गज़ल बन करके
मेरे सपनों में आना
मैं शब्द शब्द बन जाऊंगी
तुम बनना नया तराना।
मैं सुर संगम बन जाऊंगी
तुम तान सुरीली गाना
मैं मधुर कण्ठ से गाऊंगी
तुम लयबद्ध हो जाना।
मैं प्रेम मग्न हो जाऊंगी
तुम भी साथ निभाना
मैं बनूंगी मीरा राधा
तुम कृष्ण मेरे बन जाना।
मैं बनूंगी शृंगार का प्याला
तुम उसमें डूब जाना
मैं बनूंगी तुम्हारी शमा
तुम बन जाना परवाना।
मैं नहीं बनूंगी ऐसी शमा
अकेले ही जल जाऊं
वादा है इक तुमसे
तुम मेरे संग जल जाना।
तब देखेगी ये दुनिया
जोड़ी ये गीत गज़ल की
हम भी बन जायेंगे फ़िर
एक नया अफ़साना।
000
पूनम
गुरुवार, 5 अगस्त 2010
हाशिये पर जिन्दगी

अपने अरमानों की अर्थी
खुद ही लिये फ़िरते हैं
कौन है जो अब
कांधा देने को मिले।
कोई मौत खुदी होती है
कोई बेमौत मारा जाता है
बाकी है कौन,किसी को
जो कफ़न ओढ़ाने को मिले।
पल दो पल का साथ
यारा हंस के बिता ले
जाने मिलने का वक़्त
फ़िर मिले ना मिले॥
अपने मिलते हैं गले
प्यार से अपने बन के
निकले जो बोल मधुर मुख से
पीठ पे चाहे छुरी ही मिले।
चन्द लम्हों की ये जिन्दगी
जो खुदा की दी अमानत है
कर ले थोडी बन्दगी,क्या पता
कौन सी गोली दिल चीर के निकले
अपना किसको कहें अब
ये दुनिया वालों
जब हाशिये पर ही है जिन्दगी
जाने कब किसको छले।
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पूनम
सोमवार, 28 दिसंबर 2009
आंसुओं के नाम
जिन्होंने धोखा हर बार दिया है
वक्त को पल में बदल देते हैं जो
इन्होंने अपना रूप हजार किया है।
अछूता नहीं कोई इनसे जहां में
सभी का इनसे पड़ता है वास्ता
कहीं खुशी के इजहार में छलके आंसू
तो कभी गम में भी बरसात किया है।
तराजू के पलड़ों पर
इनका भार इतना ज्यादा
कि सच और झूठ में अन्तर क्या
सभी को इसने भरमा दिया है।
कहीं झूठ को चीर कर आंसुओं ने
सचाई को सामने ला दिया है
कहीं पर नकाब ओढ़कर झूठ का
सचाई को ही धोखे में डाल दिया है ।
कभी तो आंसुओं में इतनी ताकत
कि पत्थर को मोम बना दिया है
और कभी आंसू ही बन के पत्थर
घावों से दिलों को भर दिया है
लाख तूफ़ां को सहते हुये भी जिसने
खुशी का ही सागर छलकाया है
कभी बन के प्रेम का दरिया ये
कहीं नफ़रत का बीज भी बोया है।
है आंसू खुद में इतनी बड़ी हस्ती
जो मिटा सके पल में सारी ही बस्ती
अपने इसी बल पर तो ही इसने
कितने दिलों पर राज किया है।
वक्त बेवक्त बह कर इन आंसुओं ने
नाम खुदा के भी फ़रेब किया हैं
इसीलिये लोगों ने शायद इन्हें
घड़ियाली आंसू का नाम दिया है।
00000
पूनम
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
गज़ल-जमीं से आसमा तक
पर सहारा तो जमीं का चाहिये।
लाख मोड़ लें रुख चाहे जिधर भी
पर अन्त में किनारा तो नदी को चाहिये।
चाहे कितने भी बड़े हो जायें हम फ़िर भी
लोरी सुनने के लिये इक गोद मां की चाहिये।
कुछ भी पाने के लिये सोच ऊंची है जरूरी
मिल जाये कितनी शोहरत मन न बढ़ना चाहिये।
हमें मिले जो संस्कार हैं बुजुर्गों की निशानी
गर पड़ें कमजोर तो सम्बल इन्हीं का चाहिये।
है बहुत आसान कीचड़ उछालना दूसरों पर
पर पहले खुद पे भी एक नजर डाल लेना चाहिये।
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पूनम