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गुरुवार, 30 जून 2016

बरसो बदरवा

घनन घनन अब बरसो बदरवा
धरती का हियरा तड़पत है
खेतिहर की अंखियां हरदम
अंसुअन से अब भीगत हैं।

राह निहारे पंख पसारे
पाखी एकटक देखत हैं
अब बरसोगे तब बरसोगे
मन में आस लगावत हैं।

बिन पानी सब सूना सूना
जीव सभी अब भटकत हैं
दिखे पानी की एक बूंद
सब पूरी जान लगावत हैं।

बड़ी बेर भई बादल राजा
सावन सब कहां निहारत हैं
नैनन में अंसुअन भर भर के
सब अपनहि देह भिगोवत हैं।
0000
पूनम श्रीवास्तव


रविवार, 29 मई 2016

जिन्दगी

जिन्दगी इक बोझ सी
लगने लगती है जब
जिन्दगी का रुख अपनी
तरफ़ नहीं होता
व्यर्थ और निरर्थक
पर तभी अचानक से
रुख पलट जाता है
खुशियों के कुछ
संकेतों से
और फ़िर
हम जिन्दगी से
प्रेम करने लगते हैं
और चल पड़ती है
जिन्दगी
खुशियों का निमन्त्रण पाकर
आगे मंजिल की तरफ़
एक अन्तहीन यात्रा पर
उल्लास से भरी।
  000
पूनम श्रीवास्तव


बुधवार, 25 मई 2016

गीत

खिल रही कली कली
महक रही गली गली
चमन भी है खिला खिला
फ़िजा भी है महक रही।

दिल से दिल को जोड़ दो
सुरीली तान छेड़ दो
प्रेम से गले मिलो
हर जुबां ये कह रही।

कौन जाने कल कहां
हम यहां और तुम वहां
पल को इस समेट लो
वक्त मिलेगा फ़िर कहां।

मिलेगी सबको मंजिलें
नया बनेगा आशियां
कदम कदम से मिल रहे
कारवां भी चल पड़ा।
000

पूनम श्रीवास्तव

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

ज़िन्दगी

तुम धीरे-धीरे आना
तुम चुपके चुपके
तुम छइयां छइयां आना
ना धूप लगे डर जाना ।

तुम बन के चंचल हिरनी
वन वन में कुलांचे भरना
मत अंखिया तुम बंद करना
शिकारी बन कर रहना ।

कुछ पांव तले गड़ जाये
ना फ़िकर कोई तुम करना
तुम आगे- आगे चलना
ना पीछे मुड़ते रहना।

तुम अपना पँख फैलाना
बन आजाद परिन्दा
चूमोगी नील गगन को
इक दिन तुम ये तय करना।

खुश रहना तुम हर पल
ना गम के साये में रहना
फूलों के संग संग कांटे
होते फूलों का गहना।
---

पूनम श्रीवास्तव

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

चाहत




बीते पलों को याद कर
जरा तुम मुस्कुरा लेना
तेरे साथ ही हूं मैं सदा
एहसास यही बस कर लेना।

मेरी जिन्दगी में आना भी
तेरा हुआ कुछ इस तरह से
बाद पतझड़ के ज्यूं
छुप के बसंत का आना ।

जुबां से कोई कुछ भी कहे
उस पर न यकीन करना
सजा रखा है दिल ने
बस तेरा आशियाना।

सागर है कितना गहरा
इससे न हैं हम वाकिफ़
तेरी नजरों में जब से डूबे
मुश्किल उबर भी पाना।

दिल की तो हर धड़कन
मेरी सांसों का शरमाया
जाना तुझी से हमने
जिन्दगी को यूं जी लेना।

दुआ रब से यही है मेरी
बस इतना करम तू करना
निकले जनाजा मेरा
मेरी मांग फ़िर से भरना।
   0000
पूनम



शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

गज़ल


खाली बोतल जाम है खाली,बन्द पड़े सारे मयखाने
कष्ट बड़ा जीवन में है रब,टूट गये सारे पैमाने।

