शनिवार, 29 मार्च 2014

ये भी तो कुछ कहते हैं-----

पड़ते कुल्हाड़े पेड़ों पर जब
उनके भी  आंसू बहते हैं
सोचो जरा इक बात तो आखिर
क्या वो भी हमसे कुछ कहते हैं?

जो हैं हमारे जीवन रक्षक
क्यूं हम उनके भक्षक बन जायें
जो जीवन को देने वाले हैं
उनके ही दुश्मन कहलायें।

काटने पर हम तुले हैं जिसको
शहर शहर और गांव गांव
आने वाले समय में फ़िर तो
मिलेगी न हमको उनकी छांव।

जो धरती का आंचल लहराये
पर्यावरण को सदा बचाए
धूप ठंढ बारिश को बचा के
मानव जीवन को हरसाए।

प्रकृति है जिससे हरी भरी
जो बादल से बारिश ले आते
जिनके कारण ही तो हम
नव जीवन हैं अपनाते।

आओ हम सब बच्चे मिल जाएं
फ़िर एक पेड़ न कटने पाये
जगह जगह पर पेड़ लगा कर
हरियाली वसुन्धरा पर लायें।
0000

पूनम

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

छुक छुक गाड़ी-----।

छुक छुक चलती रेलगाड़ी
पटरी पे दौड़े रेलगाड़ी।

दुनिया भर की सैर कराती
गांव बगीचे खेत दिखाती
धरती के हर रंग दिखाती
कड़ी धूप बारिश या ठण्ढक
कभी न रुकती रेलगाड़ी।

छुक छुक चलती रेलगाड़ी
पटरी पे दौड़े रेलगाड़ी।।

बच्चों को भाती रेलगाड़ी
सैर कराती रेलगाड़ी
अम्मा,बाबू,दीदी,भैया
गांव शहर के हर तबके का
वजन उठाती रेलगाड़ी।

छुक छुक चलती रेलगाड़ी
पटरी पे दौड़े रेलगाड़ी।।

गर्मी की छुट्टी में सबको
नानी दादी तक ले जाती
देश के हर कोने में दौड़े
नदिया पर्वत पीछे छोड़े
सीटी बजाती रेलगाड़ी।

छुक छुक चलती रेलगाड़ी
पटरी पे दौड़े रेलगाड़ी।।
000

पूनम

शनिवार, 18 जनवरी 2014

जिन्दगी----।

कहते हैं जिसे जिन्दगी उस जिन्दगी को ढूंढते हैं।
पोंछते हैं अश्कों को जीने का बहाना ढूंढ़ते हैं॥

खामोश है जुबान पर दिल ये रोता है।
कांटों भरी डगर पर हंसने का बहाना ढूंढ़ते हैं।।

थाम ले कोई हाथ जिस राह से भी गुजरे हम।
हम सफ़र मिल जाय सफ़र का बहाना ढूंढ़ते हैं॥

चाहत हर किसी की होती नहीं पूरी फ़िर भी
कोशिश का बहाना,खुदा के पास ढूंढ़ते हैं।।
000
पूनम


शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

बाल कहानी --------- आत्मविश्वास

                       
         
