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बुधवार, 30 मार्च 2022

गुफ्तगू

 

गुफ्तगू

(फोटो-हेमन्त कुमार)


चलो आज हम कुछ गुफ्तगूं कर लें
कुछ अपनी कहें तुम्हारी भी सुन लें।
वो भोला सा बचपन निश्छल सी बातें
चलो वक़्त रहते कुछ अब भी बचा लें।
ना जाती दीवारें ना मज़हब की मीनारें
चलो आज हम ये लकीरें मिटा लें।
ना हो रंजो-रंजिश न तीर व कटारें
चलो प्रेम की हम पींगे चढा लें।
जो तुम्हारी आबरू वो हमारी भी इज़्ज़त
चलो रुसवा होने से उसको बचा लें।
दें भूखों को रोटी व प्यासे को पानी
इंसानियत की दौलत सबमें लुटा लें।
000000
पूनम श्रीवास्तव

सोमवार, 30 मई 2011

दिल के जज्बात

दिल के जज्बात जब आंखों में उतर आये

तो सब्र का मानों सैलाब बह गया।

एक लहर आई और पलकों पर ठहरी

पर दूसरी साथी लहरों ने उसका साथ दे दिया।

हंसी बिखेरती रही झूठी मुस्कान ओढ़ कर

पर वो बेमुरौव्वत हाले दिल बयां कर गया।

सोचा था महफ़िल में झूठ की पहने रहूं नकाब

पर सच के आगे वो भी बेनकाब हो गया।

इन आंसुओं का भरोसा क्या कब बरस जायें

खुशी हो गम दोनों में रिश्ते निभाता गया।

अजब का इनका रिश्ता भी है न साथियों

किस बात पर ये छलक पड़े किसको गुमां हो पाया।

000

पूनम


गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

दीवानगी की हद


मौत आती भी नहीं जां जाती भी नहीं

भंवर में फ़ंसे मांझी सी सांसें अटकी ही रहीं।

तेरे यादों के दिये जलाये हैं हुये

पर तू आस पास नजर आई ना कहीं।

खयालों में डूबा हूं तेरे इस कदर

न यहीं का रहा ना रहा कहीं।

ये दीवानगी की ही हद है शायद मेरी

एक तरफ़ा प्यार मेरा कभी तो जीतेगा सही।

मेरे प्यार की जुस्तजू है प्यार की इन्तहां

तेरे इनकार पर भी एतबार नहीं।

प्यार की ताकत है कोई कच्ची डोर नहीं

खिंची चली आयेगी तू रहे जहां भी कहीं।

धड़कनें देतीं दस्तक दिल के बन्द पट खोल जरा

मुस्कराता सा नजर आऊंगा बंद पलकों से ही देख सही।

तेरे कदमों की आहट को सुन रहा हूं कब से

तेरी राहों में हरदम मेरी पलकें हैं बिछी ।

0000

पूनम

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

वक्त से----


वक्त थम जाओ जरा

आइना तो निहार लूं।

घटाओं घूम के आओ जरा

जुल्फ़ों को संवार लूं।

हवाओं रुख बदल दो जरा

आंचल तो संभाल लूं।

फ़िजाओं इस तरह गमको जरा

सांसों में इनको भर तो लूं।

चमन फ़ैलो हर इक दिशा जरा

फ़ूलों सी मुस्कुरा तो लूँ।

बारिश झूम के बरसो जरा

संग तुम्हारे झूम तो लूं।

स्वप्न सतरंगी इन्द्रधनुषी ज़रा

खुशी से इतरा तो लूँ।

आलम हो इस कदर रंग भरा तो

क्यों ना इस पल को आगोश में समेट लूं।

000

पूनम

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

सोचा ही न था


हम तो तेरे दिल से उतर जाएँगे ऐसे,
जैसे जिल्द पुरानी किताबों से उतर जाती है,
ये तो सोचा ही न था.

थाम के हाथ हम तो चले सीधी डगर,
राह में नागफनियाँ भी बहुत होती हैं,
ये तो सोचा ही न था.