सबकी देहरी घूम के देखा,सबके अपने हैं अफ़साने
दुख की घड़ियां गिनता कोई,कोई बुनता नये ठिकाने।

तिनका तिनका जोड़ के इक दिन,पूरे हुये थे मेरे सपने
वक्त ने करवट ऐसी कुछ ली,अपने तिनके हुये बेगाने।

हवा यहां कुछ ऐसी बहकी,कोई अपने खून को ना पहचाने
जान चुका था मै भी तब तक,निकले ही थे वो उड़ जाने।

जैसे भटका हुआ मुसाफ़िर,लौट ही आता अपने ठिकाने
अपनी क़िस्मत कब बदलेगी,हम भी देते रब को ताने।
              000
पूनम

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

प्रकृति के रंग


प्रकृति ने बिखेरी अनुपम छटा
देखने को आंखें बरबस मचल उठीं
सूरज की किरणों ने धरती को चूमा
धरा भी गुनगुनी धूप में नहा उठी।

चांद ने जो रात में चांदनी बिखेरी
पृथ्वी रुपहली चादर में लिपटी
पहाड़ों से झरनों की जो फ़ूटी धार
हर तरफ़ कल-कल निनाद सी गूंज उठी।

बांसों के झुरमुट में सरसराती हवा
बांसुरी के स्वर जैसी लहरा उठी
हरी हरी घास पर ओस की बूंदें
नई नवेली दूल्हन सी मुस्कुरा उठीं।

हरियाली खेतों में झूमती सरसों
मानों खुशी के गीत सी गा उठी
भोर के प्रांगण में पक्षियों की कलरव
वीणा के तारों सी झंकृत हो उठी।
000
पूनम


शनिवार, 16 जून 2012

गज़ल


तुम्हारी याद मे आंसू आंखों से छलकते हैं,
सावन के बारिश ज्यूं मेघों से बरसते हैं।

तुम जो गये तो बस दिल ही टूट गया,
वो जिगर कहाँ से लाऊँ जो पत्थर के होते हैं।

चौबीस पहर तस्वीर तेरी इन आंखों में बसती हैं,
मिटाऊँ कैसे उनको जो नज़रों से ओझल नही होते हैं।

दिलासा देते तो जाते हो की जल्दी ही आऊँगा,
और हम इन्तज़ार में पल-पल फ़िर गिनने लगते हैं।

बिन तुम्हारे ज़िंदगी अधूरी सी लगती है,
अब के आकर ना जाना वादा इक तुमसे लेते हैं।

आयेगा खत का जवाब यही ख्वाब देखते हैं,
इसी उम्मीद को दामन से लिये हम तो जीते हैं।
000
पूनम

रविवार, 3 जून 2012

रूठा चांद



चांद को देखा कुछ गुमसुम उदास है।
चांदनी भी शायद कुछ रूठी आज है॥

तभी बादलों में उसने मुंह छुपा लिया था॥
कर लिया क्यों उसने अंधेरी रात है॥

टिमटिमाते तारे भी लगे खोये खोये से।
चांद के बिना नहीं चांदनी साथ है॥

मैं भी उदास गुमसुम सी उसको निहारती रही।
वो शायद समझ गया मेरे दिल की बात है॥

दूर से ही सही वो मुझको तसल्ली दे रहा था।
यूं लगा कि कोई अपना अपने पास है॥
000
पूनम श्रीवास्तव