दो बहनें थीं।बड़ी मेहाली छोटी शेफ़ाली।दोनों बहनें बड़ी ही सभ्य व सुसंस्कृत परिवार की थीं।दोनों बहुत ही समझदार तथा पढ़ाई लिखाई में भी बहुत ही अच्छी थीं।पर दोनों के स्वभाव में बहुत ही अंतर था। जहां बड़ी नम्र स्वभाव की व मृदुभाशी थी वहीं छोटी स्वभाव की तो बहुत ही अच्छी पर थोड़ा उग्र स्वभाव की थी। बचपन से ही छोटी पढ़ने लिखने में बहुत ही तेज थी। उसने छोटी उम्र में ही अपने आप पढ़ना लिखना सीख लिया था। कोई बात एक बार बताने के बाद उसे दुबारा बताना नहीं पड़ता था।धीरे-धीरे दोनों बहनें बड़ी होती गयीं। अब बड़ी बहन मेहाली बी ए और छोटी 10वीं में आ गयी थी।
           इसके पहले जब शेफ़ाली 5वीं कक्षा में आई तो उसे दो बार टायफ़ाइड हो गया।वह बहुत जल्द ही ठीक भी हो गयी पर इससे उसकी सेहत और पढ़ाई पर बहुत ही खराब असर पड़ा।फ़िर उसने अगली कक्षा में अपनी मेहनत के बल पर अच्छे अंक लाये।सभी विषयों में तो उसे बहुत अच्छे अंक मिले पर गणित में बहुत ही कम।
             इधर शेफ़ाली की मां की तबीयत अक्सर खराब रहती।जिससे घर के माहौल व बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ा।अब दोनों बच्चों पर अपनी तबीयत की वजह से शेफ़ाली की मां ज्यादा ध्यान दे नहीं पाती थीं। बड़ी बहन मेहाली अपनी पढ़ाई के साथ ही साथ पूरे घर का भी बहुत खयाल रखती थी। साथ ही छोटी बहन शेफ़ाली को भी वह पढ़ाती थी।मां की अस्वस्थता से घर का सारा भार मेहाली के कन्धों पर आ गया था।मां उससे कहती कि बेटा छोटी बहन की मदद भी ले लिया करो लेकिन वो बड़े प्यार से मां से कहती मां अभी वो बहुत छोटी है। मै तो कर रही हूं न। आप परेशान न हुआ करिये मैं सब सम्हाल लूंगी।मां अचानक ही मेहाली के कन्धों पर इतना बोझ आ जाने से और भी चिन्तित रहती थीं।
          खैर 10वीं की छःमाही परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ फ़िर शेफ़ाली पिछले साल की तरह गणित में कम नम्बर ले आई। जाने क्यों उसे गणित से इतना डर लगने लगा कि वो उससे दूर भागती। जब-जब टेस्ट या इम्तहान होता गणित वाले दिन उसे बुखार जरूर हो जाता था। ऐसा नहीं था कि वो घर पर अभ्यास नहीं करती थी।मां के समझाने पर वो बार बार सवाल लगाती और हल भी कर लेती लेकिन गणित के पेपर वाले दिन कक्षा में वो पेपर देखते ही इतनी नर्वस हो जाती थी कि आते हुये सारे सवाल उल्टे-सीधे कर आती।उसकी टीचर को भी बड़ा आश्चर्य होता।वो उसे डांटते भी नहीं थे और बड़े प्यार से बुला कर समझाते थे कि बेटा गणित में तुम्हें क्या हो जाता है तुम तो इतनी अच्छी हो पढ़ने में।फ़िर वो रोने लगती। घर आकर भी वो खूब रोती कि मैं कभी भी गणित में पास नहीं हो पाऊंगी। मैं आगे कुछ नहीं कर पाऊंगी।
      फ़िर मम्मी पापा ने विचार करके उसका दाखिला कोचिंग में करा दिया।उसकी कोचिंग के सारे शिक्षक भी बहुत ही अच्छे थे और सभी बच्चों पर बहुत ध्यान देते थे। जो बच्चा जिस विषय में कमजोर था ये पता करके उस पर विशेष ध्यान देते।
 कोचिंग ज्वाइन करने पर मेहनत तो उस पर ज्यादा पड़ने लगी लेकिन फ़िर से पढ़ाई में खासकर गणित में भी उसका ध्यान लगने लगा।कोचिंग में वो हर सवाल हल कर लेती।उसकी टीचर भी उससे कहतीं कि शेफ़ाली तुम बहुत ही अच्छी विद्यार्थी हो। थोड़ी मेहनत और करो और अपना आत्म विश्वास मत खोओ।देखो तुम्हारी पोजीशन कितनी अच्छी हो जाएगी।बस अपनी लगन इसी तरह बनाये रखो।
             एक दिन शेफ़ाली पढ़ाई से थोड़ा खाली होकर अपने घर के बाहर बैठी चिड़ियों को देख रही थी। वह इस उधेड़बुन में भी थी कि कैसे अपनी पढ़ाई को और आगे बढ़ाए। अपना आत्म विश्वास बढ़ाए।तभी उसकी निगाह लान में जा रहे एक गुबरैले पर पड़ी जो एक मिट्टी का बड़ा टुकड़ा आगे ढकेलने की कोशिश कर रहा था। पर बार-बार नाकाम हो जाता था। लेकिन उसने हार नहीं मानी।वह लगातार उसे आगे बढ़ाने की कोशिश करता रहाकरता रहा। और अन्ततः वह मिट्टी के उस टुकड़े को आगे धकेलने में सफ़ल हो गया।---उसे आगे जाते देख शेफ़ाली खुशी से चिल्ला पड़ी---हुर्रे----। बगल में खड़ी उसकी सहेली भी चौंक गयी---क्या हुआ है इसे। पर शेफ़ाली ने उसे समझा दिया कि चिड़ियों का उड़ना देख वो चीखी थी।
             बस उसी दिन शेफ़ाली ने तय कर लिया कि उसे परीक्षा होने तक वही गुबरैला बन जाना है। और वह जुट गयी मेहनत से पढ़ने में।इस बार कोचिंग के सभी टेस्ट में उसके अच्छे नम्बर आए। उसकी शिक्षिकाओं ने भी उसे बहुत सराहा।
         अब उसका खोया अत्म विश्वास लौट आया था। और वह दुगनी लगन से अगली परीक्षा की तैयारी में जुट गयी।मां भी जो उसकी पढ़ाई देख कर काफ़ी चिन्तित रहती थीं अब काफ़ी निश्चिन्त हो गयीं।उन्हें लगने लगा कि उन्हें बचपन वाली जिम्मेदार शेफ़ाली बेटी वापस मिल गयी है। और  वह अच्छी तरह से इस बात को समझ गयी है कि मेहनत लगन और आत्मविश्वास ही जीवन में आगे बढ़ने की कुंजी है।
                             0000

