शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

कह दो हर दिल से-----



कह दो दिलों से आज कि इक दिल ने आवाज दी है
बन जाओ सहारे उनके जो कि बेसहारा हैं।

गुलामी की वो जंजीरें जो टूटी नहीं हैं अब तलक
तोड़ दो उन पाबन्दियों को जिन पर हक़ तुम्हारा है।

बड़ी फ़ुरसत से वो इक शै बनाई है खुदा ने
वो तुम इंसान ही तो हो जिसे उसने संवारा है।

वक़्त कब किसका बना है आज तलक हम कदम
करो ना इन्तजार उसका जो कि नहीं तुम्हारा है।

करने से पहले नेकी का अंजाम ना सोचो
समझो कि हर बात में उसका ही इशारा है।
000
पूनम





शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

गज़ल


खाली बोतल जाम है खाली,बन्द पड़े सारे मयखाने
कष्ट बड़ा जीवन में है रब,टूट गये सारे पैमाने।

सबकी देहरी घूम के देखा,सबके अपने हैं अफ़साने
दुख की घड़ियां गिनता कोई,कोई बुनता नये ठिकाने।

तिनका तिनका जोड़ के इक दिन,पूरे हुये थे मेरे सपने
वक्त ने करवट ऐसी कुछ ली,अपने तिनके हुये बेगाने।

हवा यहां कुछ ऐसी बहकी,कोई अपने खून को ना पहचाने
जान चुका था मै भी तब तक,निकले ही थे वो उड़ जाने।

जैसे भटका हुआ मुसाफ़िर,लौट ही आता अपने ठिकाने
अपनी क़िस्मत कब बदलेगी,हम भी देते रब को ताने।
              000
पूनम

सोमवार, 20 अगस्त 2012

आखिर क्यों--------?


अब मेरे बगीचे में
नहीं आता है
चिड़ियों का हुजूम
दाना चुगने के लिये।

अब भोर की बेला में
नहीं सुनाई देती
उनकी चीं चीं चूं चूं
उनकी चहचहाहट।

अब नजरें तरस गयी हैं
उन्हें देखने के लिए
पानी भरे अधफ़ूटे मटके में उनका
फ़ुदक फ़ुदक कर
अपने पर फ़ड़फ़ड़ा नहाना
और अपने पंखों को
फ़ैलाकर सुखाना।

उनका वो लुका छुपी
का खेल
एक रोमांच सा लगता था
जिनको देख हम भी
बन जाते थे बच्चे।
घने पौधों के बीच
उनका घोंसला बनाना
और फ़िर
हर वक्त अपने घोंसले के
चारों ओर
बड़ी सजगता से
निगरानी करना।

घोंसले के पास
किसी को देख
भयातुर स्वरों में चीं चीं
की करुण पुकार
उनकी हरकतें
आज भी बहुत याद आती हैं
पर क्या करें वो भी
हमने ही तो भौतिकता की
अंधी दौड़ में उन्हें
रास्ता बदलने पर
मजबूर कर दिया।

क्या कोई उन्हें
फ़िर से मना कर
हमारे बगीचे में
वापस नहीं ला सकता।
000
पूनम


मंगलवार, 14 अगस्त 2012

आया शुभ दिन

(फ़ोटो गूगल से साभार)

पन्द्रह अगस्त का आया शुभ दिन
हमको आज़ाद कराने का दिन
शहादत और बलिदानों का दिन
हम सबकी खुशहाली का दिन।

सर पे कफ़न बांध थे निकले
वीर युवा सब आज के ही दिन
शीश कटा पर झुका न उनका
भारत मां को मान दिलाने का दिन।

कुर्बानी याद दिलाने का दिन
वीरों पर शीश झुकाने का दिन
गाथाएं उनकी गाने का दिन
राहों पर उनके जाने का दिन।

कसमें सभी निभाने का दिन
पुष्पांजलियां अर्पित करने का दिन
आज़ादी जो वीरों ने दी
सुरक्षित उसे बनाने का दिन।
000
पूनम श्रीवास्तव



शनिवार, 4 अगस्त 2012

गज़ल


आज अपने ही शहर में
बन के मेहमां हम खड़े हैं
देख के हालत ये अपनी
बेकसी से रो पड़े हैं।

हंस के जो मिलते थे पहले
आज परदे में छुपे हैं
एक सिक्के के दो पहलू
सामने मेरे पड़े हैं।

सूर्य के रथ की धुरी सी
चल रही थी ज़िन्दगी
राहु बन कर के वो मेरा
रास्ता रोके खड़े हैं।

पहचान की हर सरहदों को
काट कर मीठी छुरी से
देखते हैं वो तमाशा
किस डगर पर हम खड़े हैं।

आज अपने ही-----।
0000

पूनम

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

प्रकृति के रंग


प्रकृति ने बिखेरी अनुपम छटा
देखने को आंखें बरबस मचल उठीं
सूरज की किरणों ने धरती को चूमा
धरा भी गुनगुनी धूप में नहा उठी।

चांद ने जो रात में चांदनी बिखेरी
पृथ्वी रुपहली चादर में लिपटी
पहाड़ों से झरनों की जो फ़ूटी धार
हर तरफ़ कल-कल निनाद सी गूंज उठी।

बांसों के झुरमुट में सरसराती हवा
बांसुरी के स्वर जैसी लहरा उठी
हरी हरी घास पर ओस की बूंदें
नई नवेली दूल्हन सी मुस्कुरा उठीं।

हरियाली खेतों में झूमती सरसों
मानों खुशी के गीत सी गा उठी
भोर के प्रांगण में पक्षियों की कलरव
वीणा के तारों सी झंकृत हो उठी।
000
पूनम


मंगलवार, 17 जुलाई 2012

सीख

जला जला कर खुद को,खाक करते हो क्यूं।
ज़िन्दगी अनमोल खजाना,जीना तो सीख लो।

देख कर औरों की खुशियां कुढ़ते हो क्यूं
गैरों की खुशी में भी,हंसना तो सीख लो।

रास्ते मंजिलों के,आसान ढूंढ़ते हो क्यूं
मुश्किलों का सामना,करना तो सीख लो।

छूने को आसमान की हद,कोशिश करो जरूर
पहले पांव को जमीं पर,जमाना तो सीख लो।

अपने को गैरों से,ऊंचा समझते हो क्यूं
एक बार खुद को भी कभी,आंकना तो सीख लो।

तक़दीर को ही हर कदम पर,कोसते हो क्यूं
रह गई कमी कहां पे है,जानना तो सीख लो।

कर के भरोसा दूसरों पे,पछताते हो क्यूं
बस हौसला बुलंद करना,खुद का तो सीख लो।

बात सिर्फ़ इतनी सी है,जीवन फ़कत पाना ही क्यूं,
खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लो।
 000
पूनम