शनिवार, 10 दिसंबर 2011

जिन्दगी के लिये


क्यों नहीं छोड़ देते

उसे एक बार

अपनी तरह जीने के लिये।

क्यों हमेशा

उसे मेंड़ की तरह

बांधने की करते हो

कोशिश

वो तो

इस धरती का

ही आज़ाद जीव है।

जो अपनी

स्वतन्त्रता का हक़

रखती है

फ़िर क्यूं

भारी भारी पत्थर की

शिला डाल कर

राह में उसके

आगे पैदा करते हो

अड़चनें।

हर वक़्त

उसके चारों ओर

बुनने की

करते हो कोशिश

एक मकड़जाल।

उसे

खुला छोड़ के

देखो तो सही

कैसे

आज़ाद पंछी की तरह

अपने पंख फ़ड़फ़ड़ा कर

जब वो बंधन से निकलेगी

बाहर तो

खुशी का इज़हार करते

तुमसे वो थकेगी नहीं।

क्योंकि जिन्दगी तो

जीने का नाम है

ज्यादा पाबंदियां

लगाने पर

वह भी

एक दिन घुट घुट कर

तोड़ देती है दम।

इससे तो

अच्छा है

खुली हवा में

सांस लेने की कोशिश

सारी चिंताओं से परे होकर

फ़िर देखो

यही ज़िंदगी

कितनी सुहानी लगेगी।

लगेगा तुम्हें

कितनी बड़ी गलती

कर रहे थे

तुम

अपने आप को

व्यर्थ के बंधनों में

जकड़कर।

क्योंकि ज़रूरत से ज़्यादा

अति तो ठीक नहीं

चाहे वो

किसी के लिये भी हो

यानि ---

ज़िंदगी के लिये।

000

पूनम

बुधवार, 16 नवंबर 2011

आ मुसाफ़िर लौट आ


आ मुसाफ़िर लौट आ अब भी अपने डेरे पर,

भटकता रहेगा कब तलक,तू यूं ही अब डगर डगर।

दिन ढले सूरज भी देख जा छुपा है आसमां में,

सुरमई शाम आ चुकी है अब अपने वक्त पर।

पेड़ पशु पक्षी भी देख अब तो सोने जा रहे,

कह रहे हैं वो भी अब तू भी तो जा आराम कर।

लुटा दिया जिनकी खातिर तूने जीवन अपना ताउम्र,

क्या तुझे पूछा उन्होंने इक बार भी पलटकर।

तेरे ही लहू के अंश हो गये तितर बितर,

बेगाने हो गए जिन्हें तूने रखा सीने से लगाकर।

जाने वक्त की घड़ी कब किधर रुख बदल ले,

कब तक खड़ा रहेगा तू जिन्दगी के हाशिये पर।

वक्त है अब भी सम्हल जा अपने लिये भी सोच तू,

जी लिया गैरों की खातिर अपने लिये भी जी ले जी भर।

000000

पूनम

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

कुछ लघु कवितायें


(एक)

वह मशक्कत कर रहा

था जी तोड़

सिर्फ़ दो जून की रोटी

के लिए

बदले में पाता था

वह कम पैसे और

ज्यादा मांगने पर

गालियां बेशुमार।

000

(दो)

वो बेशर्म हो के

निकली आज

अपने घर से

कल तक जिसे हम

हया रूप कहते थे।

000

(तीन)

उसकी पेशानी पर

पड़ रही थी

धूप की रुपहली

किरणें जिन्हें वह

अपनी मुटठियों में बंद करने की

कोशिश कर रहा था

भान नहीं था उसे कि

वह एक छालावा है।

000

(चार)

खेल खेल रहा था

वो आग से

मौत का कुआं

जिसमें वह कूद रहा था

अपनी जिन्दगी को

दांव पर लगाकर

अपने परिवार की

पेट की आग

बुझाने के लिये

पर वाह री तकदीर

आग उसकी जिन्दगी से खेल गई।

000

(पांच)

रात के गहन सन्नाटे में

मैं सोते से

जाग पड़ी किसी की

सुनकर चीख

पर वो अंधेरे

में ही

दबा दी गई।

000

(छः)