आंख से आंसू जो टपके तो बने मोती,
ऐसी बातें तो ख्वाबों में ही होती हैं हकीकत में नहीं,
ये तो सोचा ही न था.

कल था क्या और आज हुआ क्या है,
पल ही पल में तकदीर बदल जाती है,
ये तो सोचा ही न था.
०००००००००
पूनम

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

साकी


बहुत कुछ सुनने सुनाने को बाकी

मगर पहले थोड़ी पिला दे तू साकी।

सुना है इसमें बहुत है दम

ताकत है इसमें भुलाने को गम

असर मुझपे भी हो जाये ताकि-----।

सुना है इसको जिसने पिया है

वो हर बार मर मर के ही तो जिया है।

निभाता है साथ हर गम में बाकी----।

माना गमे दर्द में काम करता दवा का

मगर बन जाता इक दिन नशा जिन्दगी का

जिगर तो जलाता साथ जां भी जो बाकी---।

नशा तो नशा है किसी किस्म का भी

जहर बन जाता इक दिन दवा भी

फ़िर भी नशा लोग करते हैं बाकी----।

सुना है जहर को मारता जहर है

सब करता इंसान जो चाहे अगर वो

फ़िर इसमें कसर क्यूं अब भी है बाकी---।

रहने दे तू मुझको पिलाने को साकी

रहने दो मुझको पिलाने को साकी-----।

0000

पूनम

गुरुवार, 25 मार्च 2010

दर्दे --जिन्दगी


दवा ही बन ग़यी है जिन्दगी जिनकी,

दुआ कीजिये वो जहर न बने।

लहू जो दौड़ रहा जिस्म में,

दुआ कीजिये बेअसर न बने।

पिये जा रहे हैं गमों के चिलम,

दुआ कीजिये वो कहर न बन॥

नहीं देख सकता जो औरों का चैन,

दुआ कीजिये वो नज़र न बने।

समझता नहीं जो दर्द जिन्दगी का,

दुआ कीजिये वो जिगर न बने।

आबाद है जहां नेक इन्सानों से ही,

दुआ कीजिये वो वीराना शहर न बने।

000

पूनम

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

पैगाम


ख्वाबों में ही छलनी हो, गया जिगर जिसका

वही तो जिगर हमारा है, वहीं तो जिकर हमारा है।

खयालों के धागे बुनते बुनते, कुछ बिगड़े कुछ सूत बने।

वही तो फ़िर उम्मीद बने, वही तो फ़िर सहारा है।

सूरज चांद बादल सारे, झिलमिल करते ये तारे

वही धरती ,नील गगन हमारा, वही तो प्यारा नजारा है।

वही पोखर ,वही नदियां,वही लहरें समुन्दर की

वही सुनामी बन जाती कभी, वही प्यासे की अमृतधारा है।

जिस्म भी एक जान भी एक, है रंग गोरा, काला तो क्या

वही मन सबका एक हो गर ,तो बदले जहां ये सारा है।

वही सोना, वही चांदी, वही मोती, मांनिक भी

खान से कोयले के निकले जो, वही तो हीरा हमारा है।

जो रंगत रक्त की एक ही है,तो नफ़रत क्यों पनपती है

जीतें दिलों को मोहब्बत से, यही पैगाम हमारा है।

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पूनम

शनिवार, 30 जनवरी 2010

गजल


जो बात लगी दिल में उसे याद दिलाया न करो

बार बार वो वाकया यूं दुहराया न करो।

तुम कह के चले जाते हो अपने रस्ते

मैं सोचती ही रह जाऊं यूं परेशां किया न करो।

अपने कीमती समय से चन्द लमहे निकालते हो तुम

फ़िर सब्र से बैठो जरा यूं खड़े ही चले जाया न करो।

हर आहट पर लगता है कि आये हो तुम्हीं तुम

पल पल खयालों में आकर यूं भरमाया न करो।

दिल के दरवाजे मेरे खुले हैं सिर्फ़ तुम्हारे लिये ही

