गुरुवार, 30 जून 2016
बरसो बदरवा
रविवार, 29 मई 2016
जिन्दगी
बुधवार, 25 मई 2016
गीत
गुरुवार, 16 जुलाई 2015
ज़िन्दगी
मंगलवार, 20 नवंबर 2012
चाहत
शुक्रवार, 14 सितंबर 2012
गज़ल
गुरुवार, 26 जुलाई 2012
प्रकृति के रंग
शनिवार, 16 जून 2012
गज़ल
रविवार, 3 जून 2012
रूठा चांद
शनिवार, 23 जुलाई 2011
सावन की छ्टा

सावन की छाई प्यारी छ्टा
मदमस्त पवन घनघोर घटा
बरसो रे मतवारी बदरिया
जरा झूम बरसो रे।
बरसो रे---------------।
अपनी काली पीली भूरी
कभी गरज गरज कभी कड़क कड़क
बिजली संग तुम चमकी।
बरसो रे---------------।
कि तन मन सबका भीजे
जाने कब से प्यासी
धरती की भी प्यास बुझे।
बरसो रे---------------।
कभी रिमझिम सी फ़ुहार
कहीं प्रियतम संग हंसी ठिठोली
कहीं बिन पिया है जिया उदास।
बरसो रे-----------------।
करती लुका छिपी का खेल
अब मानो बतिया मेरी
धरती संग तुम कर लो मेल।
बरसो रे-------------------।
तुम फ़िरती फ़िरती इधर उधर
तुझे समाने को सीने में
धरा खड़ी बाहें पसार।
बरसो रे-----------।
पत्तों से धरती पर टपकी
रूप सलोना देख तुम्हारा
मन की बांछें खिल उठीं।
बरसो रे---------------।
झूम के लाई ठंडी बयार
कोयल भी बोले कुहू कुहू
नाचे मोर दादुर चातक
पपीहा भी गाये पिहू पिहू।
बरसो रे---------------।
हरी चूड़ियां ओढ़े हरी चुनरिया
गोरी के मन भावे सावन
मंदिर घर और शिवालय में
गूंज रहा भोले का कीर्तन।
बरसो रे--------।
नहीं बनाना इसको विकराल
कहीं पे छाये खुशहाली
और कहीं जीना हो मुहाल।
बरसो रे--------------।
000
पूनम
रविवार, 27 मार्च 2011
रुसवाई

जमाने ने रुसवा किया है मगर
हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है।
बद अच्छा बदनाम बुरा
ये जुमला उन्हीं की अमानत रही है।
कदम दर कदम हमें धोखा दिया
ये हमेशा से उनकी फ़ितरत रही है।
न समझा जमाने ने मुझको जरा भी
न ही समझने कि उसे फ़ुर्सत रही है।
जहां में अकेले हमीं तो नहीं
जिसे दर्द सहने की आदत नहीं है।
शिकवा करे किसी से भी क्यों
जब खुदा की ही हम पर इनायत नहीं है।
000
पूनम
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
खोया अतीत

लोगों की भीड़ में खो गया है जो कहीं
आज भी मैं ढूँढता हूँ अपने उस मकान को।
अरसे पहले जिसे छोड़ कर चला गया था
आज देखता हूँ मैं शहर में बदले अपने गाँव को।
कुछ निशानियाँ थीं मशहूर जो मेरे घर की
उनकी जगहों पर पाता हूँ लम्बी लम्बी इमारतों को।
पुरवैया बहती थी जो मेरे घर के सामने
ढूँढ रहीं नज़रें मेरी उस नीम की ठंडी छांव को।
गप्प लड़ाया करते थे जहाँ खड़े खड़े यार सभी
आज आ गये आँख में आँसू याद कर उन शामों को।
चच्चा के नाम से थे मशहूर जो मेरे घर के दाहिने
खोजती हैं नज़रें उनकी पान की दुकान को।
देखते ही देखते मानो सब कुछ बदल गया
खड़ा हूँ अचम्भे से देख दुनिया के बदलते रंग को।
000
पूनम
गुरुवार, 5 अगस्त 2010
हाशिये पर जिन्दगी

अपने अरमानों की अर्थी
खुद ही लिये फ़िरते हैं
कौन है जो अब
कांधा देने को मिले।
कोई मौत खुदी होती है
कोई बेमौत मारा जाता है
बाकी है कौन,किसी को
जो कफ़न ओढ़ाने को मिले।
पल दो पल का साथ
यारा हंस के बिता ले
जाने मिलने का वक़्त
फ़िर मिले ना मिले॥
अपने मिलते हैं गले
प्यार से अपने बन के
निकले जो बोल मधुर मुख से
पीठ पे चाहे छुरी ही मिले।
चन्द लम्हों की ये जिन्दगी
जो खुदा की दी अमानत है
कर ले थोडी बन्दगी,क्या पता
कौन सी गोली दिल चीर के निकले
अपना किसको कहें अब
ये दुनिया वालों
जब हाशिये पर ही है जिन्दगी
जाने कब किसको छले।
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पूनम