देख आसमानी

फ़िजाओं को तेरी

याद आती है बहुत

जाने कब ये अपना

रुख बदल दे

जल्दी से आ

जाओ ना।

000

पूनम

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

अभियान गीत



मैं तुम्हारी मुस्कुराहटों को गीत दूं

तुम हमारे गीत के सुरों को रूप दो।

चलो चलें विजय के गीत साथ ले

मंजिलों से दूर हैं ये काफ़िले

काफ़िलों को एक नया मार्ग दो

एक नई उमंग एक विचार दो।

अन्धकार छा रहा है क्यूं यहां

सत्य लड़खड़ा रहा है क्यूं यहां

इक प्रकाश पुंज तुम बिखेरे दो

क्रान्ति गीत है नया ये छेड़ दो।

आदमी क्यूं आदमी को डस रहा

हर शहर क्यूं लाश से है पट रहा

आदमी के हर ज़हर निकालकर

इक नये समाज को तुम नींव दो।

मैं तुम्हारी मुस्कुराहटों को गीत दूं

तुम हमारे गीत के सुरों को रूप दो।

000

पूनम

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

दर्पण


दर्पण जो आज देखा वो मुंह चिढ़ा रहा था

चेहरे की झुर्रियों से बीती उम्र बता रहा था।

कब कैसे कैसे वक्त सारा निकल गया था

कुछ याद कर रहा था मैं कुछ वो दिला रहा था।

नटखट भोला भाला बचपन कितना अच्छा होता था

जब बाहों में मां के झूले झूला करता था।

धमा चौकड़ी संग अल्हड़पन कब पीछे छूट गया था

इस आपाधापी के जीवन में वो भी बिसर गया था।

कब उड़ाने मारीं हमने कब सपना मीठा देखा था

सच में सब कुछ वो बहुत रुला रहा था।

कब हंसे कब रोया हमने क्या कैसे पाया था

गिनती वो सारी की सारी करा रहा था।

मैं रो रहा था और वो मुझ पर हंस रहा था

क्यों नहीं हमने सबको रक्खा सहेजे था।

पछता के अब क्या वो ये जता रहा था

जो बीता वो ना लौटे वो यही समझा रहा था।

अब समझ रहा था मैं जो वो कहना चाह रहा था

आने वाले पल के लिये वो तैयार करा रहा था।

000

पूनम


शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

बेटियां

बहुत खुशी की बात है कि मेरी कविता बेटियां की कुछ पंक्तियां युनाइटेड नेशन्स पापुलेशन फ़ण्ड द्वारा मध्य प्रदेश में बालिका शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिये चलाये जा रहे प्रोजेक्ट में पोस्टर,बैनर्स,और फ़्लैक्स के लिये चुनी गयी हैं।ये सभी बैनर्स,पोस्टर्स और फ़्लैक्स वहां के सभी स्कूलों,सरकारी कार्यालयों में लगाये गये हैं। मैं यह खुशी आप सभी के साथ बांटना चाहती हूं।

पूनम


बुधवार, 7 सितंबर 2011

सिसकते शब्द



तन्हाई के आलम में रहते रहते

शब्द भी मेरे बिखर के रह गये।

सोच की धरा पर जो भावों के पुल बने मेरे

शब्द पानी पर नदी के उतराते जैसे रह गये।

दरवाजे पर दस्तक से दिल धड़क धड़क उठे

कौन हो सकता है बेवक्त बस लरज के रह गये।

इन्सान को सही इन्सां समझना है बड़ा मुश्किल

मन ही मन में इसका हल ढूंढ़ते रह गये।

भरोसा भी करें तो कैसे और किस पर हम

सफ़ेदपोश में छुपे चेहरे असल दंग हम रह गये।

उड़ान मारते आसमां में देखा जो परिन्दों को

पिंजरे में बन्द पंछी से फ़ड़फ़ड़ा के रह गये।

मत लगाओ बन्दिशें इतनी ज्यादा

हम गुजारिश पर गुजारिशें ही करते रह गये।

सच्चाई को दफ़न होते देखा है हमने

झूठ का डंका बजा पांव जमीं से खिसक गये।

सन्नाटा पसरा रहता सहमी रहती गली गली

हम झरोखे से अपने झांक के ही रह गये।

जल रहे हैं आशियाने हंस रहे हैं मयखाने

सियासती दांव पेंचों में शब्द सिसक के रह गये।

झिलमिलाते तारों संग जो आसमां पे पड़ी नजर

हो खूबसूरत ये जहां भी चाहत लिये ही रह गये।

00000

पूनम