हर दरवाजे पर जाकर दस्तक तो यूं दिया न करो।

गर तुम हो आफ़ताब तो मैं जमीं की धूल हूं

पर पांवों से ठोकर मारकर धूल को यूं उड़ाया न करो।

चिरागे रोशनी में लिखती हूं मैं तुम्हारे लिये कुछ लफ़्ज

पढ़कर उसे मेरा मजाक तो यूं बनाया न करो।

***

पूनम

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

गजल


मत दिखाओ मुझे वो आईना जिससे हो गई नफ़रत मुझे

जिसमे अपना ही अक्स अब बदला नजर आता है।

सोचती हूं खोती जा रही हूं अपनी ही पहचान

मगर नहीं ,यहां तो हर शख्स ही गंदला नजर आता है।

बेखुदी में जाने क्या कह गये हम उसे

हैरान सा खड़ा उसे मुझमें पगला नज़र आता है।

किससे करुं सवाल और किससे मांगू जवाब

यहां तो हर शख्स ही मुंह छुपाये निकला नज़र आता है।

किसी मंज़िल तक पहुंचने की जब जब करती हूं कोशिश

क्या करुं वहां भी मुझसे खड़ा कोई पहला नज़र आता है।

कभी फुर्सत में बैठ के करती हूं बीते वक्त का हिसाब

पर वो कल का वक्त भी धुंधला नज़र आता है।

लगी हुई बाज़ी को जीतती गई बार बार

पर हर बार इनाम की पंक्ति में कोई अगला नज़र आता है।

जारी हैं कोशिशें फ़िर भी, चलता रहेगा ये कारवां

पर जो आप मुस्कुराएं,तो सब कुछ खिला नजर आता है।

0000

पूनम

शनिवार, 9 जनवरी 2010

कुहरा


बादलों के रंग देखो उड़ उड़ के रह गये

अश्कों की बरसात देखो बिन कहे ही बरस गये।

शीत ने अपनी घनी चादर रंग में कुहरे के बिछाई

उसके छंटने के इन्तज़ार में बस आंख मल के रह गये।

सूरज ने भी ना निकल कर रंग दिखाये अपने ताव के

चादरों के झरोखों से उसके दीदार को रह गये।

लोग यूं थरथरा रहे इस बर्फ़ को जमाती शीतलहरी में

पांव भी अपने को ज़मीं पर रखने से इनकार कर गये ।

गुजरती नही रातें सभी की रजाईयों के बीच में

और तो कुछ बिन कपडों के ही अलाव तापते रह गये।

सूरज और,ठंड के बीच जो जंग छिड़ी

भुगतने को खामियाजा उसका हम सभी ही रह गये।

ज्यों बादलों के बीच रंग धनुषी अच्छे लगे

वैसे ही कड़कड़ाती ठंड में सूरज की तपिश को रह गये।

जैसे गर्मी में क्षणिक हवा का झोंका भी प्यारा लगे

अहसास हो गुनगुनाती धूप का बस आह भर कर रह गये।

000000

पूनम

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

गजल-- आख़िरी सलाम


खूने जिगर से लिख रहा हूं आखिरी सलाम
इल्तजा बस जरा सी कबूल इसको कर लेना।

इन्तजार करते करते हो गई इंतहा इंतजार की
दिले खयाल तब आया नहीं नसीब में तेरा दीदार होना।

जीते जी ना सही जब हो जाऊं सुपुर्दे खाक मैं
मजार पर आके मेरी अश्क दो बहा लेना।

तेरे दो अश्क ही मेरी मुहब्बत का ईनाम होंगे
मैं न सही मेरी कब्र के ही संग दो पल बिता लेना।

तेरी नफ़रत ही बनती गयी मेरी मुहब्बत का सबब
हो सके तो जरूर इसे अपनी कड़वी यादों बसा लेना।

खत्म हुये शिकवे गिले अब अलविदा तुझे कहता हूं
जब उठेगा जनाजा मेरा बस इक नजर डाल लेना।

चलो मैं हो गया रुखसत अब तेरे इस जहां से
जाकर कहूंगा ऐ खुदा मेरी मुहब्बत को आबाद रखना।
0000
पूनम