पूनम श्रीवास्तव

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

हे कृष्ण

ऊधो जाय कहिये सब हाल
राधे संग सखियन बेहाल
जानत रह्यो जब जावन तुमको
काहे बढ़ायो मोह को जाल।

नजरें इत-उत डोलत हैं
मन कान्हा-कान्हा बोलत है
थकि गये हम टेरत- टेरत
नैना बाट जोहत हैं।

बचपन मां हम संग संग बाढ़े
मिल के रास रचायो खूब
बालपन में गोपियन संग
तूने नटखटपन दिखलायो खूब।

सुनने को तान मुरलिया की
तरसे बरसों हमरे कान
अब भी आके सुर बिखराओ
हे नटवर नागर हे घनश्याम।

होठों पे तेरे सजे बंसुरिया
अब मोहे तनिक भी भावे ना
वो तो पहिले की ही बैरन
अब तो सौतन सी लागे ना।

पर राधा तो तिहारी दिवानी
जो तुझको वो हमको भावे
जिया ना लागे मेरा तुझ बिन
तनिक भी पल कोई रास न आवे।

यादों में तुम हमरे बसे
जिया में हूक उठत है श्याम
तुम सारे जग के पियारे
पर मनवा हमरे बस तिहारो नाम।

बड़ी देर भई तेरी राह निहारे
अब भी दया दिखावत नाहीं
हमरी नगरिया कब अइहौ
बतला दो अब भी निर्मोही कन्हाई।
000
पूनम श्रीवास्तव



गुरुवार, 15 अगस्त 2013

चित्रात्मक कहानी ---- जल्दबाज कालू

                                                             एक बंदर था।नाम था कालू।पर दिल का बहुत साफ़ था।हमेशा लोगों की सहायता करता था।पर कालू की एक बुरी आदत थी।हर काम को जल्दबाजी में करने की।इससे अक्सर उसके काम बिगड़ जाते।वह दुखी हो जाता।

