गुरुवार, 3 मई 2012
सफ़र
बुधवार, 16 नवंबर 2011
आ मुसाफ़िर लौट आ

आ मुसाफ़िर लौट आ अब भी अपने डेरे पर,
भटकता रहेगा कब तलक,तू यूं ही अब डगर डगर।
दिन ढले सूरज भी देख जा छुपा है आसमां में,
सुरमई शाम आ चुकी है अब अपने वक्त पर।
पेड़ पशु पक्षी भी देख अब तो सोने जा रहे,
कह रहे हैं वो भी अब तू भी तो जा आराम कर।
लुटा दिया जिनकी खातिर तूने जीवन अपना ताउम्र,
क्या तुझे पूछा उन्होंने इक बार भी पलटकर।
तेरे ही लहू के अंश हो गये तितर बितर,
बेगाने हो गए जिन्हें तूने रखा सीने से लगाकर।
जाने वक्त की घड़ी कब किधर रुख बदल ले,
कब तक खड़ा रहेगा तू जिन्दगी के हाशिये पर।
वक्त है अब भी सम्हल जा अपने लिये भी सोच तू,
जी लिया गैरों की खातिर अपने लिये भी जी ले जी भर।
000000
पूनम
बुधवार, 15 जून 2011
निराला-बचपन

बचपन तो होता है निराला
निश्छल, निर्मल,मस्ती वाला
दुनिया से उसको क्या मतलब
वो तो खुद ही भोला- भाला ।
मां की गोदी में लोरी
सुन कर वह तो सो जाता
बातें करता परियों के संग
सपनों में वो मतवाला ।
ना कोई चिंता,ना ही फ़िकर
मस्ती में बीते हर पल
चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान
देख के हंस दे रोने वाला।
बचपन सबके संग में खेले
ऊँच नीच की बात न मन में
सबके दिल को प्यार से जीते
वो तो है मन मोहने वाला।
वो धमा चौकड़ी,वो लड़ी पतंग
वो ब्याह रचाना गुड़िया का गुड्डे के संग
वो पूड़ी हलवा मेवे वाला
सच में वो बचपन अलबेला।
कुछ खट्टा कुछ मीठा बचपन
होता कुछ कुछ तीखा भी बचपन
भूले से भी ना भूलने वाला
यादों में हरदम बसने वाला।
दुनिया का उसपर रंग ना चढता
कोई अगर मुझसे पूछे तो
माँग लूँ दिन फ़िर बचपन वाला।
000
पूनम
मंगलवार, 26 अप्रैल 2011
जीवन-- रथ

मेरे मन ने कही,मेरे मन ने सुनी
मेरे दिल की बात मेरे मन मे रही।
दो अजनबी मिले
नदी के दो पाट की तरह।
जानते थे वो एक होंगे नहीं
पर फ़िर भी संग संग चलते रहे।
पर विश्वास इसी में,प्रेम इसी में
लहरें एक दूजे को छूती रहीं।
एक वक्त ऐसा भी आया जब
साथी दोनों बिछड़ गये।
पर जितने दिन भी साथ रहा
वो जीवन में इक छाप छोड़ गये।
पर जीवन तो नदी का पाट नहीं
इक रथ के दो पहिये हैं।
इक बिगड़ा तो दूजे ने सम्भाला
पर साथ ना कभी छोड़ा अपना।
जीवन की यही तो रीति बनी
जिस बन्धन में बाँधा हमको।
रथ का पहिया यूँ ही चलता रहे
जीवन में बहुत है ये जीने के लिये।
000
पूनम
शनिवार, 11 दिसंबर 2010
वक्त से----

वक्त थम जाओ जरा
आइना तो निहार लूं।
घटाओं घूम के आओ जरा
जुल्फ़ों को संवार लूं।
हवाओं रुख बदल दो जरा
आंचल तो संभाल लूं।
फ़िजाओं इस तरह गमको जरा
सांसों में इनको भर तो लूं।
चमन फ़ैलो हर इक दिशा जरा
फ़ूलों सी मुस्कुरा तो लूँ।
बारिश झूम के बरसो जरा
संग तुम्हारे झूम तो लूं।
स्वप्न सतरंगी इन्द्रधनुषी ज़रा
खुशी से इतरा तो लूँ।
आलम हो इस कदर रंग भरा तो
क्यों ना इस पल को आगोश में समेट लूं।
000
पूनम
बुधवार, 6 अक्टूबर 2010
बन जाओ अफ़साना

तुम गीत गज़ल बन करके
मेरे सपनों में आना
मैं शब्द शब्द बन जाऊंगी
तुम बनना नया तराना।
मैं सुर संगम बन जाऊंगी
तुम तान सुरीली गाना
मैं मधुर कण्ठ से गाऊंगी
तुम लयबद्ध हो जाना।
मैं प्रेम मग्न हो जाऊंगी
तुम भी साथ निभाना
मैं बनूंगी मीरा राधा
तुम कृष्ण मेरे बन जाना।
मैं बनूंगी शृंगार का प्याला
तुम उसमें डूब जाना
मैं बनूंगी तुम्हारी शमा
तुम बन जाना परवाना।
मैं नहीं बनूंगी ऐसी शमा
अकेले ही जल जाऊं
वादा है इक तुमसे
तुम मेरे संग जल जाना।
तब देखेगी ये दुनिया
जोड़ी ये गीत गज़ल की
हम भी बन जायेंगे फ़िर
एक नया अफ़साना।
000
पूनम
शुक्रवार, 30 जुलाई 2010
आया सावन

सावन में बदरा बरसे
घनन घनन घन घन
बगिया में फ़ुलवा गमके
भीजे तन और मन
प्रियतम प्रियतम फ़िर बोले
दिल का ये आंगन।
पेड़ों पर पड़ गये झूले
सखियां लगी झूलन
पेंग पे पेंग बढ़ावें जैसे
छूलें नील गगन
खिलखिलाती ऐसी जैसे
बातें करें पवन।
भौंरे भी झूमन लगे
पी के फ़ूल परागण
जिन फ़ूलन पर जा बैठे
वो फ़ूल हुये मगन
इतराये वो ऐसे जैसे
बचपन में अल्हड़पन।
जूड़न में गजरे सज गये
खुशबू लिये चमेलन
काले कजरों से भर गये
खंजन जैसे नयन
रंग बिरंगी चूड़ियों संग
सजे हाथ कंगन।
पांवों में बिछुआ सोहे
बाजे संग पाजन
लगा महावर पैरों में
इतराये गोरी मन मन
सजा के टिकुली माथे पे
सखी बनी दुल्हन।
सावन तो होवे ही ऐसे
हो जाये सभी मगन
सजनी को झूला झुलाये साजन
जैसे राधा किशन
सखियन संग मन मेरा भी गाये
जल्दी आना सजन।
000
पूनम