शनिवार, 23 जुलाई 2011

सावन की छ्टा


सावन की छाई प्यारी छ्टा

मदमस्त पवन घनघोर घटा

बरसो रे मतवारी बदरिया

जरा झूम बरसो रे

बरसो रे---------------।

नील गगन में ताने चादर

अपनी काली पीली भूरी

कभी गरज गरज कभी कड़क कड़क

बिजली संग तुम चमकी।

बरसो रे---------------।

बरसो तो ऐसे बरसो

कि तन मन सबका भीजे

जाने कब से प्यासी

धरती की भी प्यास बुझे।

बरसो रे---------------।

कभी करती जोरों की बारिश

कभी रिमझिम सी फ़ुहार

कहीं प्रियतम संग हंसी ठिठोली

कहीं बिन पिया है जिया उदास।

बरसो रे-----------------।

आसमान में जब तब तुम

करती लुका छिपी का खेल

अब मानो बतिया मेरी

धरती संग तुम कर लो मेल।

बरसो रे-------------------।

चंचल शोख हवाओं संग

तुम फ़िरती फ़िरती इधर उधर

तुझे समाने को सीने में

धरा खड़ी बाहें पसार।

बरसो रे-----------।

बूंद बूंद बन कर जब

पत्तों से धरती पर टपकी

रूप सलोना देख तुम्हारा

मन की बांछें खिल उठीं।

बरसो रे---------------।

झूम के लाई ठंडी बयार

कोयल भी बोले कुहू कुहू

नाचे मोर दादुर चातक

पपीहा भी गाये पिहू पिहू।

बरसो रे---------------।

हरी चूड़ियां ओढ़े हरी चुनरिया

गोरी के मन भावे सावन

मंदिर घर और शिवालय में

गूंज रहा भोले का कीर्तन।

बरसो रे--------।

कितना तेरा रूप सुहाना

नहीं बनाना इसको विकराल

कहीं पे छाये खुशहाली

और कहीं जीना हो मुहाल।

बरसो रे--------------।

000

पूनम

रविवार, 27 मार्च 2011

रुसवाई


जमाने ने रुसवा किया है मगर

हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है।

बद अच्छा बदनाम बुरा

ये जुमला उन्हीं की अमानत रही है।

कदम दर कदम हमें धोखा दिया

ये हमेशा से उनकी फ़ितरत रही है।

न समझा जमाने ने मुझको जरा भी

न ही समझने कि उसे फ़ुर्सत रही है।

जहां में अकेले हमीं तो नहीं

जिसे दर्द सहने की आदत नहीं है।

शिकवा करे किसी से भी क्यों

जब खुदा की ही हम पर इनायत नहीं है।

000

पूनम

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

खोया अतीत


लोगों की भीड़ में खो गया है जो कहीं

आज भी मैं ढूँढता हूँ अपने उस मकान को।

अरसे पहले जिसे छोड़ कर चला गया था

आज देखता हूँ मैं शहर में बदले अपने गाँव को।

कुछ निशानियाँ थीं मशहूर जो मेरे घर की

उनकी जगहों पर पाता हूँ लम्बी लम्बी इमारतों को।

पुरवैया बहती थी जो मेरे घर के सामने

ढूँढ रहीं नज़रें मेरी उस नीम की ठंडी छांव को।

गप्प लड़ाया करते थे जहाँ खड़े खड़े यार सभी

आज आ गये आँख में आँसू याद कर उन शामों को।

चच्चा के नाम से थे मशहूर जो मेरे घर के दाहिने

खोजती हैं नज़रें उनकी पान की दुकान को।

देखते ही देखते मानो सब कुछ बदल गया

खड़ा हूँ अचम्भे से देख दुनिया के बदलते रंग को।

000

पूनम

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

हाशिये पर जिन्दगी


अपने अरमानों की अर्थी

खुद ही लिये फ़िरते हैं

कौन है जो अब

कांधा देने को मिले।

कोई मौत खुदी होती है

कोई बेमौत मारा जाता है

बाकी है कौन,किसी को

जो कफ़न ओढ़ाने को मिले।

पल दो पल का साथ

यारा हंस के बिता ले

जाने मिलने का क़्त

फ़िर मिले ना मिले॥

अपने मिलते हैं गले

प्यार से अपने बन के

निकले जो बोल मधुर मुख से

पीठ पे चाहे छुरी ही मिले।

चन्द लम्हों की ये जिन्दगी

जो खुदा की दी अमानत है

कर ले थोडी बन्दगी,क्या पता

कौन सी गोली दिल चीर के निकले

अपना किसको कहें अब

ये दुनिया वालों

जब हाशिये पर ही है जिन्दगी

जाने कब किसको छले।

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पूनम