एक दिन वह बैठा सोच रहा था कि कैसे अपनी इस आदत को बदले। उसी समय उसे
भालू पीठ पर कुछ लकड़ियां लेकर जाता दिखा।कालू को लगा कि इसकी सहायता करनी चाहिये।वह कूद कर भालू के सामने पहुंचा,लाइये दादा मैं ये लकड़ियां पहुंचा दूं।
  भालू थक गया था।उसे लगा कालू की मदद ले लेनी चाहिये।उसने लकड़ियां उसे दे दीं।कालू ने कहा,दादा आप आराम से आइये।मैं आपकी ये लकड़ियां लेकर आगे चलता हूं।और वह लकड़ियां लेकर तेजी से आगे बढ़ चला।
  
थोड़ा आगे एक जंगली नाला था।नाले का बहाव भालू की गुफ़ा की ओर था।कालू
बंदर ने सोचा---क्यों न मैं लकड़ियां नाले में डाल दूं।पानी के साथ बह कर गुफ़ा तक
पहुंच जाएंगी।मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी होगी।
  बस उसने कालू की लकड़ियों का गट्ठर नाले में डाल दिया।नाले का बहाव तेज था।
लकड़ियां तेजी से बहने लगीं।उनके पीछे पीछे कालू ने भी दौड़ लगा दी।
    पर कालू बहुत तेज नहीं दौड़ पा रहा था।लकड़ियां आगे बह गईं।कालू ने सोचा कि भालू की गुफ़ा आने तक तो मैं इन्हें पकड़ लूंगा।
    कालू बहुत तेज उछला।बहुत तेज दौड़ा।पर वह पानी के बहाव के साथ नहीं दौड़
सका।लकड़ियां भालू की गुफ़ा से आगे बह गयीं।कालू उन्हें नहीं पकड़ सका।वह उदास
 होकर गुफ़ा के सामने बैठ गया।

            कुछ ही देर में वहां भालू भी आ गया।कालू बंदर को उदास देख उसने
 पूछा,क्या हुआ।
   कालू ने उसे पूरी बात बताई।भालू हंस पड़ा।उसने कालू को समझाया,जल्दी में काम बिगड़ जाते हैं।अपने काम आराम से किया करो।
बात कालू को समझ में आ गई।उसने उसी दिन से जल्दबाजी की आदत छोड़ दी।
                        --------
            मेरी यह कहानी दिनांक-24-06-13 को दिल्ली से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र "नेशनल दुनिया" में भी पकाशित हुयी थी।
                           

पूनम श्रीवास्तव

बुधवार, 1 मई 2013

कैक्टस के जंगल

(फोटो--गूगल से साभार)

ज्यों ज्यों उम्र उसकी
चढ़ रही थी परवान पे
त्यों त्यों पल रहे थे
सपने उसकी आंखों में।

घर आंगन की लाडली
नन्हीं सी कली खिली खिली
नहीं मालूम था एक दिन
मुरझायेगी वो किस गली।

पूरे घर की आंखों की पुतली
जान निसार थी जिस पर सबकी
अपने ख्वाबों के संग संग
जिसने देखे थे सपने बापू व मां के।

कदम बढ़ा रही थी धीरे धीरे
खोल रही थी पर अपने
धर दबोचा उसको पीछे से
कुछ नापाक हाथों ने।

छटपटाई रोई चिल्लायी
भाई होने की दी दुहाई
पर जिसको दया न आनी थी
वो हुआ कब किसका भाई।

बहुत लड़ी हिम्मत न हारी
पर अंततः लाचार हुई
बड़ी ही बेदर्दी से वो
हैवानियत का शिकार हुई।

बिखर गये सारे सपने
जिस्म के टुकड़े टुकड़े हो कर
चढ़ गयी फ़िर एक बेटी की बलि
शैतानों के हाथों पड़कर।

ना जाने कितनी बेटियां
ऐसी बलि होती रहेंगी
क्या सचमुच ये धरती मां
बेटियों से सूनी हो जायेगी।
000

पूनम